Posts

अंडा सिखावे बच्चे को चीं-चीं मत कर

Image
अंडा सिखावे बच्चे को चीं-चीं मत कर     आज नहीं, प्राचीन काल से कहा जाता है, छोटे मुंह बड़ी बात। इसका प्रचलन बने रहना यानी छोटे मुंह बड़ी बात के उदाहरण सामने आते रहना मनुष्य की प्रवृत्ति को दर्शाते हैं। सामाजिक या वाणिज्यिक जीवन में ऐसे चरित्र कम किंतु राजनीति से जुड़े और प्रतिस्पर्द्धात्मक प्रवृत्ति वाले लोगों में इस तरह की बातें सामने आ ही जाती है जब लोग स्वतः कह उठते हैं, अंडा सिखावे बच्चे को कि चीं-चीं मत कर। दरअसल किसी भी वर्ग के कार्यक्षेत्र से जुड़ी शख्सियत के जीवन में टर्निंग पॉइंट प्रायः तब दिखाई देता है जब नवागंतुक साथी उसे पीछे धकेलने को उद्यत होते हैं। राजकीय आश्रय से संचालित कार्यालयों या निजी क्षेत्र,  कारपोरेट जगत में  कामगारों की वरीयता को कनिष्ठ साथी चुनौती देते दिखते हैं। काम कम पारिश्रमिक अधिक, अनुभव और कार्य के प्रति निष्ठा में कमी, ईगो में वरिष्ठ से 21 रहकर खुद को साबित करने की भावना प्रदर्शित करने में तनिक भी देर नहीं करना। ऐसे लोगों की एकाधिकार और शोषण की प्रबल भावना छिपाए नहीं छिपती लेकिन विद्वान कह गए हैं, अंत बुरे का बुरा। आखिरकार निर्णा...

अच्छी भई, गुड़ सत्तरह सेर

अच्छी भई, गुड़ सत्तरह सेर आज का युग बाजारवाद से घिरा है। भाव-भंगिमाएं तो बिकती ही रही हैं। यहां भावनाएं भी बिकने लगी हैं। महंगाई के बोझ तले दबे गरीब को महलों के सपने दिखाने का सिलसिला थमता नहीं दिखता... हां... तरीका जरूर बदलता रहता है। आम आदमी भी बाजार की ऐसी चाल को अब समझ गया है और इसी वजह से किसी वस्तु की कीमतें यकायक बढ़ा दिए जाने पर बोल उठता है... बारह रुपए बढ़ाए हैं तीन रुपए कम कर देंगे और कहेंगे अच्छी भई, गुड़ सत्तरह सेर। यानी सस्ताई का जमाना ले आए। गुड़ का प्रचलन भले ही कम हो गया है लेकिन हमारी परंपराओं में, धर्म-संस्कृति में, अनुष्ठानों में और सामाजिक रीति रिवाजों में गुड़ की महत्ता बराबर अपनी गरिमा बनाए हुए है। बधाई में गुड़ आज भी बांटा जाता है। पूजा पाठ में श्रीगणेश जी को गुड़ से प्रसन्न किया जाता है। और... कहावतों में गुरु गुड़ ही रहा चेला शक्कर बन गया भले ही कहा जाता हो लेकिन बाजार में चीनी की कीमतों के मुकाबले गुड़ की कीमत सुर्खियों में रहती है। महंगाई को गुड़ की कीमत की तराजू पर आज नहीं बल्कि 18 वीं शताब्दी के आखिरी दशकों में भी तौला जाता था। कोई वस्तु जब बहुत सस्ती य...

... दूसरे ग्रह के प्राणी इस धरा पर आते थे ? एलियन... ?

Image
... दूसरे ग्रह के प्राणी इस धरा पर आते थे ? एलियन... ?  दूसरे ग्रह के प्राणी इस धरा पर आते थे ? ? ?  जिन्हें हम आज एलियन संबोधन से जानने का प्रयास कर रहे हैं ! एलियन ऐसा ही पात्र है।     बीते वर्षों में एलियन के पात्र के साथ सेलोलाइड पर रची गई मायावी रचना देखने वालों के लिए एलियन डरावना नहीं बल्कि मित्र समान बन गया। खास तौर से बच्चों के साथ फिल्माए एलियन पात्र के सीन लोगों में एलियन के प्रति लगाव का भाव जगाने वाले रहे। फिल्म थी कोई मिल गया। आज किसी के लिए एलियन नया शब्द नहीं है। भले ही किसी ने एलियन को देखा या नहीं देखा हो। एक और दुनिया भी है, वैज्ञानिकों की दुनिया। कितने ही  वैज्ञानिक हर बात, हर पात्र, हर चीज को अपने नजरिये से, विभिन्न पहलुओं से देखते और संभावनाएं तलाशते रहते हैं। एलियन के बारे में भी विज्ञान की दुनिया में शोध कार्य चलते रहे हैं। आम आदमी के मन में भी ऐसे अनजान किंतु समाज पर अपना प्रभाव डालने वाले पात्रों के प्रति जिज्ञासा उत्पन्न होती है। ऐसे ही विचारो के साथ जब लोक कथाओं, पौराणिक कथाओं में कतिपय पात्रों की ओर ध्यान जाता है तो वे इस लोक ...

रंगबिरंगी पतंगों से घिरा बीकानेर का आकाश

Image
बीकानेर का आकाश रंगबिरंगी पतंगों से घिरा  गुनगुनाता है जिसे हर शख्स वो एक गजल है मेरा नगर ...! चंदा महोत्सव का आनंद आज भी उतना ही आया जितना कि बीते सालों में । दो तीन दिन से तो बीकानेर का आकाश रंगबिरंगी पतंगों से घिरा दिखा और अच्छा भी लगा। यादें जो जुड़ी हुई है बीकानेर की पतंगबाजी से। लड़तों से। लड़तें यानी... पतंगों के पेच। यानी पतंग प्रतियोगिता। छह भून की लटाई पक्के डोर की और चार चार पांच पांच लटाइयां सादे डोर की। भूण या भून यानी करीब 900 मीटर की दूरी के धागे का नाप। Mohan Thanvi  सादुल स्कूल के आगे जेलवेल तक मांझा सूतने वालों की कतार। आज भी  मार्ग से निकलने पर ऐसा नजारा हुआ तो सुखद लगा। बीते दो तीन दिन तो शाम के समय आकाश में पतंगें  दिखी। आंधी बारिश भी आई और शनिवार का मौसम तो बल्ले बल्ले। किंतु वो समय भी याद आता है जब ऐसा माहौल और ऐसी पतंगबाजी आखातीज से महीना महीना पहले तक से दिखाई देने लगती थी। बीते दो तीन साल से महंगाई ने इस कदर अपना जाल बिछाया है कि आकाश से पतंगों का जाल खत्म - सा होता लगने लगा है।  सच कहूं । पतंगबाजी के लिए जुनून में वो बात नहीं ...

प्रलाप

प्रलाप   मित्र... अक्सर ख्वाबों में तुम्हें देखने की कोशिश की... कहां थे तुम ... जब नींद मुझे दुनिया से विलग करने का प्रयास करती थी... । अधखुली आंखों से मेरे होंठों पर प्रलाप होता था... तुम्हारे लिए। ... थे कहां तुम...। यूं मुझसे जुदा होने का सबब भी तो होना चाहिए तुम्हारे पास...। पहाड़ों के एक ओर ... जिधर सूर्य होता है.... रोशनी होती है। दूसरी ओर... जिधर रोशनी का इंतजार होता है... लोग होते भी हैं और मैं भी...। तब तुम उधर क्यों होते हो... जिधर रोशनी होती है। ओह... तुम्हें अब भी अंधेरा डराता है...। है न... मित्र । तुम्हें रोशनी पसंद है। सच कहूं... तुम बिन... मुझे भी डर लगता है...। अंधेरों से भी... और... रोशनी से भी। यही वजह है... मुझे रोशनी की बजाय... तुम्हारी जरूरत है.. मित्र।...

सुनहरा महल : कथा अंश

सुनहरा महल :  कथा अंश अचानक सामने जो देखा, यकीन नहीं हुआ। तसव्वुर में जरूर ऐसे नजारे किए लेकिन सामने... यथार्थ में... आश्चर्य ! कैसे तो ख्वाब आया ओर कैसे ख्वाब में ये नजारा आया फिर कैसे सामने हकीकत में देख कर आंखें चुंधिया रही हैं...! स्वप्न...! जरूर स्वप्न ही है ! बाहं पर चिकोटी काटी... उई...! जागते का नजारा है ये तो! वाह...! वाह...! सामने सुनहरा महल। महल के इर्द गिर्द खजूर के लंबी परछाइयों वाले पेड़। लंबी परछाइयां... वक्त सुबह का है या संध्या का... जानने का कोई साधन पास में नहीं ! यकबयक मंदिर की घंटियां सुनाई दी... संध्या... नहीं... नहीं... अलसभोर...। नहीं... निश्चित रूप से संध्या का समय है। मन ने कहा, अलसभोर हो तो पेड़ों की परछाइयां नहीं होती... सूर्य चमकने के बाद ही तो परछाइयों को पांव पसारने का मौका मिलता है। जरूर संध्या का समय है। सूर्यास्त के बाद परछाइयां सिमट जाएंगी। अपने आप में। आस पास के लोगों की तरह। ये सुनहरा महल भी दिखाई देना बंद हो जाएगा। आंख से ओझल हो जाएगा सब कुछ। लेकिन ये महल... इसका तो फकत तसव्वुर ही किया था कभी... साक्षात सामने कैसे आ खड़ा हुआ। अभी असमंजस के स...

सुनहरा महल : कथा अंश

सुनहरा महल :  कथा अंश अचानक सामने जो देखा, यकीन नहीं हुआ। तसव्वुर में जरूर ऐसे नजारे किए लेकिन सामने... यथार्थ में... आश्चर्य ! कैसे तो ख्वाब आया ओर कैसे ख्वाब में ये नजारा आया फिर कैसे सामने हकीकत में देख कर आंखें चुंधिया रही हैं...! स्वप्न...! जरूर स्वप्न ही है ! बाहं पर चिकोटी काटी... उई...! जागते का नजारा है ये तो! वाह...! वाह...! सामने सुनहरा महल। महल के इर्द गिर्द खजूर के लंबी परछाइयों वाले पेड़। लंबी परछाइयां... वक्त सुबह का है या संध्या का... जानने का कोई साधन पास में नहीं ! यकबयक मंदिर की घंटियां सुनाई दी... संध्या... नहीं... नहीं... अलसभोर...। नहीं... निश्चित रूप से संध्या का समय है। मन ने कहा, अलसभोर हो तो पेड़ों की परछाइयां नहीं होती... सूर्य चमकने के बाद ही तो परछाइयों को पांव पसारने का मौका मिलता है। जरूर संध्या का समय है। सूर्यास्त के बाद परछाइयां सिमट जाएंगी। अपने आप में। आस पास के लोगों की तरह। ये सुनहरा महल भी दिखाई देना बंद हो जाएगा। आंख से ओझल हो जाएगा सब कुछ। लेकिन ये महल... इसका तो फकत तसव्वुर ही किया था कभी... साक्षात सामने कैसे आ खड़ा हुआ। अभी असमंजस के स...