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प्रलाप

प्रलाप   मित्र... अक्सर ख्वाबों में तुम्हें देखने की कोशिश की... कहां थे तुम ... जब नींद मुझे दुनिया से विलग करने का प्रयास करती थी... । अधखुली आंखों से मेरे होंठों पर प्रलाप होता था... तुम्हारे लिए। ... थे कहां तुम...। यूं मुझसे जुदा होने का सबब भी तो होना चाहिए तुम्हारे पास...। पहाड़ों के एक ओर ... जिधर सूर्य होता है.... रोशनी होती है। दूसरी ओर... जिधर रोशनी का इंतजार होता है... लोग होते भी हैं और मैं भी...। तब तुम उधर क्यों होते हो... जिधर रोशनी होती है। ओह... तुम्हें अब भी अंधेरा डराता है...। है न... मित्र । तुम्हें रोशनी पसंद है। सच कहूं... तुम बिन... मुझे भी डर लगता है...। अंधेरों से भी... और... रोशनी से भी। यही वजह है... मुझे रोशनी की बजाय... तुम्हारी जरूरत है.. मित्र।...

सुनहरा महल : कथा अंश

सुनहरा महल :  कथा अंश अचानक सामने जो देखा, यकीन नहीं हुआ। तसव्वुर में जरूर ऐसे नजारे किए लेकिन सामने... यथार्थ में... आश्चर्य ! कैसे तो ख्वाब आया ओर कैसे ख्वाब में ये नजारा आया फिर कैसे सामने हकीकत में देख कर आंखें चुंधिया रही हैं...! स्वप्न...! जरूर स्वप्न ही है ! बाहं पर चिकोटी काटी... उई...! जागते का नजारा है ये तो! वाह...! वाह...! सामने सुनहरा महल। महल के इर्द गिर्द खजूर के लंबी परछाइयों वाले पेड़। लंबी परछाइयां... वक्त सुबह का है या संध्या का... जानने का कोई साधन पास में नहीं ! यकबयक मंदिर की घंटियां सुनाई दी... संध्या... नहीं... नहीं... अलसभोर...। नहीं... निश्चित रूप से संध्या का समय है। मन ने कहा, अलसभोर हो तो पेड़ों की परछाइयां नहीं होती... सूर्य चमकने के बाद ही तो परछाइयों को पांव पसारने का मौका मिलता है। जरूर संध्या का समय है। सूर्यास्त के बाद परछाइयां सिमट जाएंगी। अपने आप में। आस पास के लोगों की तरह। ये सुनहरा महल भी दिखाई देना बंद हो जाएगा। आंख से ओझल हो जाएगा सब कुछ। लेकिन ये महल... इसका तो फकत तसव्वुर ही किया था कभी... साक्षात सामने कैसे आ खड़ा हुआ। अभी असमंजस के स...

सुनहरा महल : कथा अंश

सुनहरा महल :  कथा अंश अचानक सामने जो देखा, यकीन नहीं हुआ। तसव्वुर में जरूर ऐसे नजारे किए लेकिन सामने... यथार्थ में... आश्चर्य ! कैसे तो ख्वाब आया ओर कैसे ख्वाब में ये नजारा आया फिर कैसे सामने हकीकत में देख कर आंखें चुंधिया रही हैं...! स्वप्न...! जरूर स्वप्न ही है ! बाहं पर चिकोटी काटी... उई...! जागते का नजारा है ये तो! वाह...! वाह...! सामने सुनहरा महल। महल के इर्द गिर्द खजूर के लंबी परछाइयों वाले पेड़। लंबी परछाइयां... वक्त सुबह का है या संध्या का... जानने का कोई साधन पास में नहीं ! यकबयक मंदिर की घंटियां सुनाई दी... संध्या... नहीं... नहीं... अलसभोर...। नहीं... निश्चित रूप से संध्या का समय है। मन ने कहा, अलसभोर हो तो पेड़ों की परछाइयां नहीं होती... सूर्य चमकने के बाद ही तो परछाइयों को पांव पसारने का मौका मिलता है। जरूर संध्या का समय है। सूर्यास्त के बाद परछाइयां सिमट जाएंगी। अपने आप में। आस पास के लोगों की तरह। ये सुनहरा महल भी दिखाई देना बंद हो जाएगा। आंख से ओझल हो जाएगा सब कुछ। लेकिन ये महल... इसका तो फकत तसव्वुर ही किया था कभी... साक्षात सामने कैसे आ खड़ा हुआ। अभी असमंजस के स...

किताब के खुले पन्ने...

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किताब के खुले पन्ने... किताब के खुले पन्ने फड़फड़ाते पन्ने कितनी कथाएं कितने काव्य कितने नाटक अपने में सहेजे हुए हैं इन्हीं पन्नों में कहीं तुम्हारे संग मेरा भी अक्स उभर आता है कभी कभी जब हवा थम जाती है और किताबों के पन्ने गहरी खामोशी अख्तियार कर लेते हैं तब मेरे तुम्हारे अक्सों में बहुतेरे और अक्स गडमड हो जाते हैं हवा को थामने वाला फिर हवा चला नहीं पाता चला पाता तो कुछ कर पाता तो... जरूर करता पेड़ों को भंभोड़ता पत्तों को अपनी सांसों से गति देता ताकि हवा चले किताबों के पन्ने फड़फड़ाएं अक्स मुस्कराएं

बर्फ पिघल गई...

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बर्फ   पिघल  गई... धूप ने  दीवार  को  सहलाया  ... उसे  मिली  राहत  ... गौरैया  के  घोंसले  पे जमी  बर्फ  भी  पिघल  गई  ... मतवाली  हुई  हवा ... आशा  के  गीत  गूंज  उठे ... दूर  हुआ  निराशा  का  साया ...!
असबाब में असबाब, एक चंग एक रबाब आपके सान्निध्य में मन की बातें खुद ब खुद कलम से कागज पर उतरने लगती है। बड़ों ने अपने अनुभवों के इशारों में सच ही कहा है, पुस्तक सदृश्य और कोई मित्र नहीं। इसी तर्ज पर पाठक भी उसी श्रेणी के मित्र हैं जिस श्रेणी में पुस्तक को मित्र माना गया है। मित्रों में दिल की बात तो जुबां पर आती ही है। यहां माध्यम कलम है। बात कागज पर उतरती है। कलाकार, कलमकार की पूंजी और होती ही क्या है ! असबाब में असबाब, एक चंग एक रबाब। बस। हमारा यही संसार है। यही दौलत। कलम। कागज। दवात। यूं चंग डफ सदृश्य मंजीरा लगा हुआ वाद्य होता है। रबाब ऐसा वाद्य होता है जो सारंगी जैसा लगता है। इस साजोसामान से कलाकार, साहित्यकार आपसे, पाठकों से मित्रता का दम भरता है। पाठक भी बखूबी मित्र धर्म निर्वहन करते हैं। संबल प्रदान करते हैं। दिल की बात कागज के माध्यम से पाठक मित्रों तक पहुंचाने की बेमिसाल बानगी हमारे सामने ही है। सूचना और जनसंपर्क विभाग से सेवानिवृत्त अधिकारी एवं संपादक श्री मनोहर चावला जी ने भी दिल की बातें यहां साझा की है। चार फरवरी 2013 के अंक में भी। उन्होंने पत्रकारिता और सेवा अवधि सहित अ...

पेड़ फिर शाखाहीन होने लगा है....

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पेड़ फिर शाखाहीन होने लगा है.... देखते हैं चुपचाप हालात .... पेड़ फिर शाखाहीन होने लगा है.... जिसे ठूंठ समझते हैं ... बहते हैं उस कोटर के आंसू ... देखते हैं चुपचाप हालात .... पेड़ फिर शाखाहीन होने लगा है.... ... पत्ते तेज हवाओ से झड़ गए हैं .... नभचरों ने बुन लिया है.... फिर दूर कही एक नीड़... किसी हरे भरे बरगद क़ी...घनी कौंपलों के बीच .... चील कौंवो से बचने के लिए ... वे भी साक्षी हैं ... जानते हैं .... देखते हैं चुपचाप हालात .... पेड़ फिर शाखाहीन होने लगा है.... ... ठूंठ बनते जा रहे पेड़ के पास ... तने से निकलते आंसुवो के सिवाय ... कुछ नहीं बचा ... आंसू भी निर्दयी लकड़हारा... गोंद समझकर ले जा रहा है... ..देखते हैं चुपचाप हालात .... पेड़ फिर शाखाहीन होने लगा है....