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आकाश मेरा है "नारी की ये कहानी नहीँ हकीकत है"

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आकाश मेरा है सिंधी से अनूदित कहानी .../ *BAHUBHASHI* *खबरों में बीकानेर*🎤 🌐   ✍️   🙏 मोहन थानवी 🙏   #Covid-19 #pm_modi #crime #बहुभाषी #Bikaner #novel #किसान #City #state #literature #zee Khabron Me Bikaner 🎤  सच्चाई पढ़ें । सकारात्मक रहें। संभावनाएं तलाशें ।   ✍️  आकाश मेरा है  अचानक कुछ हो जाए तो...! इस विचार ने नरेश को झकझोर दिया। उसे मघी की चिंता हुई। मघी, उसकी अर्द्धांगिनी। उसके सुख दुख की सहयोगी। जब भाई बहिन और मां बाप तक ने बीमारी में उसकी सुध नहीं ली तब भी मघी ने हिम्मत नहीं हारी। वह उसे मातृत्व का सुख नहीं दे सका किंतु मघी ने कभी गिला शिकवा नहीं किया। ऐसे विचार नरेश को उद्वेलित कर रहे थे। वह अपने गांव से बहुत दूर दिल्ली के एक नामी अस्पताल के वार्ड में एक अशुभ माने जाने वाले पलंग पर जीवन के लिए मौत से लड़ रहा था। पिछले कुछ दिनों से अस्पताल में डॉक्टरों से घिरा रहने के कारण वह घबरा गया। दिल्ली के इस अस्पताल में करीब 45 डॉक्टर है। नरेश को पेट का कोई रोग है। दवा क...

पनघट पर परंपरा मुंह छुपाए खड़ी

घास खाने को नहीं मिलती बरसात के बाद जल गई तेज धूप से मैं पषुओं को ले दर-दर भटकता रहा षहर और गांवों में टीवी, रेल, हवाई जहाज, आलीषान मकान व्ैाज्ञानिकों का सम्मान सबकुछ देखा न देखा तो केवल कहीं बच्चों का स्वछन्द खेलना कहीं हराभरा खेत और पषु धन के लिए घास संस्कृति एक कोने में दुबकी गांव के पनघट पर परंपरा मुंह छुपाए खड़ी मेरे बेजुबान पषुओं के पास जो निरीह आंखों से ढूंढ़ रहे घास ( मोहन थानवी के हिंदी उपन्यास काला सूरज से ...)

मित्र सुरेश की काव्य पंक्तियां...

मित्र  सुरेश हिंदुस्तानी की काव्य पंक्तियां... विस्मृत प्यार... तुम्हारे प्यार में विस्मृत है प्यार के अर्थ शब्द, ताल, लय किसी बंद गली से। .............. शर्मसार.... अब कितना तरल हूं हर सांचे में, ढला जाता हूं कहीं भी तो नहीं मुझमें कुछ ऐसा जो चट्टान - सा दिखे कहे गर्व है तुम पर .......... इमारत... ऊंची इमारतों के भीतर घुसने के लिये जरूरी है घटा लें कद को झुका लें चेहरे को। दरवाजों से इंसाफ की उम्मीद बेकार है दोस्त वे अपने कद से कभी नहीं बढ़ते हटा जरूर लिये जाते हैं कभी - कभी अपनी जगह से पर तब भी इमारत भीतर से नहीं बदलती जन्म देती है, सैकड़ों दरवाजों को अपने भीतर, गहरे तक ............... मौसम... मौसम तुम भी हो गये मेरे इर्द - गिर्द बिखरे चेहरों से ओढ़ लिये बिछा लिये कृतिम मुस्ककुराहटों के वसन काश बन पाता मैं भी तुम्हारी तरह तब तुम आते समय - समय पर कई बसंत मेरे भीतर

जायसी का बारहमासा :: Pressnote.in

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नाटक - कितना-सा द्वंद्व :: Pressnote.in

नाटक - कितना-सा द्वंद्व :: Pressnote.in

दर्द...दर्द

दर्द आंख उठाकर देख सकता नहीं नजर मिला सकता नहीं देता जो हमेशा दूसरों को तिरस्कार अपनापन किसी से ले सकता नहीं हृदय तो उसका भी व्यथित होता होगा जब कोई उसे हिकारत से देखता होगा अपनों में रहता होगा पराया बनकर परायों में ढूंढ़ता होगा अपना रो.रोकर जीवन में किसी को दी नहीं जिसने खुशी जरावस्था में किसे बताएगा वह अपना दर्द अस्तांचल का सूर्य नहीं वह जिसने सुबह किया आशा का संचार दोपहर में दिखाये तेवर तीखे फिर दूसरे दिन आ जायेगा नई उमंग के साथ दुपहर की तल्खी लेकर दर्द में डूबा जोे वह तो नश्वर है मानव है दर्द दिया तो दर्द ही पायेगा

नींद में जागा-जागा- सा... ...वह भागता रहा

bahubhashi:  नींद में जागा-जागा- सा......वह भागता रहा वह यूं ही भागता रहा उसके पीछे...  इंद्रधनुष को पकड़ने  वह कल से आज तक भागता रहा  हर बार वह बस... थोड़ी दूर ही रह गया वह यूं ही भागता रहा उसके पीछे... इंद्रधनुष को पकड़ने वह कल से आज तक भागता रहा हर बार वह बस... थोड़ी दूर ही रह गया उसके हाथ न आया। मंदिर-मस्जिद, चर्च-गुरुद्वारा वह हर दिन जाता शीष नवाता प्रार्थना करता प्रसाद पाता प्रवचन सुनता। शांति की चाह में उद्वेलित मन से जाता अषांत ही लौटता वह भागता रहा कल से आज तक श्ंाांति की चाह में। खेत-खलिहान में पसीना बहाया पषुधन के साथ भरी दोपहरी अंधेरी रातों में टाट बिछा धुआं-धुआं फिजां धुंधलाती रोषनी भूखा पेट वह सालों से सोया सोचता था  उठेगा तो सुनहरा कल होगा नींद में जागा-जागा- सा... ...वह भागता रहा सुनहरे भविष्य के पीछे उसकी तमन्नाओं की तस्वीर  रंगों को तरसती रही वह कुंची लिए जीवन तलाषता रहा केनवास पर उकेरी रेखाओं को गहरा देने की उसकी चाहत बेनूर ही रही चुनाव होते रहे वह 55 का हो गया बचपन के पीछे भागता...