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सुपने जी हत्या मंझु रंगकर्म जी खुशी

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  *BAHUBHASHI* *खबरों में बीकानेर*🎤 🌐   ✍️   🙏 मोहन थानवी 🙏   #Covid-19 #pm_modi #crime #बहुभाषी #Bikaner #novel #किसान #City #state #literature #zee Khabron Me Bikaner 🎤  सच्चाई पढ़ें । सकारात्मक रहें। संभावनाएं तलाशें ।   ✍️  सुपने जी हत्या मंझ रंगकर्म जी खुशी पुस्तक परिचयनाटक -      हत्या हिक सुपने जी ( Besed on Cross purposes – Albert Camus ) लेखक - हरिकांत जेठवानी  प्रकाषक - सुनील जेठवानी,         राजकोट 360007         संस्करण 2012  सुपने जी हत्या मंझ रंगकर्म जी खुषी सिंधी साहित्य जगत मंझ हरिकांत न सिर्फ नाटकनि लाइ बल्कि सिंधु समाज, साहित्य धारा ऐं आखाणी जे संपादन जे करे हमेषह याद रहिण वारो नालो आहे। पहिंजी लंबी हिंदी कविता एक टुकड़ा आकाष समेत हरिकांत हिंदी साहित्य संसार जो बि जातलि सुञातलि लेखक आहे। कविता में नवाचार ऐं पहिंजी कहाणिनि में समाज जी नुमाइंदी कंदड़ चरित्रनि खे बुलंद सिंधी जुबान डिअण वारे...

कार्य फल तय है, जय हो

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अनचाहे किया जाने वाला कोई काम पूर्णता को प्राप्त नहीं हो सकता। कोई न कोई कसर रह ही जाती है। हां, शनै शनै कार्य का आनंद आने पर यदि कर्ता अनचाहे शुरू किए गए कार्य से दिल लगा लेता है तो उसे शिखर छूने का अवसर भी मिल जाता है। महापुरुषों से संबंधित बहुत से ऐसे उदाहरण हम आप गाहेबगाहे पढ़ चुके हैं। ख्याति-सीमा के मध्यनजर भी बहुत सी शख्सियतों के ऐसे वक्तव्य पत्र पत्रिकाओं में पढ़ने को मिल जाते हैं। इसीलिए अनुभवी, ज्ञानी, बुजुग कहते हैं कि काम कोई भी हो, मन लगा कर, आनंद लेकर, काम को पूजा मान कर करने वाले को सफल होने से कोई रोक नहीं सकता। अनचाहे, अनमना हो कर कोई काम शुरू कर ही दिया हो तो उसे अभी से आनंदित होकर कीजिए। काम अनचाहा नहीं रहेगा, आप भी स्वयं को अनमना नहीं पाएंगे। तय है। जय हो।

भीड़ में तनहा यात्रिक

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भीड़ में तनहा यात्रिक खो गया है आदमी भीड़ में तनहा हो गया है आदमी यात्रिक है मगर सोया हुआ है आदमी यात्रा के हर पड़ाव पर अपने आपको ढूंढ़ता है आदमी

किस्सा-ए-प्रस्तर उद्धारक

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किस्सा-ए-प्रस्तर उद्धारक ‘लंबी कविता’ अक्सर तुम्हारा चेहरा आईने में देखता हूं मक्कारी से भरा कुटिल मुस्कान वाला शख्स मैं तो नहीं आईना झूठ नहीं बोलता किसी भी घर में लगा हो तुम्हारे घर शायद कोई आईना नहीं वरना मेरी शक्ल देख लेते अब भूल जाओ अपने पापों को प्रस्तर बनने के शापित हो तुम प्रस्तर उद्धारकों को तो पूजा जाता है, हे पापी इसे भूलना नहीं द्रोणाचार्य मांगते हैं आज भी मगर एकलव्य देते नहीं दिखाते हैं अंगूठा दधिचि अब ढूंढे़ नहीं मिलते मगर बस्तियों में लगे हैं हड््िडयों के ढेर अक्सर ऐसे ढेर पर बिखरा-बिखरा तुम्हारा चेहरा देखता हूं खाल विहीन रक्त-पिपासु इस दुनिया में कोई दूसरा तो है नहीं     याद रखो भूलो मत हरिष्चद्र की संतान कोई जीवित नहीं आघात बड़ा है कफन न होने का, वक्त जाता है ठाठ-वैभव को चाट संवाद तंत्र पंचतंत्र से सीख और साध हित हितोपदेष से अतीत के अंधे-सागर में लगा डुबकी पुराण सुना और बटोर दक्षिणा प्रस्तर उद्धारकों के ही प्रस्तर पूज और पापियों को बदल डाल प्रस्तरों में खड़ा कर दो चौराहों पर नगर-रखवालों को, खाली करवा दो नगर अक्सर तुम्हारे जैसे चेहरे वालों को नगर मे...

अट्टू-पट्टू की उधारी

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अट्टू-पट्टू की उधारी   (हास्य  -- सिन्धी से अनुवादित) --- (अरबी सिन्धी मे ये श्रंखला हिन्दू डेली अजमेर से २०१० में पब्लिश  हो चुकी है  )................................. बीमारी की बदकिस्मती। बरसात के मौसम में वह अट्टू को जा लगी। बदन दर्द, सर्दी, खांसी, जुकाम हां भाई हां ये सब। मौसम को कोसते हुए अट्टू साहिब ने दो दिन में तीन डॉक्टर बदल लिये। इन बीमारियों में से एक भी कम नहीं हुई बल्कि थकान की बीमारी और बढ़ गई। चाइनाराम सिन्धी हलवाई की सिन्धी मिठाई सिन्धी हलवा के टीन के एक डिब्बे में अट्टू साहिब ने ठूंस ठूंस कर टेबलेट्स की स्ट्रिप्स रखी। साथ में इनव्हेलर, बाम और एक थर्मामीटर भी सहेजा। चार दिन बाद तो उन्हंे आफिस से भी फोन आने लगे - आफिस आ जाओ भैया वरना विदाउट पे माने जाओगे। अट्टू साहिब भला ऐसा कैसे होने देते, सो पांचवें दिन जा पहुंचे आफिस। पिऑन से लेकर बड़े साहब तक सबसे पहले उन्होंने ‘जय हो’ से दुआ-सलाम की। फिर अपनी सीट पर बैठे तो पूछापाछी के लिए साथियों ने तांता लगा दिया। चार दिन में अलग अलग डॉक्टरों का अनुभव लेने वाले अट्टू साहिब भला ऐसा मौका क...

फैला पंख और भर उड़ान...

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उड़ान.. .  आकाश असीम और खुला है फैला पंख और भर उड़ान गा नवगीत और स्थापित कर नव आयाम

स्वागत... नववर्ष का स्वागत करने को अब दिल नहीं करता

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स्वागत !!! ( Old Poem ) नववर्ष का स्वागत करने को अब दिल नहीं करता क्योंकि कुछ लोग ऊपर से नजर आते हैं गांधी, कुछ नेहरू मगर कोई बोस नहीं दिखता इन सभी का जो सच्चा अवतार आ जाता पता नहीं क्या से क्या हो जाता कुछ लोग रावण हैं हर बार एक और चेहरा लगा लेते हैं परन्तु रावण का चेहरा  नया हो या पुराना देखकर रावण ही याद आता है क्योंकि बदल लेने पर भी चेहरा राम वो बन नहीं पाता इसलिए स्वागत करने को अब दिल नहीं करता क्योंकि वर्ष नया हो या पुराना दिल के घाव नहीं भरता पूरब को पश्चिम से नहीं जोड़ता एषिया को यूरोप से नहीं मोड़ता हिंसा, जो थी महाभारत काल में या थी जो प्रभु यीशु के समक्ष या उस समय जब गिराए गए परमाणु बम वहीं हिंसा कारगिल की ऊंची पहाड़ी में छिपी अपहृत हुए कंधार पहुंचे विमान में दिखी इस हिंसा को कोई वर्श अहिंसा में नहीं बदलता नववर्ष का स्वागत करने को अब दिल नहीं करता