दीर्घकालिक यात्रा को सूक्ष्म बना देने वाली शक्ति का अस्तित्व
अनचाहे, अनहोनी, अकस्मात आदि क्या है! ये भी कर्म से जुड़े हैं या माया का एकरूप है...। अनचाहे ही सही, कर्मफल अवष्य मिलता है कथन को विचारते हैं तो फिर फल
की चिंता किए बिना कर्म करने के संदेष को किस रूप में ग्रणह करें...! इसे माया
कहें...! या... मंथन करें...! अनहोनी ही होगा जब किसी कर्म का फल नहीं मिलेगा।
यह भी सच है कि कर्म चाहे कितना ही सोच विचार कर किया जाए और फल मिलना भी चाहे
तय हो जैसा कि गणित में होता है, दो और दो चार और सीधा लिखने पर 22 तथा भाग
चिह्न के साथ लिखने पर भागफल एक मिलेगा ही लेकिन फिर भी अप्रत्याषित रूप से भी
कर्म-फल मिलते हैं। जीवन में ऐसे पल भी आते हैं जब किसी मुष्किल घड़ी में
अकस्मात ही कोई अनजान मददगार सामने आ खड़ा होता है। धर्म और अध्यात्म के नजरिये
से आस्थावान के लिए ऐसी अनचाहे, अकस्मात, अनहोनी ग्राह्य होती है और अच्छा होने
पर प्राणी खुष तथा वांछित न होने पर दुखी होता है। यह प्रवृत्ति है। विद्वजन
सुसंस्कार एवं भली प्रवृत्ति के लिए भगवत भजन का मार्ग श्रेष्ठ बताते हैं और यह
सही भी है। जिज्ञासा फिर यही कि भगवत भजन में रत रहकर स्वयं को प्रभु को
समर्पित करना है और इसे कहा जाता है तेरा तुझको अर्पण...। स्वयं को समझना,
जानना और प्रभु को अर्पित हो जाना। हालांकि विद्वजनों ने कर्म, प्रवृत्ति और
वांछित - अवांछित आदि प्रत्येक पहलू पर विस्तृत अध्ययन-मनन कर अपने अपने मत रखे
हैं जो अपने आप में अलग अलग परिस्थितियों में उचित प्रतीत होते हैं। यहां
मीमांसा या समीक्षा करना मकसद नहीं वरन् जिज्ञासा है, अध्यात्म, प्रबंधन, कर्म
और फल के प्रति। जिज्ञासा होना भी कर्मजनित हो सकता है। धार्मिक कार्यों को
क्रियान्विति देने वाले और व्यापारिक कार्य करने वाले मनुष्य की प्रवृत्ति सभी
विषयों में समान हो भी सकती है और नहीं भी। इसे पूर्व कर्मों या जन्मों में किए
कर्मों का असर या फल मिलना भी कह सकते हैं जो ईष्वरीय षक्ति के प्रबंधन के
सम्मुख न तो अनचाहे होता है, न ही यह अनहोनी है और न ही ऐसा अकस्मात ही होता
है। इसे प्रारब्ध से जोड़ कर देखता हूं तो पौराणिक काल से रामायण काल और फिर
महाभारत काल के बाद आज के आधुनिक काल तक की वैचारिक यात्रा पल के भी सूक्ष्मतम
भाग में सम्पन्न हो इस वक्त संपादित हो रहे कर्म - बिन्दू तक आ पहुंचती है।
इतनी दीर्घकालिक यात्रा को सूक्ष्म बना देने वाली षक्ति आखिर अपना अस्तित्व
कहीं तो प्रकट करेगी। पौराणिक काल से अब तक काल गणना को बहुत ही सूक्ष्म और
बहुत ही विषाल बिन्दू तक विद्वजनों ने समेटा है और ज्योतिष सहित विभिन्न
ग्रंथों में इसका उपयोग किया है। यहां उल्लेख आवष्यक है कि समय पबंधन के नजरिये
से ईष्वरीय षक्ति के प्रबंधन में ब्रह्माजी का एक दिन धरा के न जाने कितने
दिन-रात पूरे होने पर बीतता है। संख्यात्मक विवरण की नहीं बात है जिज्ञासा की
कि जिन ब्रह्माजी के एक दिन को विद्वजनों ने इतना विषाल बताया है उन्हीं
ब्रह्माजी और उनके समकालीन अथवा व्यतीत कालों के देवाधिदेवों संबंधी काल गणना
अथवा पौराणिक कथा-क्रम के बारे में अब तक भ्रम भी कायम है कि कितने वर्ष पूर्व
ऐसा हुआ होगा। यकायक ऐसी अनुभूति होने को चमत्कार नहीं बल्कि अज्ञानता की
श्रेणी में पाता हूं। अर्थात मेरी यह षब्द-यात्रा अज्ञानता को दूर करने के लिए
ज्ञान की ओर बढ़ने का उपक्रम मात्र है। ऐसा क्यों है...! क्या यह कर्म के लिए
प्रारब्ध के प्रबंधन के तहत है जो ईष्वरीय षक्ति संचालित कर रही है!!! हो सकता
है जिज्ञासा को सही रूप से व्यक्त भी न कर पा सका हूं, बल्कि ऐसा ही है तब भी
यह विचार प्रष्न की तरह घुमड़ता रहता है कि ब्रह्मा-विष्णु-महेष आदि ईष्वरीय
षक्तियों का प्रबंधन कितना व्यवस्थित और सुदृढ़ है। अध्यात्म के विभिन्न पक्षों
को जिस दृष्टि से देखता हूं गहराई तक केवल किसी एक ही पक्ष के भी किसी मात्र एक
ही बिन्दू को समझने में ही असंख्य योनियों की यात्रा हो जाती है लेकिन निष्कर्ष
से फिर भी वंचित रहता हूं। बावजूद इसके... अद्भुत अनुभूति जरूर होती
है...संतुष्टि और सुख की। यही कर्म है तो फिर इसके प्रबंधन के अनुसार ऐसा ही
विचारों को परिष्कृत कर देने वाला फल भी है लेकिन यात्रा जारी है और रहेगी...
क्योंकि यह अनंत यात्रा है।
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