रोने से रोज़ी नहीं बढ़ती
अनथक कर्म करने के बावजूद वांछित प्रतिफल नहीं मिलने की षिकायत करने वाले बहुतेरे होंगे लेकिन कोई उनसे पूछे क्या रोना रोने से रोज़ी बढ़ती है ! दरअसल मैनेजमेंट कोर्स, अध्यात्म और व्यक्तित्व विकास जैसे प्रषिक्षणों में सकारात्मक विचारों की महत्ता बताई ही जाती है। ये सकारात्मक विचार-पाठ कोई आज के ईजाद पाठ्यक्रमों में प्रयुक्त नहीं होते बल्कि ‘‘उस्ताद-षागिर्द’’ काल से भी बहुत - बहुत पहले ‘‘गुरु-षिश्य’’ युग से सकारात्मकता को महत्व मिला हुआ है। पुराण कथाओं, ऐतिहासिक एवं लोककथाओं में भी सकारात्मक विचार अपनाने संबंधी सीख देने वाले उद्धहरण भरे पड़े हैं। आज का युग कल कारखानों में सिक्के ढालता है तो कभी श्रमिक वर्ग को खेत खलिहान में पसीना बहाकर या व्यापार के लिए दुरूह यात्राएं कर सेठ साहूकारों के लिए ‘‘गिन्नियों की थैलियां’’ भर लानी होती थी। श्रमिक वर्ग तब भी वांछित लाभ से वंचित रहता और आज भी कमोबेस ऐसा होता है। साथ ही यह भी तय है कि जगह जगह ऐसा रोना रोने वाले को लाभ भी बढ़ा हुआ नहीं मिलता। अर्थात युग और काम का रूप बदल गया लेकिन व्यवस्था ले देकर वहीं की वहीं रही ! प्रवष्त्ति भी नहीं बदली ! हां, जमाने ने अनथक परिश्रम करने वालों को षिखर पहुंचते जरूर देखा है।
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