खाद्य संयम के रूप में मनाया पर्वाधिराज पर्यूषण पर्व का प्रथम दिन, आत्मसाधना, धर्माराधना व त्याग-तपस्या की दी प्रेरणा
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खाद्य संयम के रूप में मनाया पर्वाधिराज पर्यूषण पर्व का प्रथम दिन, आत्मसाधना, धर्माराधना व त्याग-तपस्या की दी प्रेरणा
युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमणजी की सुशिष्या शासन-श्री साध्वीश्री मंजुप्रभा जी के सान्निध्य में पर्यूषण महोत्सव का रामपुरिया हवेली मार्ग स्थित तुलसी साधना केन्द्र में शुभारंभ हुआ।
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बीकानेर। बीकानेर जैन श्वेताम्बर तेरापंथी सभा के तत्वावधान में युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमणजी की सुशिष्या शासन-श्री साध्वीश्री मंजुप्रभा जी के सान्निध्य में पर्यूषण महोत्सव का रामपुरिया हवेली मार्ग स्थित तुलसी साधना केन्द्र में शुभारंभ हुआ। साध्वी गुरुयशाजी ने भगवान महावीर की वाणी विपाकसूत्र आगम के बारे में बताते हुए कहा कि विपाक की दृष्टि से कर्म दो प्रकार के होते हैं- शुभकर्म और अशुभ कर्म, अशुभ कर्म के बारे बताया कि मनुष्य अपने कर्मों का फल भोगता है। कर्म बंधन के मुख्य कारण है- राग और द्वेष। इस महान पर्व पर व्यक्ति राग-द्वेष का अल्पीकरण करके कर्मों के जाल को सुलझा सकता है। पहले से बंधे हुए पाप कर्म को अपनी त्याग, तपस्या, संयम, साधना से, शुभ योगों से, शुभ भावों से पुण्य रूप में बदल सकता है।
साध्वी जयंतप्रभाजी ने इस महापर्व का महत्व बताते हुए कहा कि यह पर्व आत्मदर्शन, आत्ममंथन, आत्मविकास व आत्म कल्याण का पर्व है। स्वयं को वोट देकर आपने जीवन की खोट निकालने का पर्व है। आज (रविवार) का प्रथम दिन खाद्य संयम के रूप में मनाया गया। भोजन क्यों, कैसे, कब, कहां, कितना करना इसके बारे में उन्होंने कुछ आध्यात्मिक टिप्स बताकर जंक फूड-फास्टफूड कम खाने की प्रेरणा दी।
शासनश्री साध्वी मंजुप्रभा जी ने भगवान महावीर के जीवन-चरित्र को बताते हुए कहा- तीर्थकर प्रभु राग-द्वेष मुक्त होते हैं। इनकी वाणी सर्वमंगलकारी, हितकारी होती है। कालचक्र के बारे में बताया कि कालचक्र के दो विभाग होते है - उत्सर्पिणी काल, अवसर्पिणी काल। दोनों काल-खण्डों के छह-छह विभाग होते है।
चातुर्मास के बारे में बताया कि जैन श्रमण अहिंसा के पुजारी होते हैं। इनकी जीवन-चर्या अहिंसा प्रधान होती है। वर्षा ऋतु में जन्तुओं की भरमार रहती है, इस ऋतु में विशेष हिंसा की दृष्टि से विहार-चर्या सामान्यतया वर्जित है। इसलिए जैन समण वर्षावास में चार मास तक एक ही स्थान में रहते हैं। इस महापर्व पर विशेष रूप से आत्मसाधना, धर्माराधना त्याग-तपस्या की विशेष प्रेरणा दी। इस महापर्व में प्रवचन में सैकड़ों श्रावक-श्राविकाएं उपस्थित रहे।
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