कोटिच्युत कहानी - अंश (ये कहानी ‘‘भाषा’’ ( May June 2008 ) में प्रकाशित हो चुकी है) अबरार की झोंपड़ी हवा के झोंकों के साथ पकवानों की खुशबू से भर उठी। बियाबान में अबरार को रहते दस वर्ड्ढ हो गए। इस दौरान उसने शहर के बीसियों चक्कर लगाए, खूब खाया-पीया लेकिन अपनी झोंपड़ी से दूर। झोंपड़ी में बैठे हुए उसे आज हवा के साथ तैरती पकवानों की खुशबू बेचैन कर रही थी। अबरार नेत्रहीन है। पिछले पांच साल से उसे दिखाई देना बंद हो गया है। इस दौरान वह अकेले में तो अपनी इस झोंपड़ी से एक फर्लांग दूरी भी पार नहीं कर पाया है। हां, कोई आता और उसे साथ ले जाता तो वह शहर में अपनी यादों को ताजा करता था। पकवान तो दूर की बात झोंपड़ी में तो ताजी दाल-रोटी भी उसे इस अवधि में नसीब नहीं हुई थी। यहां तक भला कौन टिफिन लाता और उसे खिलाता। उसे ही हाई-वे तक जाना पड़ता जहां आते-जाते लोग अपनी कार-जीप या बस-ट्रक रोककर अबरार को कुछ न कुछ खाने-पीने की चीजें दे देते थे। आज पकवानों की खुशबू ने उसकी दुनिया में हलचल मचा दी। हवा के झोंकों के साथ कभी कचौड़ी, कभी पूरी तो कभी हलवे की सुगंध वह यूं महसूस कर रहा था मानो भट्ठी पर उसके साम...