परम्परा : कठोर तप, आराधना और सेवा-संकल्प के साथ Chaliha Mahotsav झूलेलाल का करते हैं आह्वान बीकानेर सिंधी समाज के युवाओं ने पुरोधाओं को समर्पित करते हुए सेवा-संकल्प की परंपरा को नए आयाम दिए ऐतिहासिक बना कोरोना काल में सेवा-संकल्प
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परम्परा : कठोर तप, आराधना और सेवा-संकल्प के साथ चालिहा महोत्सव
झूलेलाल का करते हैं आह्वान
बीकानेर सिंधी समाज के युवाओं ने पुरोधाओं को समर्पित करते हुए सेवा-संकल्प की परंपरा को नए आयाम दिए
ऐतिहासिक बना कोरोना काल में सेवा-संकल्प
- मोहन थानवी
दैनिक युगपक्ष 23 जुलाई 2026 गुरुवार
बीते करीब 80 वर्ष से बीकानेर में सिंधी समाज ने अपने आपको स्थापित करने के साथ साथ अपनी सिंधु-संस्कृति के संरक्षण का कार्य भी बखूबी किया है । समाज के द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर तय गाइडलाइन के मुताबिक हर वर्ष 16 जुलाई से चालिहा महोत्सव का आगाज और 24 अगस्त को पूर्णाहुति होती है। समाज ने सिंध से चली आ रही परम्पराएं यहां भी कायम रखी हैं। ऐसी ही चालिहा महोत्सव की परम्परा है, इसके तहत आराधना के साथ 40 दिन का कठोर तप और व्रत करने वालों की संख्या आरंभ में बमुश्किल कुछ दर्जन थी जो आज प्रतिवर्ष बढ़ते हुए सैकड़ों तक आ पहुंची है। समाज विरासत में मिली अपनी परंपराओं का बीकानेर में अमरलाल मंदिर ट्रस्ट रथखाना से आगाज करते हुए आज पवनपुरी एवं संत कंवरराम सिंधी समाज ट्रस्ट धोबीतलाई के मंदिरों में भी अनेकानेक अनुष्ठान संपन्न करता है। इससे इतर मुक्ता प्रसाद नगर, लालगढ़, वल्लभ गार्डन आदि क्षेत्रों और नजदीकी तहसीलों में भी समाज के आयोजन होते रहते हैं। ऐसे आयोजनों में चालिहा महोत्सव प्रमुख रूप से शामिल है। इसके तहत झूलेलाल के मंदिरों में प्रतिदिन आरती अरदास और भजन कीर्तन किए जाते हैं। एक ओर सिंधी कलाकार एक से बढ़कर प्रस्तुतियों से संगत को झुमा देते हैं तो दूसरी ओर महिला मंडली पारंपरिक भजनों और वाद्यों से समां बांध कीर्तन-शैली से युवा पीढ़ी को परिचित कराती है। समाज के प्रेरणा पुरूषों के मार्गदर्शन में बीकानेर में आरंभ हुई इस परम्परा को आज की युवा पीढ़ी उत्साह-उमंग के साथ उत्सव रूप में आगे बढ़ा रही है। सजे धजे बहराणा साहब के नगर भ्रमण, कलशयात्रा निकाली जाती है। प्रभात फेरियों का भी दौर चलता है। पब्लिक पार्क तथा धोबीतलाई में जल में ज्योति विसर्जन अनुष्ठान की परंपरा का निर्वहन किया जाता है। ऐसे आयोजनों के मूल में है कि सभी समाजजन एकजुट हो भागीदारी निभाते रहें। पूर्णाहुति पर व्रतियों द्वारा सामूहिक रूप से भंडारे में पारणा किया जाता है।
कठोर तप
परंपरा के अनुसार 40 दिनों तक चलने वाले चालिहा महोत्सव को व्रत, नियमों और धार्मिक विधि से मनाया जाता है । श्रद्धालु 40 दिन तक व्रत के तहत एक समय भोजन तथा नंगे पांव रहने, दान-पुण्य, सेवा कार्य करने, जमीन पर सोने सहित सभी तय नियमों का पालन करने का व्रत (संकल्प) निर्वहन करते हैं ।
यह है वजह
मान्यताओं के अनुसार, झूलेलाल वरुण देव के अवतार हैं। सिंध के शासक मिरखशाह के अत्याचारों से मुक्ति के लिए सिंधी समाज ने 40 दिन तक कठोर तप-उपवास किया था। तब भगवान झूलेलाल सिंधु नदी में पलो मछली पर सवार हो प्रकट हुए और कठोर तप करने वाले समाजजन को कहा कि वे आज से 40 दिन बाद जन्म लेकर मिरखशाह के अत्याचारों से मुक्ति दिलाएंगे।
यही वजह है कि सिंधी समाज 40 दिन तक झूलेलाल के अवतरण की प्रतीक्षा के दौरान की गई तपस्या के प्रतीक स्वरूप चालिया महोत्सव मनाता है। यूं झूलेलाल जयंती - चेटीचंड नवसंवत के चंद्रदर्शन के दिन मनाई जाती है क्योंकि वचन के मुताबिक झूलेलाल ने उसी दिन जन्म लिया। भगवान झूलेलाल का सांसारिक नाम उदयचंद है, वे वरुण देव के अवतार माने जाते हैं।
इतिहास बना कोरोना काल : सेवा-संकल्प के साथ तप
कोरोना काल को सिंधी समाज ने ऐतिहासिक बना दिया। इस काल में सिंधी समाज के समाज सेवियों ने जहां चालिहा महोत्सव के तहत कठोर तप और व्रत किया । वहीं कोरोना काल के दौरान आवश्यकता के अनुसार नियमित रूप से प्रतिदिन अमरलाल मंदिर रथखाना परिसर में भोजन तैयार कर सैकड़ो परिवारों तक पहुंचाया गया। कई दिनों तक चले इस सेवा-अभियान में युवा पीढ़ी का बहुत बड़ा योगदान रहा था। जबकि कोरोना गाइडलाइन की पालना करते हुए सजे धजे बहराणा साहब के नगर भ्रमण, कलशयात्रा और पब्लिक पार्क तथा धोबीतलाई में जल में ज्योति विसर्जन अनुष्ठान की परंपरा को महज सांकेतिक स्वरूप में ही निर्वहन किया गया था।
एडवाइजरी की पालना करते हुए सभी समाजजन ने घरों में ही व्रतादि की परंपरा का निर्वहन किया था। पूर्णाहुति पर व्रतियों द्वारा सामूहिक रूप से भंडारे में पारणा भी नहीं किया जा सका था।
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