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... क्यों, भला कैसे ?

जब हम किसी की बात सुनते ही नहीं तो हमारी बात भी भला लोग क्यों सुनेंगे ? जब हमने भगवान की भक्ति ही नहीं की तो फिर भला भगवान हमें अपना भक्त कैसे बनाएंगे ? जब हमने बचत ही नहीं की तो भला जरूरत के वक्त हमें धन राशि कैसे मिलेगी ?  हम पाठक के रूप में खुद को स्थापित नहीं कर सकते तो फिर पाठक हमें लेखक के रूप में भला कैसे स्वीकारेंगे ?

‘रंगकर्म’ में भगवान भी माहिर

नाटक के माध्यम से समाज को शिक्षा और संदेश देने का कार्य सदियों से होता आया है। हमारी संस्कृति में रचीबसी पुराणों की कथाओं में भी भगवान विष्णु द्वारा अनेक रूप धरकर भक्तों की रक्षा करने के उदाहरण हैं। दूसरे देवी-देवताओं और अन्य पात्रों को लेकर भी अनेकानेक नाटक मंचित हुए हैं। भले ही पुराणों में वे कथाआंे के रूप में हैंे। वह नाटक नहीं है लेकिन रूप बदलना, नाटकीय अंदाज में वर्णन करना आदि से उन कथाओं में संकेत मिलते हैं कि नाट्य विधा को समाज ने बहुत पहले से अपनाया हुआ है।’ यहां तक कि 27 मार्च को विश्व रंगमंच दिवस भी मनाया जाता है। रंगमंच न केवल मनोरंजन का साधन है बल्कि इससे समाज को जागरूक करने का कार्य भी सदियों से किया जाता रहा है। इसके माध्यम से लोक कलाओं की विविध विधाओं को भी संरक्षण मिलता है। नाटक में लोक संगीत, लोक कथाएं और लोक व्यवहार समाहित रहता है इसलिए ऐसे ऐतिहासिक तथ्य सुरक्षित रहते हैं जो इतिहास के पन्न्नोें मंे दर्ज होने से रह जाते हैं। ऐसे महान कलाकार भी हुए हैं  जिन्होंने रंगकर्म के द्वारा न केवल समाज को शिक्षित किया बल्कि संकट के समय राष्ट्रभक्ति की भावना भी लोगांे में प...

कोटिच्युत

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कोटिच्युत कहानी - अंश (ये कहानी ‘‘भाषा’’ ( May June 2008 ) में प्रकाशित हो चुकी है) अबरार की झोंपड़ी हवा के झोंकों के साथ पकवानों की खुशबू से भर उठी। बियाबान में अबरार को रहते दस वर्ड्ढ हो गए। इस दौरान उसने शहर के बीसियों चक्कर लगाए, खूब खाया-पीया लेकिन अपनी झोंपड़ी से दूर। झोंपड़ी में बैठे हुए उसे आज हवा के साथ तैरती पकवानों की खुशबू बेचैन कर रही थी। अबरार नेत्रहीन है। पिछले पांच साल से उसे दिखाई देना बंद हो गया है। इस दौरान वह अकेले में तो अपनी इस झोंपड़ी से एक फर्लांग दूरी भी पार नहीं कर पाया है। हां, कोई आता और उसे साथ ले जाता तो वह शहर में अपनी यादों को ताजा करता था। पकवान तो दूर की बात झोंपड़ी में तो ताजी दाल-रोटी भी उसे इस अवधि में नसीब नहीं हुई थी। यहां तक भला कौन टिफिन लाता और उसे खिलाता। उसे ही हाई-वे तक जाना पड़ता जहां आते-जाते लोग अपनी कार-जीप या बस-ट्रक रोककर अबरार को कुछ न कुछ खाने-पीने की चीजें दे देते थे। आज पकवानों की खुशबू ने उसकी दुनिया में हलचल मचा दी। हवा के झोंकों के साथ कभी कचौड़ी, कभी पूरी तो कभी हलवे की सुगंध वह यूं महसूस कर रहा था मानो भट्ठी पर उसके साम...

1947 का आदमी : विभाजन में गुम 'नाम' की पीड़ा

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ख्यातिप्राप्त गायिका हेमलता जी के बीकानेर आगमन पर उन्हें मोहन थानवी ने अपना उपन्यास भेंट किया करतार सिंह नॉवेल करतार सिंह . .. उपन्यास, कहानी और नाटक के रूप में सिंधी पाठक इसे पढ़ चुके हैं। अपना अपना नाम करतार सिंह नाटक जवाहर कला केंद्र से पुरस्कृत है। भाषा पत्रिका में नाम गुम जाने की पीड़ा कहानी आपने पसंद की। यहां पेश है उपन्यास का अंश करतार सिंह 1947 का आदमी : विभाजन में गुम 'नाम' की पीड़ा  अरे करतारा तू यहां कैसे! क्या कर रहा है आजकल। सिटी पैलेस में बच्चों के लिए इलैक्ट्रोनिक खिलौने खरीद रहे करतार सिंह ने देखा रोहित उसी की ओर मुस्कराता हुआ देख रहा है। करतार ने उसे बताया कि अपने पोते सुधांशु के लिए गिफ्ट लेने आया था।  रोहित ने कहा, वह तो ठीक है मगर तुम यहां दुबई में कैसे। करतार उसे कॉफी शॉप पर ले गया और दोनों पेप्सी के केन से चुस्कियां लेते हुए बतियाने लगे । रोहित से मिले करतार को करीब बीस बरस हो चुके थे मगर उनकी दोस्ती करीब साठ साल पुरानी, पाकिस्तान के जमाने की है। तब रोहित रोहित ही था मगर करतार तब हरिप्रसाद था । सिन्ध पाकिस्तान के सक्खर में बिताए वक्त के बाद रोहित करता...

जानकीपुल: भारतीय अंग्रेजी साहित्य का तीसमारखां

जानकीपुल: भारतीय अंग्रेजी साहित्य का तीसमारखां

कुछ अच्छा ... बहुत अच्छा

कुछ अच्छा करने से बहुत अच्छा होता है। कुछ बातें बहुत अच्छी होती हैं। कुछ लोग बहुत अच्छे होते हैं। कुछ क्षण बहुत याद आते रहते हैं। कुछ अच्छाई बहुत सी बुराइयों को छिपा लेती है। कुछ अच्छे कार्य बहुत - से लोगों के लिए उदाहरण बन जाते हैं।