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Showing posts from July, 2015

अंजाम

धैर्यवान काठ की हाँडी बार बार खुद को आग से परे रहकर जलने से बचती और खिचड़ी पकाकर स्वार्थी को देती रही। एक दिन उसे लोगोँ को बेवकूफ बनाने वाले स्वार्थी पर हँसी आ गई। उसने स्वार्थी की खिचड़ी नष्ट कर अपनी महत्ता बताकर ख्याति पाने की गरज से आग से दूरी घटा ली। वो अधिक देर मुस्करा न सकी और जल गई। अट्टृ – काठ की हाँडी क्योँ मुस्कराई? पट्टृ – स्वार्थी को हदेँ पार करने मेँ लाज न आती देख। अट्टृ – फिर जली क्योँ? पट्टृ – खुद भी स्वार्थी होकर। 00000000000 अट्टू बीमार पत्नी पट्टू की तीमारदारी करते करते खुद बीमार हो गया। सेवा की बारी पत्नी की थी। पट्टू – ऐ जी उठो, नीँद की गोली खाए बिना ही सो गए।
बालू की चिट्ठी - मेघ के नाम इस तरह बूंद बूंद रिसते बरसते पर उमस करते हो ? मेघ तुम थार के जीवन पर कुठाराघात करते हो ? आशाओं की पैदावार के बीज बालू-कणों में फूटने से पहले तेज नागौरण के वेग से इधर के उधर पहुंच जाते और तुम मेघ... तेजी से उन्हीं के साथ थार पर मंडराते कहीं के कहीं क्यों निकल जाते ? है तो यह अन्याय तुम्हारा तुम्हारी निष्ठुरता से यहां का ‘‘धन’’ प्यासा रह जाता धन का अमृत बना दिया जाता मावा लकड़ियां और टहनयिां झाड़ियां फोग भी भेंट भट्टियों के हो जाते चूल्हा धुंआता न धुंआता मरुस्थल की हवा धुआं जाती मेघ तुम जब धुआं बन जाते इस अफसोस में हळधर की आंख भी धुआं जाती सावन-भादौ की गोठें जब यहां पुकारती प्रवासियों को मेघ तुम क्यूं नहीं गरजते सचमुच मेघ... तुम जब बरसते हो गांव-गांव औ’र शहर शहर एक चमन-सा बन इसी मिट्टी में फनां हो जाने को उकसाते सचमुच ! मेघ ! किंतु तुम निष्ठुर हो नहीं बरसते तो नहीं बरसते रिसते तो फकत रिसते हो इस तरह बूंद बूंद रिसते बरसते पर उमस करते हो ? मेघ तुम थार के जीवन पर कुठाराघात करते हो ?