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दर्द...दर्द


दर्द
आंख उठाकर देख सकता नहीं
नजर मिला सकता नहीं
देता जो हमेशा दूसरों को तिरस्कार
अपनापन किसी से ले सकता नहीं
हृदय तो उसका भी व्यथित होता होगा
जब कोई उसे हिकारत से देखता होगा
अपनों में रहता होगा पराया बनकर
परायों में ढूंढ़ता होगा अपना रो.रोकर
जीवन में किसी को दी नहीं जिसने खुशी
जरावस्था में किसे बताएगा वह अपना दर्द
अस्तांचल का सूर्य नहीं वह
जिसने सुबह किया आशा का संचार
दोपहर में दिखाये तेवर तीखे
फिर दूसरे दिन आ जायेगा
नई उमंग के साथ
दुपहर की तल्खी लेकर
दर्द में डूबा जोे वह तो नश्वर है
मानव है
दर्द दिया तो दर्द ही पायेगा

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