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अंजाम

धैर्यवान काठ की हाँडी बार बार खुद को आग से परे रहकर जलने से बचती और खिचड़ी पकाकर स्वार्थी को देती रही। एक दिन उसे लोगोँ को बेवकूफ बनाने वाले स्वार्थी पर हँसी आ गई। उसने स्वार्थी की खिचड़ी नष्ट कर अपनी महत्ता बताकर ख्याति पाने की गरज से आग से दूरी घटा ली। वो अधिक देर मुस्करा न सकी और जल गई। अट्टृ – काठ की हाँडी क्योँ मुस्कराई? पट्टृ – स्वार्थी को हदेँ पार करने मेँ लाज न आती देख। अट्टृ – फिर जली क्योँ? पट्टृ – खुद भी स्वार्थी होकर। 00000000000 अट्टू बीमार पत्नी पट्टू की तीमारदारी करते करते खुद बीमार हो गया। सेवा की बारी पत्नी की थी। पट्टू – ऐ जी उठो, नीँद की गोली खाए बिना ही सो गए।
बालू की चिट्ठी - मेघ के नाम इस तरह बूंद बूंद रिसते बरसते पर उमस करते हो ? मेघ तुम थार के जीवन पर कुठाराघात करते हो ? आशाओं की पैदावार के बीज बालू-कणों में फूटने से पहले तेज नागौरण के वेग से इधर के उधर पहुंच जाते और तुम मेघ... तेजी से उन्हीं के साथ थार पर मंडराते कहीं के कहीं क्यों निकल जाते ? है तो यह अन्याय तुम्हारा तुम्हारी निष्ठुरता से यहां का ‘‘धन’’ प्यासा रह जाता धन का अमृत बना दिया जाता मावा लकड़ियां और टहनयिां झाड़ियां फोग भी भेंट भट्टियों के हो जाते चूल्हा धुंआता न धुंआता मरुस्थल की हवा धुआं जाती मेघ तुम जब धुआं बन जाते इस अफसोस में हळधर की आंख भी धुआं जाती सावन-भादौ की गोठें जब यहां पुकारती प्रवासियों को मेघ तुम क्यूं नहीं गरजते सचमुच मेघ... तुम जब बरसते हो गांव-गांव औ’र शहर शहर एक चमन-सा बन इसी मिट्टी में फनां हो जाने को उकसाते सचमुच ! मेघ ! किंतु तुम निष्ठुर हो नहीं बरसते तो नहीं बरसते रिसते तो फकत रिसते हो इस तरह बूंद बूंद रिसते बरसते पर उमस करते हो ? मेघ तुम थार के जीवन पर कुठाराघात करते हो ?
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ओला गोला  मीठा शोला
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वरिष्ठ साहित्यकार श्री राधाकिशन चांदवानी
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712 ई मेँ सिँध की नारीशक्ति का सँघर्ष जब ब्राह्मण राजा दाहर युद्ध के मैदान मेँ था तब सिँध के क्या हालात थे…? अलोर सिँध का किला 1300 साल बीतने के बाद भी अपने आप मेँ कई रहस्य समाए है। क्या किले मेँ सुरँग भी है? हिँगलाज माता व नृसिँह जी का मँदिर है। सिँधु सँस्कृति मेँ नारी को महान दर्जा प्राप्त है। नारीशक्ति ने अपने राष्ट्र के लिए दुश्मन का सामना कैसे किया कि आज भी उसे याद कर सलाम किया जाता है। पूजा जाता है। इन सब के साथ 712 ई मेँ सिँध की नारीशक्ति का सँघर्ष राजमाता सुहँदी महारानी लाड़ी माई पदमा का द्वन्द्व शामिल है Sindhi Novel Kooch Ain Shikast मेँ। -  मोहन थानवी

रेत का जीवन

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रेत का जीवन रेत का भी जीवन है अपना संसार है समाई धूप की गर्मी है आसपास बिखरे कांटे हैं कहीं रेत पर गुलिस्तां बने कहीं ताल तलैया खुदे कहीं गगनचुंबी इमारतें हैं खेत किनारे रेललाइन है इसी रेत में पनपे पेड़ हैं मंदिर इसी पर खड़े मस्जिद इस पर बनी गुरुद्वारे-चर्च भी रेत पर घर भी बनाये हैं लोगों ने रेत पर सपने भी बुने हैं लोगों ने रेत पर हवा जब बहती है तेज रेत भी उड़ती है रेत पर लहराता जीवन संवरता रहता नश्वर यह संसार रेत में ही मिल जाता रेत का ही जीवन है