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Showing posts from January, 2013

कुछ बहुत, कुछ - कुछ; कुछ बहुत कुछ, बहुत - कुछ

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कुछ बहुत कुछ कहते हैं... बहुत कुछ कुछ नहीं कहते...!!!...कुछ लोग कुछ विशेष  कार्य न करके भी कुछ न कुछ खासियत जोड़ कर कुछ न कुछ अपने ही बारे में बहुत  लोगो को  कुछ बताते रहते हैं !!!.. जबकि ... बहुत लोग बहुत कुछ उल्लेखनीय कार्य  करने के बाद भी कुछ लोगो को भी कुछ नहीं बताते...!!! कुछ बहुत कुछ में से  निकालने के लिए कुछ बहुत कुछ कुछ कार्य करते हैं...कुछ बहुत कुछ कार्य होते  हुवे भी कुछ नहीं करते...

camel fastival :- बर्फानी ओढणी सूं बारै आ पूग्या मरुधरा रौ जहाज देखण नै

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photo - Aalam Husain Sindhi BKN photo - Aalam Husain Sindhi BKN बर्फानी ओढणी सूं बारै आ पूग्या मरुधरा रौ जहाज देखण नै बीकानेर।  अंतरराष्ट्रीय ऊंट उत्सव मांय राजस्थानी, खास तौर सूं मरुनगरी रा लोक रंग मांय देश विदेश रै पावणां नै आपणोपण दिस्यौ। लोकवाद्यों री ताण सुकून दिरायो। बाळू रा लहरदार धोरां माथै दिन भर मुळकती धूप अ‘र  ठंडी टीर रात्यां मांय इनै सूं बिनै थिरकती चांदनी। फेस्टीवल रौ आखिरी दिन स्टेडियम में परंपरागत रूप सूं सज्योड़ा धज्योड़ा ऊंट। उमंग-उल्लास अ‘र उत्साह सूं गावंता नाचता लोक कलाकार। इण सब रौ हिवड़ै तांईं खुशी भरियोड़ा आनंद सूं निहारता सैलानियों रा झुंड। रेत रै इण समन्दर बिचाळै बस्योड़ो बीकाणे रौ ओ रूप ही तो सावन बीकानेर री लोकोक्ति पछै अबै पूस री रात बीकानेर री नूवीं नकोर-उक्ति रच रैयो है। मरुनगरी बीकानेर। राव बीकाजी रौ बीकाणो। अठै सावन मांय  प्रवासी तो पूगणा तय ही है। अबै नूवां आयाम स्थापित कर रैया है देश विदेश रा सैलानी। सावन नीं पण पूस री रात बितावणनै। हां जी। विगत मंे कुछ बरसां सूं अठै  पौष मास में यानी जनवरी महीने में अंतरराष्...

गढ़ों में गुमटियां ज्यों प्रहरियों की यारों

गढ़ों में गुमटियां ज्यों प्रहरियों की यारों    जलसों में गुटबंदी   त्यों   रहबरों की यारों         जख्मे जिगर कह रहे थे शहर पनाह पे चिल्ला के नजराना शय ही ऐसी है सनद रहे यारों 

हर दफतर में, नांगनि सां बिर भरियल आहिनि

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*BAHUBHASHI* *खबरों में बीकानेर*🎤 🌐   ✍️   🙏 मोहन थानवी 🙏   #Covid-19 #pm_modi #crime #बहुभाषी #Bikaner #novel #किसान #City #state #literature #zee Khabron Me Bikaner 🎤  सच्चाई पढ़ें । सकारात्मक रहें। संभावनाएं तलाशें ।   ✍️  हर दफतर में, नांगनि सां बिर भरियल आहिनि * पंध परे जा * ** पुस्तक परिचय शाइरु - मुरली गोविंदाणी  प्रकाषक - ेंग 34 आदिपुर 370205 कछ गुजरात         टेलीफोन 0236 261150 संस्करण - 2012  पंध परे जा असां कीअं सडायूं त सिंधी आहियूं / न असां खे मिलियो सिंधु देश जो टुकरो / न रहियो आ असां जो वेसु को हिकड़ो / असां त हर देश जा पांधी आहियूं /असां कीअं सडायूं त सिंधी आहियूं ।  इनि पंजकिड़े मंझ सिंधी समाज जो उवो सूरु साम्हूं अचे थो जेको विरहांङे बैद वधंदो इ रहियो आहे। तकरीबनि 66 वरिहयह अगु जेको सूरु दिल डुखाइंदो रहियो आहे उनिजो को इलाजु बि को हकीमु वैदु कोन करे सघंदो। सिंधी साहित्यकारनि इनि सूरु खे पहिंजे रचनाकर्म म...

तारीख भी क्या कमाल करती...रोशन राहों पे ला सजा देती है...

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तारीख भी क्या कमाल करती है  तारीख भी क्या कमाल करती है चेहरे पे चेहरे लगा औरों को मोहरा बनाने वालों को स्याह कोठरी से निकाल रोशन राहों पे ला सजा देती है तारीख भी क्या कमाल करती है कैलेंडर के पन्नों में खुद बदल जाती दुनिया में इतिहास बदल देती है घंटे पहले डुबो देती सूरज और छह घंटे बाद फिर सूरज उगा देती है तारीख भी क्या कमाल करती है चेहरे पे चेहरे लगा औरों को मोहरा बनाने वालों को स्याह कोठरी से निकाल रोशन राहों पे ला सजा देती है

हजार हवेलियों का शहर के रचनाकार श्री उपध्यानचंद्र कोचर

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Shri U C Kochar - Bikaner Raj.                                                                                                                                                                                                                                                                                    ...

ये प्यास है ही बड़ी ... आब की बात है प्यास की बात है

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प्यास प्रेम की हो या सूखे कंठ की ऋतु हो सर्द या बासंतिक चले हवा ऋतु हो परिवर्तन दौर में या हिम सा ठंडा हो प्रांगण चलती जब हवा गर्म इसी प्यास के  बहाने पिघलते हिमालय के दहाने ये प्यास है ही बड़ी ... आब की बात है प्यास की बात है

When life does not find a singer... उथो जागो त पहिंजी इन्हींअ सिंधु खे ठाह्यूं

When life does not find a singer to sing her heart, she produces a philosopher to speak her mind.           –KHALIL GIBRAN (1883-1931)  नई टेहीअ खे बि सिंधु संस्कृति ऐं सिंधीयत जी अहमियत जी जाण बखूबी आहे ऐं हिमथायो व´े त कहिं शक जी गाल्हि कोन आहे कि अचण वारे वक्ति में सिंधु संस्कृति जी जोत दुनिया जी कुंड कुड़झ में वरी उवांई भभके जीअं हजार वरियह अगु चिमकंदी हुई। उथो जागो त पहिंजी इन्हींअ सिंधु खे ठाह्यूं ... उथो जागो त- उथो जागो त पहिंजी इन्हींअ सिंधु खे ठाह्यूं अजमेर इन्दौर न उल्हास नगर हिन्द सजी सिंधु समझयूं असां सभई भाउर विकणी सभु बुराइयूं पहिज्यूं, चंङाई ठाह्यूं सच्चा व्यापारी चवायूं सिंधी हिन्दु जी कुण्ड-कुड़छ में जोति जगायूं सिंधी उथो जागो त पहिंजी इन्हींअ सिंधु खे ठाह्यूं जेका विसामिजण ते आहे सिंधियतजी उवाई वडी जोति भभिकायूं पहिंजे बारनि जे- जीवन खेत में खोटयूं कर्म जो दरिया वाह्यूं पसीनो थे खीरु मिठ्ठो खारायूं पहिंजे बारनि खे व्यापार जो गुण साणु पहिंजियूं रितियूं उथो जागो त पहिंजी इन्हींअ सिंधु खे ठाह्यूं...

सुपने जी हत्या मंझु रंगकर्म जी खुशी

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  *BAHUBHASHI* *खबरों में बीकानेर*🎤 🌐   ✍️   🙏 मोहन थानवी 🙏   #Covid-19 #pm_modi #crime #बहुभाषी #Bikaner #novel #किसान #City #state #literature #zee Khabron Me Bikaner 🎤  सच्चाई पढ़ें । सकारात्मक रहें। संभावनाएं तलाशें ।   ✍️  सुपने जी हत्या मंझ रंगकर्म जी खुशी पुस्तक परिचयनाटक -      हत्या हिक सुपने जी ( Besed on Cross purposes – Albert Camus ) लेखक - हरिकांत जेठवानी  प्रकाषक - सुनील जेठवानी,         राजकोट 360007         संस्करण 2012  सुपने जी हत्या मंझ रंगकर्म जी खुषी सिंधी साहित्य जगत मंझ हरिकांत न सिर्फ नाटकनि लाइ बल्कि सिंधु समाज, साहित्य धारा ऐं आखाणी जे संपादन जे करे हमेषह याद रहिण वारो नालो आहे। पहिंजी लंबी हिंदी कविता एक टुकड़ा आकाष समेत हरिकांत हिंदी साहित्य संसार जो बि जातलि सुञातलि लेखक आहे। कविता में नवाचार ऐं पहिंजी कहाणिनि में समाज जी नुमाइंदी कंदड़ चरित्रनि खे बुलंद सिंधी जुबान डिअण वारे...

कार्य फल तय है, जय हो

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अनचाहे किया जाने वाला कोई काम पूर्णता को प्राप्त नहीं हो सकता। कोई न कोई कसर रह ही जाती है। हां, शनै शनै कार्य का आनंद आने पर यदि कर्ता अनचाहे शुरू किए गए कार्य से दिल लगा लेता है तो उसे शिखर छूने का अवसर भी मिल जाता है। महापुरुषों से संबंधित बहुत से ऐसे उदाहरण हम आप गाहेबगाहे पढ़ चुके हैं। ख्याति-सीमा के मध्यनजर भी बहुत सी शख्सियतों के ऐसे वक्तव्य पत्र पत्रिकाओं में पढ़ने को मिल जाते हैं। इसीलिए अनुभवी, ज्ञानी, बुजुग कहते हैं कि काम कोई भी हो, मन लगा कर, आनंद लेकर, काम को पूजा मान कर करने वाले को सफल होने से कोई रोक नहीं सकता। अनचाहे, अनमना हो कर कोई काम शुरू कर ही दिया हो तो उसे अभी से आनंदित होकर कीजिए। काम अनचाहा नहीं रहेगा, आप भी स्वयं को अनमना नहीं पाएंगे। तय है। जय हो।

भीड़ में तनहा यात्रिक

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भीड़ में तनहा यात्रिक खो गया है आदमी भीड़ में तनहा हो गया है आदमी यात्रिक है मगर सोया हुआ है आदमी यात्रा के हर पड़ाव पर अपने आपको ढूंढ़ता है आदमी

किस्सा-ए-प्रस्तर उद्धारक

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किस्सा-ए-प्रस्तर उद्धारक ‘लंबी कविता’ अक्सर तुम्हारा चेहरा आईने में देखता हूं मक्कारी से भरा कुटिल मुस्कान वाला शख्स मैं तो नहीं आईना झूठ नहीं बोलता किसी भी घर में लगा हो तुम्हारे घर शायद कोई आईना नहीं वरना मेरी शक्ल देख लेते अब भूल जाओ अपने पापों को प्रस्तर बनने के शापित हो तुम प्रस्तर उद्धारकों को तो पूजा जाता है, हे पापी इसे भूलना नहीं द्रोणाचार्य मांगते हैं आज भी मगर एकलव्य देते नहीं दिखाते हैं अंगूठा दधिचि अब ढूंढे़ नहीं मिलते मगर बस्तियों में लगे हैं हड््िडयों के ढेर अक्सर ऐसे ढेर पर बिखरा-बिखरा तुम्हारा चेहरा देखता हूं खाल विहीन रक्त-पिपासु इस दुनिया में कोई दूसरा तो है नहीं     याद रखो भूलो मत हरिष्चद्र की संतान कोई जीवित नहीं आघात बड़ा है कफन न होने का, वक्त जाता है ठाठ-वैभव को चाट संवाद तंत्र पंचतंत्र से सीख और साध हित हितोपदेष से अतीत के अंधे-सागर में लगा डुबकी पुराण सुना और बटोर दक्षिणा प्रस्तर उद्धारकों के ही प्रस्तर पूज और पापियों को बदल डाल प्रस्तरों में खड़ा कर दो चौराहों पर नगर-रखवालों को, खाली करवा दो नगर अक्सर तुम्हारे जैसे चेहरे वालों को नगर मे...

अट्टू-पट्टू की उधारी

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अट्टू-पट्टू की उधारी   (हास्य  -- सिन्धी से अनुवादित) --- (अरबी सिन्धी मे ये श्रंखला हिन्दू डेली अजमेर से २०१० में पब्लिश  हो चुकी है  )................................. बीमारी की बदकिस्मती। बरसात के मौसम में वह अट्टू को जा लगी। बदन दर्द, सर्दी, खांसी, जुकाम हां भाई हां ये सब। मौसम को कोसते हुए अट्टू साहिब ने दो दिन में तीन डॉक्टर बदल लिये। इन बीमारियों में से एक भी कम नहीं हुई बल्कि थकान की बीमारी और बढ़ गई। चाइनाराम सिन्धी हलवाई की सिन्धी मिठाई सिन्धी हलवा के टीन के एक डिब्बे में अट्टू साहिब ने ठूंस ठूंस कर टेबलेट्स की स्ट्रिप्स रखी। साथ में इनव्हेलर, बाम और एक थर्मामीटर भी सहेजा। चार दिन बाद तो उन्हंे आफिस से भी फोन आने लगे - आफिस आ जाओ भैया वरना विदाउट पे माने जाओगे। अट्टू साहिब भला ऐसा कैसे होने देते, सो पांचवें दिन जा पहुंचे आफिस। पिऑन से लेकर बड़े साहब तक सबसे पहले उन्होंने ‘जय हो’ से दुआ-सलाम की। फिर अपनी सीट पर बैठे तो पूछापाछी के लिए साथियों ने तांता लगा दिया। चार दिन में अलग अलग डॉक्टरों का अनुभव लेने वाले अट्टू साहिब भला ऐसा मौका क...

फैला पंख और भर उड़ान...

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उड़ान.. .  आकाश असीम और खुला है फैला पंख और भर उड़ान गा नवगीत और स्थापित कर नव आयाम