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स्वागत... नववर्ष का स्वागत करने को अब दिल नहीं करता

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स्वागत !!! ( Old Poem ) नववर्ष का स्वागत करने को अब दिल नहीं करता क्योंकि कुछ लोग ऊपर से नजर आते हैं गांधी, कुछ नेहरू मगर कोई बोस नहीं दिखता इन सभी का जो सच्चा अवतार आ जाता पता नहीं क्या से क्या हो जाता कुछ लोग रावण हैं हर बार एक और चेहरा लगा लेते हैं परन्तु रावण का चेहरा  नया हो या पुराना देखकर रावण ही याद आता है क्योंकि बदल लेने पर भी चेहरा राम वो बन नहीं पाता इसलिए स्वागत करने को अब दिल नहीं करता क्योंकि वर्ष नया हो या पुराना दिल के घाव नहीं भरता पूरब को पश्चिम से नहीं जोड़ता एषिया को यूरोप से नहीं मोड़ता हिंसा, जो थी महाभारत काल में या थी जो प्रभु यीशु के समक्ष या उस समय जब गिराए गए परमाणु बम वहीं हिंसा कारगिल की ऊंची पहाड़ी में छिपी अपहृत हुए कंधार पहुंचे विमान में दिखी इस हिंसा को कोई वर्श अहिंसा में नहीं बदलता नववर्ष का स्वागत करने को अब दिल नहीं करता

फिर सो ना जाना

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फिर सो ना जाना कह रही है सितारों से झाँकती वो आंखें हर घर हर बेटी बन देखती रहूंगी जाग्रत रहना फिर सो ना जाना

Gidwani's "March of the Aryans" along with his earlier book, Return of the Aryans"

Gidwani's "March of the Aryans" along  with his earlier book, Return of the Aryans"  सम्माननीय भगवान गिदवानी जी की सद्य प्रकाशित पुस्तक के बारे में ईमेल प्राप्त हुआ। अमूमन अनजाने स्रोत से प्राप्त ईमेल पढ़ने से गुरेज करता हूं किंतु श्री गिदवानी जी का नाम और प्रेषक  के बारे में अल्प जानकारी पर मेल पढ़ा और नायाब पुस्तक के बारे में जिज्ञासा बढ़ गई। प्राप्त मेल के अंश साझा कर रहा हूं... ...   Gidwani also explains how the country, with  far-flung frontiers, and thrice the size  of present-day India, came to be known as Bharat Varsha.  All literature on India begins with the Vedic Age. Gidwani's "March of the Aryans" along  with his earlier book, Return of the Aryans"  are  the only books which trace India's drama far back to pre-Vedic roots. Its appeal is, therefore, powerful and enduring to those in search of India's pre-ancient cultural, philosophic, spiritual and material heritage. Also, it fulfils a long-felt need to keep alive, fo...

समकालीन चूहे और लोहे की तराजू

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समकालीन चूहे और लोहे की तराजू    भेड़िया आया, रँगा सियार जैसी कहानियाँ हमेशा राह दिखाती हैँ।डरने और डराने वालोँ को। दोनों को । सभी को । आखिर लोहे की तुला और चूहे भी तो खत्म ना होवै ...। चूहे और तराजू किसके प्रतीक हैं, कथा में यह समझना उत्तर आधुनिक काल में साहित्यिक जगत में कोलाज की मीमांसा करने जैसा है । जिसे जैसा अनुभूत हो वैसा अर्थ अभिव्यक्त करे ।  जमाना चाहे कोई हो, अमर सँस्कृत साहित्य की कथाएँ जीवन के हर क्षेत्र मेँ प्रासँगिक लगती हैँ। समसामयिक परिप्रेक्ष्य मेँ जीवँत होती दिखती हैँ। छल कपट से भरे पात्रोँ के नकाब उतारने के अलावा ऐसी कहानियाँ मलिन विचारोँ वाले धूर्त पाखँडी लोगोँ की पहचान कराने मेँ भी सहायक हैँ। बड़े बुजुर्गोँ ऋषि मुनि व विषय विशेषज्ञ विद्वानोँ ने सुखी और सफल जीवन जीने के मँत्र साहित्य के जरिये सुरक्षित सँरक्षित रखे हैँ। पँचतँत्र, हितोपदेश लोक कथाएँ , कहावतेँ मुहावरे, लोकोक्तियाँ , लोकगीत , जनश्रुतियोँ मेँ ऐसे "मँत्र" भरे पड़े हैँ।   

साजिश और सादगी

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साजिश और सादगी  साजिश  में  मशगूल / साजिशी  को  फुर्सत  नहीं  थी / सज्जन  साजगिरी  गुंजाता / सादगी  से  'पार ' पहुँच  गया... ......( दूसरो को भटकाने वाला अपने ही लक्ष्य से भटक जाता है और  कभी मंजिल तक नहीं पहुचता जबकि अपने काम से काम रखते हुव़े लगातार लक्ष्य की ओर बढ़ने वाले को निश्चय ही मंजिल मिल जाती है...)

रोने से रोज़ी नहीं बढ़ती

रोने से रोज़ी नहीं बढ़ती    अनथक कर्म करने के बावजूद वांछित प्रतिफल नहीं मिलने की षिकायत करने वाले बहुतेरे होंगे लेकिन कोई उनसे पूछे क्या रोना रोने से रोज़ी बढ़ती है ! दरअसल मैनेजमेंट कोर्स, अध्यात्म और व्यक्तित्व विकास जैसे प्रषिक्षणों में सकारात्मक विचारों की महत्ता बताई ही जाती है। ये सकारात्मक विचार-पाठ कोई आज के ईजाद पाठ्यक्रमों में प्रयुक्त नहीं होते बल्कि ‘‘उस्ताद-षागिर्द’’ काल से भी बहुत - बहुत पहले ‘‘गुरु-षिश्य’’ युग से सकारात्मकता को महत्व मिला हुआ है। पुराण कथाओं, ऐतिहासिक एवं लोककथाओं में भी सकारात्मक विचार अपनाने संबंधी सीख देने वाले उद्धहरण भरे पड़े हैं। आज का युग कल कारखानों में सिक्के ढालता है तो कभी श्रमिक वर्ग को खेत खलिहान में पसीना बहाकर या व्यापार के लिए दुरूह यात्राएं कर सेठ साहूकारों के लिए ‘‘गिन्नियों की थैलियां’’ भर लानी होती थी। श्रमिक वर्ग तब भी वांछित लाभ से वंचित रहता और आज भी कमोबेस ऐसा होता है। साथ ही यह भी तय है कि जगह जगह ऐसा रोना रोने वाले को लाभ भी बढ़ा हुआ नहीं मिलता। अर्थात युग और काम का रूप बदल गया लेकिन व्यवस्था ले देकर वहीं की वहीं रही ! प्...
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पल पल विश्वास मुस्करा रहा पल पल आओ करें आने वाले नए पल का स्वागत पल पल बीत रहा पल पल जी रहा पल पल मुस्काना सिखा रहा पल पल पास बुला रहा पल पल विश्वास बढ़ा रहा पल पल पल पल अंधेरा दूर भाग रहा पल पल उजाला बढ़ा रहा पल पल आओ करें आने वाले नए पल का स्वागत