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Showing posts from July, 2012

आकाश मेरा है "नारी की ये कहानी नहीँ हकीकत है"

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आकाश मेरा है सिंधी से अनूदित कहानी .../ *BAHUBHASHI* *खबरों में बीकानेर*🎤 🌐   ✍️   🙏 मोहन थानवी 🙏   #Covid-19 #pm_modi #crime #बहुभाषी #Bikaner #novel #किसान #City #state #literature #zee Khabron Me Bikaner 🎤  सच्चाई पढ़ें । सकारात्मक रहें। संभावनाएं तलाशें ।   ✍️  आकाश मेरा है  अचानक कुछ हो जाए तो...! इस विचार ने नरेश को झकझोर दिया। उसे मघी की चिंता हुई। मघी, उसकी अर्द्धांगिनी। उसके सुख दुख की सहयोगी। जब भाई बहिन और मां बाप तक ने बीमारी में उसकी सुध नहीं ली तब भी मघी ने हिम्मत नहीं हारी। वह उसे मातृत्व का सुख नहीं दे सका किंतु मघी ने कभी गिला शिकवा नहीं किया। ऐसे विचार नरेश को उद्वेलित कर रहे थे। वह अपने गांव से बहुत दूर दिल्ली के एक नामी अस्पताल के वार्ड में एक अशुभ माने जाने वाले पलंग पर जीवन के लिए मौत से लड़ रहा था। पिछले कुछ दिनों से अस्पताल में डॉक्टरों से घिरा रहने के कारण वह घबरा गया। दिल्ली के इस अस्पताल में करीब 45 डॉक्टर है। नरेश को पेट का कोई रोग है। दवा क...

पनघट पर परंपरा मुंह छुपाए खड़ी

घास खाने को नहीं मिलती बरसात के बाद जल गई तेज धूप से मैं पषुओं को ले दर-दर भटकता रहा षहर और गांवों में टीवी, रेल, हवाई जहाज, आलीषान मकान व्ैाज्ञानिकों का सम्मान सबकुछ देखा न देखा तो केवल कहीं बच्चों का स्वछन्द खेलना कहीं हराभरा खेत और पषु धन के लिए घास संस्कृति एक कोने में दुबकी गांव के पनघट पर परंपरा मुंह छुपाए खड़ी मेरे बेजुबान पषुओं के पास जो निरीह आंखों से ढूंढ़ रहे घास ( मोहन थानवी के हिंदी उपन्यास काला सूरज से ...)

मित्र सुरेश की काव्य पंक्तियां...

मित्र  सुरेश हिंदुस्तानी की काव्य पंक्तियां... विस्मृत प्यार... तुम्हारे प्यार में विस्मृत है प्यार के अर्थ शब्द, ताल, लय किसी बंद गली से। .............. शर्मसार.... अब कितना तरल हूं हर सांचे में, ढला जाता हूं कहीं भी तो नहीं मुझमें कुछ ऐसा जो चट्टान - सा दिखे कहे गर्व है तुम पर .......... इमारत... ऊंची इमारतों के भीतर घुसने के लिये जरूरी है घटा लें कद को झुका लें चेहरे को। दरवाजों से इंसाफ की उम्मीद बेकार है दोस्त वे अपने कद से कभी नहीं बढ़ते हटा जरूर लिये जाते हैं कभी - कभी अपनी जगह से पर तब भी इमारत भीतर से नहीं बदलती जन्म देती है, सैकड़ों दरवाजों को अपने भीतर, गहरे तक ............... मौसम... मौसम तुम भी हो गये मेरे इर्द - गिर्द बिखरे चेहरों से ओढ़ लिये बिछा लिये कृतिम मुस्ककुराहटों के वसन काश बन पाता मैं भी तुम्हारी तरह तब तुम आते समय - समय पर कई बसंत मेरे भीतर

जायसी का बारहमासा :: Pressnote.in

जायसी का बारहमासा :: Pressnote.in

नाटक - कितना-सा द्वंद्व :: Pressnote.in

नाटक - कितना-सा द्वंद्व :: Pressnote.in

दर्द...दर्द

दर्द आंख उठाकर देख सकता नहीं नजर मिला सकता नहीं देता जो हमेशा दूसरों को तिरस्कार अपनापन किसी से ले सकता नहीं हृदय तो उसका भी व्यथित होता होगा जब कोई उसे हिकारत से देखता होगा अपनों में रहता होगा पराया बनकर परायों में ढूंढ़ता होगा अपना रो.रोकर जीवन में किसी को दी नहीं जिसने खुशी जरावस्था में किसे बताएगा वह अपना दर्द अस्तांचल का सूर्य नहीं वह जिसने सुबह किया आशा का संचार दोपहर में दिखाये तेवर तीखे फिर दूसरे दिन आ जायेगा नई उमंग के साथ दुपहर की तल्खी लेकर दर्द में डूबा जोे वह तो नश्वर है मानव है दर्द दिया तो दर्द ही पायेगा

नींद में जागा-जागा- सा... ...वह भागता रहा

bahubhashi:  नींद में जागा-जागा- सा......वह भागता रहा वह यूं ही भागता रहा उसके पीछे...  इंद्रधनुष को पकड़ने  वह कल से आज तक भागता रहा  हर बार वह बस... थोड़ी दूर ही रह गया वह यूं ही भागता रहा उसके पीछे... इंद्रधनुष को पकड़ने वह कल से आज तक भागता रहा हर बार वह बस... थोड़ी दूर ही रह गया उसके हाथ न आया। मंदिर-मस्जिद, चर्च-गुरुद्वारा वह हर दिन जाता शीष नवाता प्रार्थना करता प्रसाद पाता प्रवचन सुनता। शांति की चाह में उद्वेलित मन से जाता अषांत ही लौटता वह भागता रहा कल से आज तक श्ंाांति की चाह में। खेत-खलिहान में पसीना बहाया पषुधन के साथ भरी दोपहरी अंधेरी रातों में टाट बिछा धुआं-धुआं फिजां धुंधलाती रोषनी भूखा पेट वह सालों से सोया सोचता था  उठेगा तो सुनहरा कल होगा नींद में जागा-जागा- सा... ...वह भागता रहा सुनहरे भविष्य के पीछे उसकी तमन्नाओं की तस्वीर  रंगों को तरसती रही वह कुंची लिए जीवन तलाषता रहा केनवास पर उकेरी रेखाओं को गहरा देने की उसकी चाहत बेनूर ही रही चुनाव होते रहे वह 55 का हो गया बचपन के पीछे भागता...

वह यूं ही भागता रहा उसके पीछे.... उसकी चाहत बेनूर ही रही चुनाव होते रहे

वह यूं ही भागता रहा उसके पीछे... इंद्रधनुष को पकड़ने वह कल से आज तक भागता रहा हर बार वह बस... थोड़ी दूर ही रह गया उसके हाथ न आया। मंदिर-मस्जिद, चर्च-गुरुद्वारा वह हर दिन जाता शीष नवाता प्रार्थना करता प्रसाद पाता प्रवचन सुनता। शांति की चाह में उद्वेलित मन से जाता अषांत ही लौटता वह भागता रहा कल से आज तक श्ंाांति की चाह में। खेत-खलिहान में पसीना बहाया पषुधन के साथ भरी दोपहरी अंधेरी रातों में टाट बिछा धुआं-धुआं फिजां धुंधलाती रोषनी भूखा पेट वह सालों से सोया सोचता था   उठेगा तो सुनहरा कल होगा नींद में जागा-जागा- सा... ...वह भागता रहा सुनहरे भविष्य के पीछे उसकी तमन्नाओं की तस्वीर   रंगों को तरसती रही वह कुंची लिए जीवन तलाषता रहा केनवास पर उकेरी रेखाओं को गहरा देने की उसकी चाहत बेनूर ही रही चुनाव होते रहे वह 55 का हो गया बचपन के पीछे भागता रहा वह तरसता रहा मां की गोद पिता के स्नेह पाने  और दादा-दादी नाना-नानी से कहानी सुनने को कापी-किताबों का बोझ उसके बस्ते में था ज्ञान पाने को बेताब वह रोजगार पाने के लिए ...

चित्र-मंडित हो मूक रहे जो वह मेरा जीवन नहीं ( काव्यांश ...)

काव्यांश ... मत भूल संसार में अंग-देश भी है एक और राजा-चित्ररथ6 की रानी है प्रभावती प्रस्तर-चित्र बनना है अगर तो सूर्य-चित्र का प्रत्यंकन 7 कर जीवन में चित्र-मंडित हो मूक रहे जो वह मेरा जीवन नहीं, जीने की कला का प्रत्यंकन होता नही बंदूकों के साये और बमों के धमाके में खुलते नहीं फाटक सुख-महल8 के बंद फाटकों में तो रंभाते हैं गोवंश भी, पीड़ा व्यक्त कर पाते नहीं अजगर लिपटा रहता है चंदन से जो महकता है   फूत्कार जहरीली फिर भी अजगर की, उसकी वृत्ति बनी रहेगी हंतक खुशियों के तुमसे और क्या आशाएं रख सकता है जमाना अजगर के फूत्कार से भी तप्त वायु और क्या होगा तेरी सांसों के सिवाय प्रस्तर फिर भी पिघल सकता नहीं, ज्वालामुखी का लावा चाहिये उद्धारक आयेगा जरूर बदलकर चेहरा तुम्हारा या कि मेरा.... ( अंगदेश - काया, /राजा-चित्ररथ - वाणी, जीवन, मन, /प्रत्यंकन - नकल,/ प्रभावती - प्रभावकविता-अंश ... मत भूल संसार में अंग-देश भी है एक और राजा-चित्ररथ6 की रानी है प्रभावती प्रस्तर-चित्र बनना है अगर तो सूर्य-चित्र का प्रत्यंकन7 कर जीवन में चित्र-मंडित हो मूक रहे जो वह मेरा जीवन नहीं, जीने की कला का प्रत...

अध्यात्म और प्रबंधन - 1 कर्म, प्रबंधन और फल

अध्यात्म और प्रबंधन - 1 कर्म, प्रबंधन और फल ं भीतर के द्वन्द्व और उमड़ते विचारों को षब्दाकार देना अज्ञान को दूर करने के लिए ज्ञान की खोज में षब्दयात्रा है। यह भी कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता भले ही  हो लेकिन विचारों से किसी को ठेस पहुंचती हो तो अग्रिम क्षमायाचना। हां, विद्वानों का मार्गदर्षन मिल जाए तो जीवन सफल हो जाए। भारतीय संस्कृति में जीवन की सफलता की खोज अध्यात्म के माध्यम से की जाती रही है। अध्यात्म में भी कुषल प्रबंधन को मैंने महसूस किया है तो इसके लिए कर्म किया जाना भी अनिवार्य लगा है। अध्यात्म में कर्म है ज्ञान प्राप्ति का प्रयास।  और जीवन की सफलता को फल कह सकते है। जीवन प्रबंधन से ही व्यवस्थित और सुखमय हो सकता है। बिना प्रबंधन के तो चींटी भी नहीं जीती। चींटी ही क्यों, प्रत्येक प्राणी को समूह में जीते ही हम देखते हैं। ऐसा कोई प्राणी नहीं जो अकेला जीता हो या आज तक जीया हो। पेड़-पौधों को भी समूह में लहलहाना अच्छा लगता है क्योंकि वे भी बीज रूप से प्रस्फुटित होने से लेकर मुरझाने तक एक कुषल प्रबंधन प्रणाली से विकसित होते हैं, फल देते हैं। जीवन...

ताउम्र साथ रहता है बचपन...

बचपन खेल-खिलौनों तक ही नहीं सिमटा रहता बचपन दादी -नानी और दादा -दादी के साथ बीतता है बचपन कहानियों के दौर से भी आगे यादें समेटता है बचपन ज्ञानार्जन करता है बड़े भाई - बहिनों से बचपन आस पड़ोस के लोगों से भी बहुत कुछ सीखता है बचपन घर के आंगन में उतरने वाली चिड़िया से भी खेलता है बचपन किसी किसी घर के आंगन में किसी पिंजरे को भी कौतूहल से देख्ता है बचपन पिंजरे में बंद मियां मिट्ठू से तुतलाकर आजादी की बोली भी बोलता है बचपन कहीं चारदीवारी के एक हिस्से में बंधी गाय की पूंछ पकड़ने की चेष्टा भी करता है बचपन कार्तिक में ब्याही भूरी कुत्ती के नन्हें प्यारे पिल्लों को अजीबोगरीब नाम भी देता है बचपन पत्ते बदलते देख पेड़ों के मन की पीड़ा समझने की चेष्टा भी करता है बचपन परियों-सी तितलियों की उड़ानं को भी अपने में समाता है बचपन.... इसीलिए तो ... ताउम्र साथ रहता है बचपन... 

परवाज के लिये कोंपलों के हौसले बुलंद है -- सम्मति - मीनाक्षी स्वर्णकार की काव्यकृति ‘‘कोंपलें’

सम्मति - मीनाक्षी स्वर्णकार की काव्यकृति ‘‘कोंपलें’’ परवाज के लिये कोंपलों के हौसले बुलंद है। क्योंकि सृजन के प्रति समर्पण है। जहां समर्पण होता है वहां लगाव भी स्थायी तौर से वास करता है। शब्द-शब्द चुन-चुनकर रचना-संसार को आकार देने वाली कलम में ऐसी ही समर्पण की स्याही भरकर मीनाक्षी स्वर्णकार ने सृजन की परवाज पर कोंपलें उकेरी है। अभिव्यक्ति के कितने ही तरीके हो सकते हैं मगर काव्याभिक्त संस्कृत-काल से लेखन-संस्कृति में शीर्ष पर रही है। मीनाक्षी स्वर्णकार के काव्य-संग्रह कोंपले में 67 काव्य आकृतियां हैं और सभी मन के आईने अंकित हो जाती है। इनमें से संवेदनाओं को जगाती ओस की बूंद अन्तस को भिगो देती है। बावरी-सी ओस की बूंद/ हरी-हरी पत्तियों से गिरकर/ फैल गई सुनहरी धरा पर/ कुछ इठलाती, कुछ इतराती-सी/ खालिस मोतियों की तरह/ चारों ओर बिखरकर/ आलिंगन करने लगी/ सूखी बिखरी घास का/ और अपना सारा यौवन/ इन्हें सौंपकर/ समा गई इनके अंतःकरण में हमेशा हमेशा के लिये/ ये बावरी-सी ओस की बून्द।  (पृष्ठ 31) काव्य-रस से जब तक संवेदनाएं भीगें नहीं, पाठक को भी शीतलता की प्राप्ति नहीं होती। ऐसी ही शिल्पगत प्रवृत्त...

परवाज के लिये कोंपलों के हौसले बुलंद हैसम्मति - मीनाक्षी स्वर्णकार की काव्यकृति ‘‘कोंपलें’

सम्मति - मीनाक्षी स्वर्णकार की काव्यकृति ‘‘कोंपलें’’ परवाज के लिये कोंपलों के हौसले बुलंद है। क्योंकि सृजन के प्रति समर्पण है। जहां समर्पण होता है वहां लगाव भी स्थायी तौर से वास करता है। शब्द-शब्द चुन-चुनकर रचना-संसार को आकार देने वाली कलम में ऐसी ही समर्पण की स्याही भरकर मीनाक्षी स्वर्णकार ने सृजन की परवाज पर कोंपलें उकेरी है। अभिव्यक्ति के कितने ही तरीके हो सकते हैं मगर काव्याभिक्त संस्कृत-काल से लेखन-संस्कृति में शीर्ष पर रही है। मीनाक्षी स्वर्णकार के काव्य-संग्रह कोंपले में 67 काव्य आकृतियां हैं और सभी मन के आईने अंकित हो जाती है। इनमें से संवेदनाओं को जगाती ओस की बूंद अन्तस को भिगो देती है। बावरी-सी ओस की बूंद/ हरी-हरी पत्तियों से गिरकर/ फैल गई सुनहरी धरा पर/ कुछ इठलाती, कुछ इतराती-सी/ खालिस मोतियों की तरह/ चारों ओर बिखरकर/ आलिंगन करने लगी/ सूखी बिखरी घास का/ और अपना सारा यौवन/ इन्हें सौंपकर/ समा गई इनके अंतःकरण में हमेशा हमेशा के लिये/ ये बावरी-सी ओस की बून्द।  (पृष्ठ 31) काव्य-रस से जब तक संवेदनाएं भीगें नहीं, पाठक को भी शीतलता की प्राप्ति नहीं होती। ऐसी ही शि...

झोली भर दुखड़ा अ’र संभावनावां रा मोती (एक डाक्टर की डायरी)

झोली भर दुखड़ा अ’र संभावनावां रा मोती झोली भर दुखड़ा (एक डाक्टर की डायरी) मूल हिंदी  - डा श्रीगोपाल काबरा  राजस्थानी अनुवाद - श्री बिहारीशरण पारीक प्रकाशक - बोधि प्रकाशन,  झोली भर दुखड़ा अ’र संभावनावां रा मोती हिंदी सूं  राजस्थानी में उल्थौ कहाणी संग्रै झोली भर दुखड़ा कै मायं भावनावां की लहरां माथै संभावनावां की नाव तैरती दिखै। मायड़ भाषा में मोती जियां चिमकता आखर। नाव में सवार है रोगी अ’र पतवार चलावण रौ काम दूजा पात्र नीं बल्कि कलमकार री आपणी अनूठी शैली करै। श्री बिहारीशरण पारीक इण कहाणियां को उल्थौ कर्यो है जिकी हिंदी में डा श्रीगोपाल काबरा रची अ’र डायरी विधा नै नूवां आयाम दिराया। हालांकि आ डायरी री शिकल में कोनी पण अेक डाक्टर री डायरी मायं इसौ शिल्प रच्यो गयो है जिकै सूं आंख्यां सामै को दरसाव किताब कै पाना माथै पाठक नै दूरदर्शन करावै। संग्रै में मरीज अ’र उण रै परिवारवालां सागै सागै अेक डाक्टर री उण पीड़ री दास्तान है जिकी हंसती खेलती जिनगाणी में आज कै समै री खुशरंग चादर माथै दुख तकलीफ रै मवाद सूं भर्योड़ी बीमारी सूं बणयोड़ो पैबंद है। पीड़ रा भी कितराइ दरस...

पिता ऐसा ही कहते हैं

पिता ऐसा ही कहते हैं बढ़ता अनाचार रिश्तों को डुबो रहा आंख का पानी सूखा इशारे बेमानी हुए जमाना पैसे की गुड़िया का दास बना कलपुर्जों की भीड़ में इनसान कहां होंगे आदमी को ढूंढ़ता रोबोट पृथ्वी पर आएगा युग बीते कितने इतिहास में नहीं दर्ज हुए पुराण कथाओं के किस्से पिता कहते हैं बीत रहा युग नया जमाना आएगा खेलने की उम्र में अपने ही बच्चों को खेलाएंगे पिता ऐसा ही कहते हैं हर बार लगता रहा हैरानगी बढ़ी जानकर समाज सोता रहा पता चला मानव अपना ही गुर्दा बेच रहा रिश्ते रिसते रहे जीवन एकाकी बनता रहा शाख से शाख न निकली पेड़ ठूंठ बन गया फूलों का मकरंद कहां भंवरा ढूंढ़ता रहा

यत् ब्रह्माण्डे तत् पिण्डे

यत् ब्रह्माण्डे तत् पिण्डे - 1 - यत् ब्रह्माण्डे तत् पिण्डे - - लेखक श्री सुदर्शन शर्मा "रथांग" मुंबई  जो ब्रह्माण्ड में है वही पिण्ड अर्थात षरीर में है। सृष्टि रचना के पूर्व, केवल ब्रह्माण्ड अर्थात गोलाकार ब्रह्म था जिसे आधुनिक वैज्ञानिक भी मानने लगे हैं और उन्होंने इसे ‘ब्लैक होल’ कहा है - कृष्ण मंडल।  कल्पान्त में सभी कुछ इसषून्य में, कृष्ण मंडल में, ब्रह्म में समाहित था। ब्रह्म के मन में विचार उत्पन्न हुआ, एकोऽहम् बहुस्याम् - एक हूं अनेक हो जाऊं। उस विचार की प्रतिध्वनि कृष्ण मंडल में गूंजी और वह ब्रह्म के अहम् की ध्वनि अऽउम अर्थात ऊ ंके स्वरूप में प्रतिष्ठित हुई। यह ध्वनि थी,षब्द रूप थी इसे नाद ब्रह्म की संज्ञा दी गई। षब्द अथवा ध्वनि की उत्पत्ति किन्हीं दो पदार्थों के स्पर्ष से ही संभव है। अब जब प्रारंभ में केवल ब्रह्म ही था, प्रकृति पूर्णतःषून्य स्थिति में थी तो फिर स्पर्ष कैसा! सर्व साधारण मनुष्यों को समझाने हित ब्रह्म की उपका आकाष से की गई है। आकाष को प्रकृति के पांच तत्वों में से एक और प्रथम तत्व माना गया है। आकाष अर्थात अवकाष रिक्ता और इसका आकार गोल ही...