कविता : राखी पर आऊंगा बहिना
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00000000000000 राखी पर आऊंगा बहिना...
वह तपता देखता रहा
जब
संसार
चांदनी में सोता रहा
चांद
भीतर रोता बाहर मुस्कुराता रहा
पूनम की रात सितारा खोया रहा
झिलमिल बोझिल
क्योें कि
रंज उसे आतंक का
तपते सूरज की कलाई सूनी
पूनम की रात उसे कैसे बांधे राखी
क्यों कि दुनिया में नफरत बिछौना
जिसका ताप इतना
जल जाये जग का कोना कोना
राखी का दिन और
बहिनों को याद रहता भाई का कहना
राखी पर आऊंगा बहिना
राखी पर आऊंगा बहिना
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वह तपता देखता रहा
जब
संसार
चांदनी में सोता रहा
चांद
भीतर रोता बाहर मुस्कुराता रहा
पूनम की रात सितारा खोया रहा
झिलमिल बोझिल
क्योें कि
रंज उसे आतंक का
तपते सूरज की कलाई सूनी
पूनम की रात उसे कैसे बांधे राखी
क्यों कि दुनिया में नफरत बिछौना
जिसका ताप इतना
जल जाये जग का कोना कोना
राखी का दिन और
बहिनों को याद रहता भाई का कहना
राखी पर आऊंगा बहिना


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