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Showing posts from 2013

संगीत ज़रिए इलाज - Dr Kamla Goklani

डॉ कमला गोकलानी जे सिंधु दूत में प्रकाशित आलेख मूं चूंडयलि संगीत ज़रिए इलाज - अजु माहिर ऐं खोजनीक जंहिं म्यूज़िक थेरेपीअ जी गाल्हि कनि था, उहा सदियूं अगु लोकगीतनि जरिए आम वाहिपे में हुई, जंहिंजो फकत हिकु मिसालु डियां थी - बार खे नंढी माता, वडी माता लाखिड़ो वगैरह थियण ते सजो बदनु गाढ़ो थी वेंदो आहे। फोफीड़ा, दाणा, चुघ थी पवंदा आहिनि। बुखार जा मच हुअण करे छितो थी पवंदो आहे, निंड न ईंदी अथसि, तडहिं माता जा ओराणा - ठारि माता ठारि पंहिंजे बचनि खे ठारि । अमां अगे बि ठारियो थई हाणे बि ठारि ।। बुधी बार ते जादूअ जहिड़ो असरु थींदो आहे ऐं खेसि मिठिड़ी निंड पंहिंजे आगोश में समेटे वठंदी आहे। सागियो असरु मनो रोगियुनि ते बि थींदो आहे। ‘‘सिंधी लोक गीतनि में अहिड़ो त लुत्फु ऐं सोजु समायलु हूंदो आहे ऐं अहिड़ो त रसु ऐं लइ भरियल हूंदी आहे, जो बुधण वारे जी दिलि ऐं दिमाग तासिर जे अंतहाई गहिरायुनि में गुमु थियो वञनि एं हू पाण खे उन्हीअ घड़ीअ माहौल में तसिवर करण लगंदो आहे, जिते फितिरत पंहिंजे हकीकी ऐं लाफानी लिबास में गाईंदे, नचंदे, टिपंदे ऐं मुस्कराईंदे नजर ईंदी आहे। इन्हनि सभिनी जबलतनि जो कारण ही आहे जो उन्हनि में ह...

एक दीपक

एक दीपक समग्र समाज को दीपावली की लाख-लाख बधाइयां। दीपावली हमें एक दीपक जरूर प्रज्वलित करने का संदेश दे रही है। भलेशक आज के जमाने मंे बिजली और जेनरेटर जैसे संसाधन रोशनी के लिए मुहैया हैं। भलेशक प्रत्येक व्यक्ति लखपति-करोड़पति है मगर मानवीयता के लिए जज्बा भी जिंदा रहना जरूरी है। जीवन और प्राणियों के लिए दया भावना हजारों वॉट के बल्वों की रोशनी से अधिक जीवन को रोशन करती है। वक्त आने पर आलीशान अट्टालिकाओं की चमक दमक एक दीपक की रोशनी के आगे फीकी पड़ जाती है। एक दीपक - आलीशान महल में राजा-रानी का बड़ा और सुसज्जित कक्ष रोशन फानूस से चमक रहा था। फानूस इतरा कर अपने तले में धूल से सने मिट्टी के दीपक को चिढ़ा रहा था। दीपक अपनी चिर परिचित सादगी से अपने तेल और बाती को सदैव मुस्तैद रहने का सबक सिखा और वक्त पर काम आने की हिदायत दे रहा था। बाहर आंधी-बरसात आ रही थी और इस वजह से घुप अंधेरा भी था। रानी ने राजा को कहा - कोई दास-दासी आस पास नहीं है। बुलाने पर भी नहीं आ रहा। मुझे बाहर टंगा हुआ मैना का पिंजरा अंदर मंगवाना है। आप फानूस उठा कर रोशनी में पिंजरा उठा कर ले आओ। फानूस ने राजा के लिए रानी का यह निर्देश ...

Bharat me angreji raj ... Lekhak pt sundar lal ji... pt sundar lal ji ki book bahut likhi hui hain or unke prashanshak bhi kafi sankhya me hai A पंडित सुंदरलाल जी के बारे में संध्या नवोदिता जी ने गूगल पर सर्च किया मगर सर्च इंजन वांछत विद्वान के बारे में अनजान रहा। यह इसलिए कि पंडित संुदरलाल जी के बारे में सर्च इंजन पर किसी ने कोई जानकारी डाली ही नहीं होगी। हिंदी या अंग्रेजी में गूंगल ़ और ब्लॉग या अपने या किसी साथी के वेबसाइट पर सामग्री अपलाड करने के बाद वह सामग्री सर्च करने पर उपलब्ध हो जाती है। ऐसा मेरा स्वयं का अनुभव गूगल पर रहा है। उदाहरण के तौर पर संभवतया मेरी यह पोस्ट भी सर्च करने पर सामने आ सकती है। pt sundar lal ji ki book bahut likhi hui hain or unke prashanshak bhi kafi sankhya me hai A

Rang Rajasthani: 26-08-2013

Rang Rajasthani: 26-08-2013

पहाकनि जी बरसाति

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पहाकनि जी बरसाति। अजु तव्हांखे पहाकनि में बरसाति जी गाल्हियूं था बुधायूं। असांजो मकसद सिन्धु भाषा, बोली ऐं संस्कृतिअ जियूं खासियतूनि खे तव्हां तांई पूजायणो आहे। राय-मशविरा इनि बारे में असांखे मिलन्दी त घणी खुशी थीन्दी। -  डखिण मींह न वसिणा, जे वसे त बोेड़े, काइर धकु न हणिणा, जे हणे त झोरे। सिन्धु में घणो करेेे डखण-ओलह खां बरसाति न पवन्दी आहे। पर जे इन तर्फ जी बरसाति पई त चंगी बोड़ बोड़ा करे छडीन्दी आहे। याद रखिण जी गाल्हि आहे, असांजो अजमेर समेत ओलह जो राजस्थान बि इन्हींअ ई भौगोलिक स्थितिअ में वसयलि आहे। खास तौर बीकानेर, जैसलमेर वगैरह। बुठो त थरु, न त बरु थरपारकर वारो धणो जिलो वारीअ वारो आहे। हिते आबादीअ जो घणो दारोमदार बरसाति ते आहें थर में जे बरसात पेई त उहो सजो इलाइको सुख्यो सताबो ऐं सुन्दर बणिजी पवन्दो, न त उव्हो रेगिस्तान ई आहे। वसे त कोहु, न त रोहु बरसाति में इलाइको सुहिणो, न त सुकलु मुल्क। सियारे में सीउ पवे, आड़हड़ में आरायूं सन्धु बिन्हीं में को न को, कंहिं खे साराहियूं! सिन्धु जे उत्तर में सर्दी ऐं गर्मी बई घणियूं थीन्दियूं आहिनि, जेेके परेशान कन्दड़ आहिनि।...

Unko chehare padhnaa Aataa hai :/ Samajhe jo wo Arth bhi batanaa Aataa hai 8-) muskrane ko Makkari kahte wo ;) or Dard Pee jane ko DUNIYAADAARI kahnaa Aataa hai. :*

अंडा सिखावे बच्चे को चीं-चीं मत कर

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अंडा सिखावे बच्चे को चीं-चीं मत कर     आज नहीं, प्राचीन काल से कहा जाता है, छोटे मुंह बड़ी बात। इसका प्रचलन बने रहना यानी छोटे मुंह बड़ी बात के उदाहरण सामने आते रहना मनुष्य की प्रवृत्ति को दर्शाते हैं। सामाजिक या वाणिज्यिक जीवन में ऐसे चरित्र कम किंतु राजनीति से जुड़े और प्रतिस्पर्द्धात्मक प्रवृत्ति वाले लोगों में इस तरह की बातें सामने आ ही जाती है जब लोग स्वतः कह उठते हैं, अंडा सिखावे बच्चे को कि चीं-चीं मत कर। दरअसल किसी भी वर्ग के कार्यक्षेत्र से जुड़ी शख्सियत के जीवन में टर्निंग पॉइंट प्रायः तब दिखाई देता है जब नवागंतुक साथी उसे पीछे धकेलने को उद्यत होते हैं। राजकीय आश्रय से संचालित कार्यालयों या निजी क्षेत्र,  कारपोरेट जगत में  कामगारों की वरीयता को कनिष्ठ साथी चुनौती देते दिखते हैं। काम कम पारिश्रमिक अधिक, अनुभव और कार्य के प्रति निष्ठा में कमी, ईगो में वरिष्ठ से 21 रहकर खुद को साबित करने की भावना प्रदर्शित करने में तनिक भी देर नहीं करना। ऐसे लोगों की एकाधिकार और शोषण की प्रबल भावना छिपाए नहीं छिपती लेकिन विद्वान कह गए हैं, अंत बुरे का बुरा। आखिरकार निर्णा...

अच्छी भई, गुड़ सत्तरह सेर

अच्छी भई, गुड़ सत्तरह सेर आज का युग बाजारवाद से घिरा है। भाव-भंगिमाएं तो बिकती ही रही हैं। यहां भावनाएं भी बिकने लगी हैं। महंगाई के बोझ तले दबे गरीब को महलों के सपने दिखाने का सिलसिला थमता नहीं दिखता... हां... तरीका जरूर बदलता रहता है। आम आदमी भी बाजार की ऐसी चाल को अब समझ गया है और इसी वजह से किसी वस्तु की कीमतें यकायक बढ़ा दिए जाने पर बोल उठता है... बारह रुपए बढ़ाए हैं तीन रुपए कम कर देंगे और कहेंगे अच्छी भई, गुड़ सत्तरह सेर। यानी सस्ताई का जमाना ले आए। गुड़ का प्रचलन भले ही कम हो गया है लेकिन हमारी परंपराओं में, धर्म-संस्कृति में, अनुष्ठानों में और सामाजिक रीति रिवाजों में गुड़ की महत्ता बराबर अपनी गरिमा बनाए हुए है। बधाई में गुड़ आज भी बांटा जाता है। पूजा पाठ में श्रीगणेश जी को गुड़ से प्रसन्न किया जाता है। और... कहावतों में गुरु गुड़ ही रहा चेला शक्कर बन गया भले ही कहा जाता हो लेकिन बाजार में चीनी की कीमतों के मुकाबले गुड़ की कीमत सुर्खियों में रहती है। महंगाई को गुड़ की कीमत की तराजू पर आज नहीं बल्कि 18 वीं शताब्दी के आखिरी दशकों में भी तौला जाता था। कोई वस्तु जब बहुत सस्ती य...

... दूसरे ग्रह के प्राणी इस धरा पर आते थे ? एलियन... ?

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... दूसरे ग्रह के प्राणी इस धरा पर आते थे ? एलियन... ?  दूसरे ग्रह के प्राणी इस धरा पर आते थे ? ? ?  जिन्हें हम आज एलियन संबोधन से जानने का प्रयास कर रहे हैं ! एलियन ऐसा ही पात्र है।     बीते वर्षों में एलियन के पात्र के साथ सेलोलाइड पर रची गई मायावी रचना देखने वालों के लिए एलियन डरावना नहीं बल्कि मित्र समान बन गया। खास तौर से बच्चों के साथ फिल्माए एलियन पात्र के सीन लोगों में एलियन के प्रति लगाव का भाव जगाने वाले रहे। फिल्म थी कोई मिल गया। आज किसी के लिए एलियन नया शब्द नहीं है। भले ही किसी ने एलियन को देखा या नहीं देखा हो। एक और दुनिया भी है, वैज्ञानिकों की दुनिया। कितने ही  वैज्ञानिक हर बात, हर पात्र, हर चीज को अपने नजरिये से, विभिन्न पहलुओं से देखते और संभावनाएं तलाशते रहते हैं। एलियन के बारे में भी विज्ञान की दुनिया में शोध कार्य चलते रहे हैं। आम आदमी के मन में भी ऐसे अनजान किंतु समाज पर अपना प्रभाव डालने वाले पात्रों के प्रति जिज्ञासा उत्पन्न होती है। ऐसे ही विचारो के साथ जब लोक कथाओं, पौराणिक कथाओं में कतिपय पात्रों की ओर ध्यान जाता है तो वे इस लोक ...

रंगबिरंगी पतंगों से घिरा बीकानेर का आकाश

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बीकानेर का आकाश रंगबिरंगी पतंगों से घिरा  गुनगुनाता है जिसे हर शख्स वो एक गजल है मेरा नगर ...! चंदा महोत्सव का आनंद आज भी उतना ही आया जितना कि बीते सालों में । दो तीन दिन से तो बीकानेर का आकाश रंगबिरंगी पतंगों से घिरा दिखा और अच्छा भी लगा। यादें जो जुड़ी हुई है बीकानेर की पतंगबाजी से। लड़तों से। लड़तें यानी... पतंगों के पेच। यानी पतंग प्रतियोगिता। छह भून की लटाई पक्के डोर की और चार चार पांच पांच लटाइयां सादे डोर की। भूण या भून यानी करीब 900 मीटर की दूरी के धागे का नाप। Mohan Thanvi  सादुल स्कूल के आगे जेलवेल तक मांझा सूतने वालों की कतार। आज भी  मार्ग से निकलने पर ऐसा नजारा हुआ तो सुखद लगा। बीते दो तीन दिन तो शाम के समय आकाश में पतंगें  दिखी। आंधी बारिश भी आई और शनिवार का मौसम तो बल्ले बल्ले। किंतु वो समय भी याद आता है जब ऐसा माहौल और ऐसी पतंगबाजी आखातीज से महीना महीना पहले तक से दिखाई देने लगती थी। बीते दो तीन साल से महंगाई ने इस कदर अपना जाल बिछाया है कि आकाश से पतंगों का जाल खत्म - सा होता लगने लगा है।  सच कहूं । पतंगबाजी के लिए जुनून में वो बात नहीं ...

प्रलाप

प्रलाप   मित्र... अक्सर ख्वाबों में तुम्हें देखने की कोशिश की... कहां थे तुम ... जब नींद मुझे दुनिया से विलग करने का प्रयास करती थी... । अधखुली आंखों से मेरे होंठों पर प्रलाप होता था... तुम्हारे लिए। ... थे कहां तुम...। यूं मुझसे जुदा होने का सबब भी तो होना चाहिए तुम्हारे पास...। पहाड़ों के एक ओर ... जिधर सूर्य होता है.... रोशनी होती है। दूसरी ओर... जिधर रोशनी का इंतजार होता है... लोग होते भी हैं और मैं भी...। तब तुम उधर क्यों होते हो... जिधर रोशनी होती है। ओह... तुम्हें अब भी अंधेरा डराता है...। है न... मित्र । तुम्हें रोशनी पसंद है। सच कहूं... तुम बिन... मुझे भी डर लगता है...। अंधेरों से भी... और... रोशनी से भी। यही वजह है... मुझे रोशनी की बजाय... तुम्हारी जरूरत है.. मित्र।...

सुनहरा महल : कथा अंश

सुनहरा महल :  कथा अंश अचानक सामने जो देखा, यकीन नहीं हुआ। तसव्वुर में जरूर ऐसे नजारे किए लेकिन सामने... यथार्थ में... आश्चर्य ! कैसे तो ख्वाब आया ओर कैसे ख्वाब में ये नजारा आया फिर कैसे सामने हकीकत में देख कर आंखें चुंधिया रही हैं...! स्वप्न...! जरूर स्वप्न ही है ! बाहं पर चिकोटी काटी... उई...! जागते का नजारा है ये तो! वाह...! वाह...! सामने सुनहरा महल। महल के इर्द गिर्द खजूर के लंबी परछाइयों वाले पेड़। लंबी परछाइयां... वक्त सुबह का है या संध्या का... जानने का कोई साधन पास में नहीं ! यकबयक मंदिर की घंटियां सुनाई दी... संध्या... नहीं... नहीं... अलसभोर...। नहीं... निश्चित रूप से संध्या का समय है। मन ने कहा, अलसभोर हो तो पेड़ों की परछाइयां नहीं होती... सूर्य चमकने के बाद ही तो परछाइयों को पांव पसारने का मौका मिलता है। जरूर संध्या का समय है। सूर्यास्त के बाद परछाइयां सिमट जाएंगी। अपने आप में। आस पास के लोगों की तरह। ये सुनहरा महल भी दिखाई देना बंद हो जाएगा। आंख से ओझल हो जाएगा सब कुछ। लेकिन ये महल... इसका तो फकत तसव्वुर ही किया था कभी... साक्षात सामने कैसे आ खड़ा हुआ। अभी असमंजस के स...

सुनहरा महल : कथा अंश

सुनहरा महल :  कथा अंश अचानक सामने जो देखा, यकीन नहीं हुआ। तसव्वुर में जरूर ऐसे नजारे किए लेकिन सामने... यथार्थ में... आश्चर्य ! कैसे तो ख्वाब आया ओर कैसे ख्वाब में ये नजारा आया फिर कैसे सामने हकीकत में देख कर आंखें चुंधिया रही हैं...! स्वप्न...! जरूर स्वप्न ही है ! बाहं पर चिकोटी काटी... उई...! जागते का नजारा है ये तो! वाह...! वाह...! सामने सुनहरा महल। महल के इर्द गिर्द खजूर के लंबी परछाइयों वाले पेड़। लंबी परछाइयां... वक्त सुबह का है या संध्या का... जानने का कोई साधन पास में नहीं ! यकबयक मंदिर की घंटियां सुनाई दी... संध्या... नहीं... नहीं... अलसभोर...। नहीं... निश्चित रूप से संध्या का समय है। मन ने कहा, अलसभोर हो तो पेड़ों की परछाइयां नहीं होती... सूर्य चमकने के बाद ही तो परछाइयों को पांव पसारने का मौका मिलता है। जरूर संध्या का समय है। सूर्यास्त के बाद परछाइयां सिमट जाएंगी। अपने आप में। आस पास के लोगों की तरह। ये सुनहरा महल भी दिखाई देना बंद हो जाएगा। आंख से ओझल हो जाएगा सब कुछ। लेकिन ये महल... इसका तो फकत तसव्वुर ही किया था कभी... साक्षात सामने कैसे आ खड़ा हुआ। अभी असमंजस के स...

किताब के खुले पन्ने...

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किताब के खुले पन्ने... किताब के खुले पन्ने फड़फड़ाते पन्ने कितनी कथाएं कितने काव्य कितने नाटक अपने में सहेजे हुए हैं इन्हीं पन्नों में कहीं तुम्हारे संग मेरा भी अक्स उभर आता है कभी कभी जब हवा थम जाती है और किताबों के पन्ने गहरी खामोशी अख्तियार कर लेते हैं तब मेरे तुम्हारे अक्सों में बहुतेरे और अक्स गडमड हो जाते हैं हवा को थामने वाला फिर हवा चला नहीं पाता चला पाता तो कुछ कर पाता तो... जरूर करता पेड़ों को भंभोड़ता पत्तों को अपनी सांसों से गति देता ताकि हवा चले किताबों के पन्ने फड़फड़ाएं अक्स मुस्कराएं

बर्फ पिघल गई...

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बर्फ   पिघल  गई... धूप ने  दीवार  को  सहलाया  ... उसे  मिली  राहत  ... गौरैया  के  घोंसले  पे जमी  बर्फ  भी  पिघल  गई  ... मतवाली  हुई  हवा ... आशा  के  गीत  गूंज  उठे ... दूर  हुआ  निराशा  का  साया ...!
असबाब में असबाब, एक चंग एक रबाब आपके सान्निध्य में मन की बातें खुद ब खुद कलम से कागज पर उतरने लगती है। बड़ों ने अपने अनुभवों के इशारों में सच ही कहा है, पुस्तक सदृश्य और कोई मित्र नहीं। इसी तर्ज पर पाठक भी उसी श्रेणी के मित्र हैं जिस श्रेणी में पुस्तक को मित्र माना गया है। मित्रों में दिल की बात तो जुबां पर आती ही है। यहां माध्यम कलम है। बात कागज पर उतरती है। कलाकार, कलमकार की पूंजी और होती ही क्या है ! असबाब में असबाब, एक चंग एक रबाब। बस। हमारा यही संसार है। यही दौलत। कलम। कागज। दवात। यूं चंग डफ सदृश्य मंजीरा लगा हुआ वाद्य होता है। रबाब ऐसा वाद्य होता है जो सारंगी जैसा लगता है। इस साजोसामान से कलाकार, साहित्यकार आपसे, पाठकों से मित्रता का दम भरता है। पाठक भी बखूबी मित्र धर्म निर्वहन करते हैं। संबल प्रदान करते हैं। दिल की बात कागज के माध्यम से पाठक मित्रों तक पहुंचाने की बेमिसाल बानगी हमारे सामने ही है। सूचना और जनसंपर्क विभाग से सेवानिवृत्त अधिकारी एवं संपादक श्री मनोहर चावला जी ने भी दिल की बातें यहां साझा की है। चार फरवरी 2013 के अंक में भी। उन्होंने पत्रकारिता और सेवा अवधि सहित अ...

पेड़ फिर शाखाहीन होने लगा है....

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पेड़ फिर शाखाहीन होने लगा है.... देखते हैं चुपचाप हालात .... पेड़ फिर शाखाहीन होने लगा है.... जिसे ठूंठ समझते हैं ... बहते हैं उस कोटर के आंसू ... देखते हैं चुपचाप हालात .... पेड़ फिर शाखाहीन होने लगा है.... ... पत्ते तेज हवाओ से झड़ गए हैं .... नभचरों ने बुन लिया है.... फिर दूर कही एक नीड़... किसी हरे भरे बरगद क़ी...घनी कौंपलों के बीच .... चील कौंवो से बचने के लिए ... वे भी साक्षी हैं ... जानते हैं .... देखते हैं चुपचाप हालात .... पेड़ फिर शाखाहीन होने लगा है.... ... ठूंठ बनते जा रहे पेड़ के पास ... तने से निकलते आंसुवो के सिवाय ... कुछ नहीं बचा ... आंसू भी निर्दयी लकड़हारा... गोंद समझकर ले जा रहा है... ..देखते हैं चुपचाप हालात .... पेड़ फिर शाखाहीन होने लगा है....

तस्वीर

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Mohan Thanvi Shri Alam Husain Sindhi   फोटोग्राफी आज मीडिया का प्रमुख अंग है। कहते हैं तस्वीर  टैक्स्ट न्यूज से भी अधिक प्रभावी होती है। मेरे मित्र श्री मनीष पारीक और श्री आलम हुसैन सिंधी के खींचे हुए फोटो कई पुरस्कार प्राप्त कर चुके हैं। यहां मित्र श्री आलम हुसैन सिंधी और मेरा फोटो   ... ये हमने एक दूसरे के खींचे हैं...

हजारों मुसलमानों की उपस्थिति मे सम्पन्न हुई महापंचायत

हजारों मुसलमानों की उपस्थिति मे सम्पन्न हुई महापंचायत

फिर से बचपन पा जाना...

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फिर से बचपन पा जाना... फिर से बचपन पा जाना... होंठों पर टपकी बरसात की बूंदों को अपने में समेट लेना बादल संग उड़कर दामिनी संग नृत्य करना पंछियों के पंख उधार मांग कर हवाओं का ऋण चुकाना कागज़ की नाव को सड़क किनारे उफनती सरिता की लहरों पर छोड़ना धोरों के बीच *रेशम - सी लाल डोकरी* खोजना और हथेली में सहेज कर स्कूल में *धाक* जमाना... कितना अच्छा लगता है / फिर से बचपन पा जाना...

दीर्घकालिक यात्रा को सूक्ष्म बना देने वाली शक्ति का अस्तित्व

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 दीर्घकालिक यात्रा को सूक्ष्म बना देने वाली शक्ति का अस्तित्व  अनचाहे, अनहोनी, अकस्मात आदि क्या है! ये भी कर्म से जुड़े हैं या माया का एक रूप है...। अनचाहे ही सही, कर्मफल अवष्य मिलता है कथन को विचारते हैं तो फिर फल की चिंता किए बिना कर्म करने के संदेष को किस रूप में ग्रणह करें...! इसे माया कहें...! या... मंथन करें...! अनहोनी ही होगा जब किसी कर्म का फल नहीं मिलेगा। यह भी सच है कि कर्म चाहे कितना ही सोच विचार कर किया जाए और फल मिलना भी चाहे तय हो जैसा कि गणित में होता है, दो और दो चार और सीधा लिखने पर 22 तथा भाग चिह्न के साथ लिखने पर भागफल एक मिलेगा ही लेकिन फिर भी अप्रत्याषित रूप से भी कर्म-फल मिलते हैं। जीवन में ऐसे पल भी आते हैं जब किसी मुष्किल घड़ी में अकस्मात ही कोई अनजान मददगार सामने आ खड़ा होता है। धर्म और अध्यात्म के नजरिये से आस्थावान के लिए ऐसी अनचाहे, अकस्मात, अनहोनी ग्राह्य होती है और अच्छा होने पर प्राणी खुष तथा वांछित न होने पर दुखी होता है। यह प्रवृत्ति है। विद्वजन सुसंस्कार एवं भली प्रवृत्ति के लिए भगवत भजन का मार्ग श्रेष्ठ बताते हैं और यह सही भ...

मानता नहीं दिल । सच ।

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मानता नहीं दिल । सच ।  सच । दिल दिल्ली पुस्तक मेले में है। हम अपने को वहां नहीं ले जा सके । गढ़ने को बहाने चार छह हैं । घर के काम । शादियों का मौसम । मौसम का पलटवार । ऑफिस से छुट्टी नहीं । आर्थिक समस्या । बस। काफी है । नहीं जा पाने के ये कारण । सच । ये भी सच । जाना ही होता तो वहीं होते। सच । क्योंकि । जो "हमकलम" दिल्ली पहुंचे उनके पास भी ज्यादा नहीं तो इतने कारण तो होते ही । सच । ये कि हममें वो ललक नहीं । जो उनमें है । सच । जिले-तहसील के तो दूर हम तो शहर के अनुष्ठानों से भी वंचित रह जाते हैं । सच । जबकि दुनियादारी के अधिकांश काम करने से हम चूकते नहीं । मानता नहीं दिल । सच । हम वहीं नहीं जा पाते जहां दिल मानता नहीं । दिल से प्रयास नहीं करते । फिर भी सच । नहीं जा पाने का मलाल तो होता ही है । पुस्तक मेले की सफलता के लिए दिल से शुभ मंगल कामनाएं । सच । *!""शुभ मँगल'"!* *! .+""+.+""+. !* *! +  HAPPY + !* *! "+.       .+" "!* *!      "+"        !*        *Day!*    .ॐशुभ मँगलॐ

इसे माया कहें...! या... मंथन करें...!!

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इसे माया कहें...! या... मंथन करें...!!! भीतर के द्वन्द्व और उमड़ते विचारों को षब्दाकार देना अज्ञान को दूर करने के लिए ज्ञान की खोज में षब्दयात्रा है। यह भी कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता भले ही हो लेकिन विचारों से किसी को ठेस पहुंचती हो तो अग्रिम क्षमायाचना। हां, विद्वानों का मार्गदर्षन मिल जाए तो जीवन सफल हो जाए। भारतीय संस्कृति में जीवन की सफलता की खोज अध्यात्म के माध्यम से की जाती रही है। अध्यात्म में भी कुषल प्रबंधन को  महसूस किया है तो इसके लिए कर्म किया जाना भी अनिवार्य लगा है। अध्यात्म में कर्म है ज्ञान प्राप्ति का प्रयास।  और जीवन की सफलता को फल कह सकते है। जीवन प्रबंधन से ही व्यवस्थित और सुखमय हो सकता है। बिना प्रबंधन के तो चींटी भी नहीं जीती। चींटी ही क्यों, प्रत्येक प्राणी को समूह में जीते ही हम देखते हैं। ऐसा कोई प्राणी नहीं जो अकेला जीता हो या आज तक जीया हो। पेड़-पौधों को भी समूह में लहलहाना अच्छा लगता है क्योंकि वे भी बीज रूप से प्रस्फुटित होने से लेकर मुरझाने तक एक कुषल प्रबंधन प्रणाली से विकसित होते हैं, फल देते हैं। जीवन का मकसद ही फल देना है। ...

कुछ बहुत, कुछ - कुछ; कुछ बहुत कुछ, बहुत - कुछ

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कुछ बहुत कुछ कहते हैं... बहुत कुछ कुछ नहीं कहते...!!!...कुछ लोग कुछ विशेष  कार्य न करके भी कुछ न कुछ खासियत जोड़ कर कुछ न कुछ अपने ही बारे में बहुत  लोगो को  कुछ बताते रहते हैं !!!.. जबकि ... बहुत लोग बहुत कुछ उल्लेखनीय कार्य  करने के बाद भी कुछ लोगो को भी कुछ नहीं बताते...!!! कुछ बहुत कुछ में से  निकालने के लिए कुछ बहुत कुछ कुछ कार्य करते हैं...कुछ बहुत कुछ कार्य होते  हुवे भी कुछ नहीं करते...

camel fastival :- बर्फानी ओढणी सूं बारै आ पूग्या मरुधरा रौ जहाज देखण नै

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photo - Aalam Husain Sindhi BKN photo - Aalam Husain Sindhi BKN बर्फानी ओढणी सूं बारै आ पूग्या मरुधरा रौ जहाज देखण नै बीकानेर।  अंतरराष्ट्रीय ऊंट उत्सव मांय राजस्थानी, खास तौर सूं मरुनगरी रा लोक रंग मांय देश विदेश रै पावणां नै आपणोपण दिस्यौ। लोकवाद्यों री ताण सुकून दिरायो। बाळू रा लहरदार धोरां माथै दिन भर मुळकती धूप अ‘र  ठंडी टीर रात्यां मांय इनै सूं बिनै थिरकती चांदनी। फेस्टीवल रौ आखिरी दिन स्टेडियम में परंपरागत रूप सूं सज्योड़ा धज्योड़ा ऊंट। उमंग-उल्लास अ‘र उत्साह सूं गावंता नाचता लोक कलाकार। इण सब रौ हिवड़ै तांईं खुशी भरियोड़ा आनंद सूं निहारता सैलानियों रा झुंड। रेत रै इण समन्दर बिचाळै बस्योड़ो बीकाणे रौ ओ रूप ही तो सावन बीकानेर री लोकोक्ति पछै अबै पूस री रात बीकानेर री नूवीं नकोर-उक्ति रच रैयो है। मरुनगरी बीकानेर। राव बीकाजी रौ बीकाणो। अठै सावन मांय  प्रवासी तो पूगणा तय ही है। अबै नूवां आयाम स्थापित कर रैया है देश विदेश रा सैलानी। सावन नीं पण पूस री रात बितावणनै। हां जी। विगत मंे कुछ बरसां सूं अठै  पौष मास में यानी जनवरी महीने में अंतरराष्...

गढ़ों में गुमटियां ज्यों प्रहरियों की यारों

गढ़ों में गुमटियां ज्यों प्रहरियों की यारों    जलसों में गुटबंदी   त्यों   रहबरों की यारों         जख्मे जिगर कह रहे थे शहर पनाह पे चिल्ला के नजराना शय ही ऐसी है सनद रहे यारों 

हर दफतर में, नांगनि सां बिर भरियल आहिनि

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*BAHUBHASHI* *खबरों में बीकानेर*🎤 🌐   ✍️   🙏 मोहन थानवी 🙏   #Covid-19 #pm_modi #crime #बहुभाषी #Bikaner #novel #किसान #City #state #literature #zee Khabron Me Bikaner 🎤  सच्चाई पढ़ें । सकारात्मक रहें। संभावनाएं तलाशें ।   ✍️  हर दफतर में, नांगनि सां बिर भरियल आहिनि * पंध परे जा * ** पुस्तक परिचय शाइरु - मुरली गोविंदाणी  प्रकाषक - ेंग 34 आदिपुर 370205 कछ गुजरात         टेलीफोन 0236 261150 संस्करण - 2012  पंध परे जा असां कीअं सडायूं त सिंधी आहियूं / न असां खे मिलियो सिंधु देश जो टुकरो / न रहियो आ असां जो वेसु को हिकड़ो / असां त हर देश जा पांधी आहियूं /असां कीअं सडायूं त सिंधी आहियूं ।  इनि पंजकिड़े मंझ सिंधी समाज जो उवो सूरु साम्हूं अचे थो जेको विरहांङे बैद वधंदो इ रहियो आहे। तकरीबनि 66 वरिहयह अगु जेको सूरु दिल डुखाइंदो रहियो आहे उनिजो को इलाजु बि को हकीमु वैदु कोन करे सघंदो। सिंधी साहित्यकारनि इनि सूरु खे पहिंजे रचनाकर्म म...

तारीख भी क्या कमाल करती...रोशन राहों पे ला सजा देती है...

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तारीख भी क्या कमाल करती है  तारीख भी क्या कमाल करती है चेहरे पे चेहरे लगा औरों को मोहरा बनाने वालों को स्याह कोठरी से निकाल रोशन राहों पे ला सजा देती है तारीख भी क्या कमाल करती है कैलेंडर के पन्नों में खुद बदल जाती दुनिया में इतिहास बदल देती है घंटे पहले डुबो देती सूरज और छह घंटे बाद फिर सूरज उगा देती है तारीख भी क्या कमाल करती है चेहरे पे चेहरे लगा औरों को मोहरा बनाने वालों को स्याह कोठरी से निकाल रोशन राहों पे ला सजा देती है

हजार हवेलियों का शहर के रचनाकार श्री उपध्यानचंद्र कोचर

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Shri U C Kochar - Bikaner Raj.                                                                                                                                                                                                                                                                                    ...

ये प्यास है ही बड़ी ... आब की बात है प्यास की बात है

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प्यास प्रेम की हो या सूखे कंठ की ऋतु हो सर्द या बासंतिक चले हवा ऋतु हो परिवर्तन दौर में या हिम सा ठंडा हो प्रांगण चलती जब हवा गर्म इसी प्यास के  बहाने पिघलते हिमालय के दहाने ये प्यास है ही बड़ी ... आब की बात है प्यास की बात है

When life does not find a singer... उथो जागो त पहिंजी इन्हींअ सिंधु खे ठाह्यूं

When life does not find a singer to sing her heart, she produces a philosopher to speak her mind.           –KHALIL GIBRAN (1883-1931)  नई टेहीअ खे बि सिंधु संस्कृति ऐं सिंधीयत जी अहमियत जी जाण बखूबी आहे ऐं हिमथायो व´े त कहिं शक जी गाल्हि कोन आहे कि अचण वारे वक्ति में सिंधु संस्कृति जी जोत दुनिया जी कुंड कुड़झ में वरी उवांई भभके जीअं हजार वरियह अगु चिमकंदी हुई। उथो जागो त पहिंजी इन्हींअ सिंधु खे ठाह्यूं ... उथो जागो त- उथो जागो त पहिंजी इन्हींअ सिंधु खे ठाह्यूं अजमेर इन्दौर न उल्हास नगर हिन्द सजी सिंधु समझयूं असां सभई भाउर विकणी सभु बुराइयूं पहिज्यूं, चंङाई ठाह्यूं सच्चा व्यापारी चवायूं सिंधी हिन्दु जी कुण्ड-कुड़छ में जोति जगायूं सिंधी उथो जागो त पहिंजी इन्हींअ सिंधु खे ठाह्यूं जेका विसामिजण ते आहे सिंधियतजी उवाई वडी जोति भभिकायूं पहिंजे बारनि जे- जीवन खेत में खोटयूं कर्म जो दरिया वाह्यूं पसीनो थे खीरु मिठ्ठो खारायूं पहिंजे बारनि खे व्यापार जो गुण साणु पहिंजियूं रितियूं उथो जागो त पहिंजी इन्हींअ सिंधु खे ठाह्यूं...