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Bharat me angreji raj ... Lekhak pt sundar lal ji... pt sundar lal ji ki book bahut likhi hui hain or unke prashanshak bhi kafi sankhya me hai A पंडित सुंदरलाल जी के बारे में संध्या नवोदिता जी ने गूगल पर सर्च किया मगर सर्च इंजन वांछत विद्वान के बारे में अनजान रहा। यह इसलिए कि पंडित संुदरलाल जी के बारे में सर्च इंजन पर किसी ने कोई जानकारी डाली ही नहीं होगी। हिंदी या अंग्रेजी में गूंगल ़ और ब्लॉग या अपने या किसी साथी के वेबसाइट पर सामग्री अपलाड करने के बाद वह सामग्री सर्च करने पर उपलब्ध हो जाती है। ऐसा मेरा स्वयं का अनुभव गूगल पर रहा है। उदाहरण के तौर पर संभवतया मेरी यह पोस्ट भी सर्च करने पर सामने आ सकती है। pt sundar lal ji ki book bahut likhi hui hain or unke prashanshak bhi kafi sankhya me hai A

Rang Rajasthani: 26-08-2013

Rang Rajasthani: 26-08-2013

पहाकनि जी बरसाति

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पहाकनि जी बरसाति। अजु तव्हांखे पहाकनि में बरसाति जी गाल्हियूं था बुधायूं। असांजो मकसद सिन्धु भाषा, बोली ऐं संस्कृतिअ जियूं खासियतूनि खे तव्हां तांई पूजायणो आहे। राय-मशविरा इनि बारे में असांखे मिलन्दी त घणी खुशी थीन्दी। -  डखिण मींह न वसिणा, जे वसे त बोेड़े, काइर धकु न हणिणा, जे हणे त झोरे। सिन्धु में घणो करेेे डखण-ओलह खां बरसाति न पवन्दी आहे। पर जे इन तर्फ जी बरसाति पई त चंगी बोड़ बोड़ा करे छडीन्दी आहे। याद रखिण जी गाल्हि आहे, असांजो अजमेर समेत ओलह जो राजस्थान बि इन्हींअ ई भौगोलिक स्थितिअ में वसयलि आहे। खास तौर बीकानेर, जैसलमेर वगैरह। बुठो त थरु, न त बरु थरपारकर वारो धणो जिलो वारीअ वारो आहे। हिते आबादीअ जो घणो दारोमदार बरसाति ते आहें थर में जे बरसात पेई त उहो सजो इलाइको सुख्यो सताबो ऐं सुन्दर बणिजी पवन्दो, न त उव्हो रेगिस्तान ई आहे। वसे त कोहु, न त रोहु बरसाति में इलाइको सुहिणो, न त सुकलु मुल्क। सियारे में सीउ पवे, आड़हड़ में आरायूं सन्धु बिन्हीं में को न को, कंहिं खे साराहियूं! सिन्धु जे उत्तर में सर्दी ऐं गर्मी बई घणियूं थीन्दियूं आहिनि, जेेके परेशान कन्दड़ आहिनि।...

Unko chehare padhnaa Aataa hai :/ Samajhe jo wo Arth bhi batanaa Aataa hai 8-) muskrane ko Makkari kahte wo ;) or Dard Pee jane ko DUNIYAADAARI kahnaa Aataa hai. :*

अंडा सिखावे बच्चे को चीं-चीं मत कर

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अंडा सिखावे बच्चे को चीं-चीं मत कर     आज नहीं, प्राचीन काल से कहा जाता है, छोटे मुंह बड़ी बात। इसका प्रचलन बने रहना यानी छोटे मुंह बड़ी बात के उदाहरण सामने आते रहना मनुष्य की प्रवृत्ति को दर्शाते हैं। सामाजिक या वाणिज्यिक जीवन में ऐसे चरित्र कम किंतु राजनीति से जुड़े और प्रतिस्पर्द्धात्मक प्रवृत्ति वाले लोगों में इस तरह की बातें सामने आ ही जाती है जब लोग स्वतः कह उठते हैं, अंडा सिखावे बच्चे को कि चीं-चीं मत कर। दरअसल किसी भी वर्ग के कार्यक्षेत्र से जुड़ी शख्सियत के जीवन में टर्निंग पॉइंट प्रायः तब दिखाई देता है जब नवागंतुक साथी उसे पीछे धकेलने को उद्यत होते हैं। राजकीय आश्रय से संचालित कार्यालयों या निजी क्षेत्र,  कारपोरेट जगत में  कामगारों की वरीयता को कनिष्ठ साथी चुनौती देते दिखते हैं। काम कम पारिश्रमिक अधिक, अनुभव और कार्य के प्रति निष्ठा में कमी, ईगो में वरिष्ठ से 21 रहकर खुद को साबित करने की भावना प्रदर्शित करने में तनिक भी देर नहीं करना। ऐसे लोगों की एकाधिकार और शोषण की प्रबल भावना छिपाए नहीं छिपती लेकिन विद्वान कह गए हैं, अंत बुरे का बुरा। आखिरकार निर्णा...

अच्छी भई, गुड़ सत्तरह सेर

अच्छी भई, गुड़ सत्तरह सेर आज का युग बाजारवाद से घिरा है। भाव-भंगिमाएं तो बिकती ही रही हैं। यहां भावनाएं भी बिकने लगी हैं। महंगाई के बोझ तले दबे गरीब को महलों के सपने दिखाने का सिलसिला थमता नहीं दिखता... हां... तरीका जरूर बदलता रहता है। आम आदमी भी बाजार की ऐसी चाल को अब समझ गया है और इसी वजह से किसी वस्तु की कीमतें यकायक बढ़ा दिए जाने पर बोल उठता है... बारह रुपए बढ़ाए हैं तीन रुपए कम कर देंगे और कहेंगे अच्छी भई, गुड़ सत्तरह सेर। यानी सस्ताई का जमाना ले आए। गुड़ का प्रचलन भले ही कम हो गया है लेकिन हमारी परंपराओं में, धर्म-संस्कृति में, अनुष्ठानों में और सामाजिक रीति रिवाजों में गुड़ की महत्ता बराबर अपनी गरिमा बनाए हुए है। बधाई में गुड़ आज भी बांटा जाता है। पूजा पाठ में श्रीगणेश जी को गुड़ से प्रसन्न किया जाता है। और... कहावतों में गुरु गुड़ ही रहा चेला शक्कर बन गया भले ही कहा जाता हो लेकिन बाजार में चीनी की कीमतों के मुकाबले गुड़ की कीमत सुर्खियों में रहती है। महंगाई को गुड़ की कीमत की तराजू पर आज नहीं बल्कि 18 वीं शताब्दी के आखिरी दशकों में भी तौला जाता था। कोई वस्तु जब बहुत सस्ती य...

... दूसरे ग्रह के प्राणी इस धरा पर आते थे ? एलियन... ?

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... दूसरे ग्रह के प्राणी इस धरा पर आते थे ? एलियन... ?  दूसरे ग्रह के प्राणी इस धरा पर आते थे ? ? ?  जिन्हें हम आज एलियन संबोधन से जानने का प्रयास कर रहे हैं ! एलियन ऐसा ही पात्र है।     बीते वर्षों में एलियन के पात्र के साथ सेलोलाइड पर रची गई मायावी रचना देखने वालों के लिए एलियन डरावना नहीं बल्कि मित्र समान बन गया। खास तौर से बच्चों के साथ फिल्माए एलियन पात्र के सीन लोगों में एलियन के प्रति लगाव का भाव जगाने वाले रहे। फिल्म थी कोई मिल गया। आज किसी के लिए एलियन नया शब्द नहीं है। भले ही किसी ने एलियन को देखा या नहीं देखा हो। एक और दुनिया भी है, वैज्ञानिकों की दुनिया। कितने ही  वैज्ञानिक हर बात, हर पात्र, हर चीज को अपने नजरिये से, विभिन्न पहलुओं से देखते और संभावनाएं तलाशते रहते हैं। एलियन के बारे में भी विज्ञान की दुनिया में शोध कार्य चलते रहे हैं। आम आदमी के मन में भी ऐसे अनजान किंतु समाज पर अपना प्रभाव डालने वाले पात्रों के प्रति जिज्ञासा उत्पन्न होती है। ऐसे ही विचारो के साथ जब लोक कथाओं, पौराणिक कथाओं में कतिपय पात्रों की ओर ध्यान जाता है तो वे इस लोक ...