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Showing posts from September, 2012

इतिहास के वातायन से झांकती नारी शक्ति: सिंधी नॉवेल से अंश...

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इतिहास के वातायन से झांकती नारी शक्ति: सिंधी नॉवेल से अंश... इनि वक्ति बई निराण भाजाइयूं गुझे सुफे में ई वेठियूं गाल्हियंू पइयूं कनि। उननिसां गडु लिखमी ऐं मेवी बि हुई। जाहिरु आहेए सिंधु जियूं इअे चारई वीर जालियूं अगिते लाइ रणनीति बणाइण में मशगूल हुइयूं। लिखमी     .     माई पदमा जी गाल्हि तवज्जो डिहण वारी आहे। दुश्मन इनि वक्ति अल्लोर जे         किले डाहुं वधण जी कोशिश कंदो। हालात इन्हींअ डाहुं साफ साफ इशारो         कनि था। दुश्मन जी फितरत खे डिसंदे इनि गाल्हि में बि को शुबहो कोने कि         महलात या किले जे खास माण्हूंनि खे बरगलाए करे दुश्मन पहिंजी साजिश में         शामिल करण लाइ फतकंदो हूंदो। माई .         दुश्मन जी फितरत खे पोइनि कुझु महीननि खां तव्हां ऐं मां चंङी तरहां सुञाणे         परखे वड़तो आहे। हालांकि महाराजा दाहर बि दुश्मन जी हरेकु साजिश खे      ...

कर्म बिना फल का नहीं होता...

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जीवन प्रबंधन से ही व्यवस्थित और सुखमय हो सकता है। बिना प्रबंधन के तो चींटी भी नहीं जीती। चींटी ही क्यों, प्रत्येक प्राणी को समूह में जीते ही हम देखते हैं। ऐसा कोई प्राणी नहीं जो अकेला जीता हो या आज तक जीया हो। पेड़-पौधों को भी समूह में लहलहाना अच्छा लगता है क्योंकि वे भी बीज रूप से प्रस्फुटित होने से लेकर मुरझाने तक एक कुषल प्रबंधन प्रणाली से विकसित होते हैं, फल देते हैं। जीवन का मकसद ही फल देना है। गीता का संदेश है, कर्म किए जाओ फल की इच्छा मत करो... साथ ही यह भी कोई भी कर्म बिना फल का नहीं होता।

आप आपकी मूंछो कै सै ताव दे

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Rajasthani Bhasha sahity ke gahne.. inhen rajasthani blog se hi liya hai - SAABHAAR आप आपकी मूंछो कै सै ताव दे हैं। आप आपकी रोट्यां नीचे सै आंच देवै। आप आपके दाणै पाणी मे मसत है। आप आपको जी सै नैं प्यारो। आप कमाया कामड़ा, दई न दीजै दोस।

साजिश / साजिशी / सज्जन... साजगिरी

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साजिश  में  मशगूल / साजिशी  को  फुर्सत  नहीं  थी / सज्जन  साजगिरी  गुंजाता / सादगी  से  'पार ' पहुँच  गया... ......( दूसरो को भटकाने वाला अपने ही लक्ष्य से भटक जाता है और  कभी मंजिल तक नहीं पहुचता जबकि अपने काम से काम रखते हुव़े लगातार लक्ष्य की ओर बढ़ने वाले को निश्चय ही मंजिल मिल जाती है...)

"" हम सभी जुड़े हैं ! हम बस इसे देख नहीं पाते...

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"" हम सभी जुड़े हैं ! हम बस इसे देख नहीं पाते हैं ! "बाहर वहां" और "अन्दर यहाँ" का कोई भेद नहीं है ! ब्रह्माण्ड में हर चीज़ जुडी है ! यह ऍक वृहद् ऊर्जा क्षेत्र है !""  -   जाँन असाराफ""  ( साभार - The Secret  रहस्य ...pustak  से ) ""

दाणो पाणी परसराम बाह पकड़ ले जात!!!

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मायड भाषा -- अंजळ बडो बलवान ! ..... जहा का दाना-पानी लिखा हो मनुष्य को वहीँ जाना होता है! ....  कित कासी कित कासमीर खुरासाण गुजरात -- दाणो पाणी परसराम बाह पकड़ ले जात!!!

आवाजों के जंगल मे ...

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ख़ामोशी  के  सुर ... अच्छे  लगते  है ... चुप  रहके  भी ... बहुत  कहते  हैं ... जुबां  फिसलती  नहीं ... ...फिसलने  के  बहाने ... किस्सा -ऐ -दिल  बनते  हैं ... आवाजों  के  जंगल  मे ... ख़ामोशी  के  मकान  बनते  हैं ... ख़ामोशी  के  सुर ... अच्छे  लगते  हैं ... 'वो '  उनसे  कुछ  कहते  नहीं ... 'वे '  फिर  भी  'उनकी  अनकाही  को  सुनते  हैं

Bikaner : Dharm Dhara

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बीकानेर में लालीमाइजी री बगेची; नवलपुरीजी रो मठ, धुनीनाथजी मिन्दर, श्रीभजनेजी री साल, नागणेचेजी मिन्दर, चन्दन सागर,  खाखीजी का अखाड़ा, डगली संतपीठ सूरसागर, खरनाडा, बेणीसर बारी, कुभारां में लहरीबाबा अ‘र करणगिरिजीरी बगेची, बीकोजी री टेकरी, फरसोलाई तलाई, बागीनाडा, राणीसर में कुओं अ‘र छत्री, सोहनगिरि मिन्दर, जयुपरियों रो मिन्दर, देवीकुंड सागर, व्यास जेठमलजी री बगेची, जोड़-बीड़, सांवतगिरिजी री गुफा, चेतनानंद आश्रम संसोलाव, बडारण लाला रो मिन्दर ; भीनासर में महंत षिवजीराम अ‘र महंत गुलाबदास रो स्थान, कन्दोयां में संत श्रीइमरत रामजी बेदों की बगेची , राजरतन बिहारी बगेची मांय बूढा खाखीजी रा भगत, मूंधड़ों मांय श्रीमिरचीगिरिजी, डागों री बगेची मांय दादूपंथी सहजरामदासजी, जसोलाई महादेव मिन्दर मांय दादूपंथी जीवणदासजी रा भगत.... अ'र ...बाकी साधु-संता अ'र मिन्दारा रा घणाइ नांव आप जड़ दीजो सा...

हरि प्रसाद क्यों बना करतार सिंह ?

हरि प्रसाद क्यों बना  करतार सिंह प्रसिद्ध सिंधी उपन्यास के अनूदित चुनिंदा अंश  हरि के देखते-देखते देश आजाद हुआ। मगर देश की तरह उसका व्यक्तित्व भी करतार और हरि में बंट गया। बंगाल, पंजाब और करोड़ों दिल टूटे। जेल में यातनाएं सहने वाले फिर समस्याओं से जूझने लगे। भाषण देने वालों को फूलों से लादा गया। कुर्सी की महिमा बढ़ गई। कईयों की दुनियां लुट गई। किसानों को भूख मिली, महाजनों को धन-दौलत। विद्यालयों की संख्या बढ़ी मगर शिक्षक ढूंढ़ने पर तनख्वाह पाने वाले सरकारी कारिन्दे मिले। दिल्ली, कलकत्ता और बंबई के नाम बदल गए, परन्तु लोगों का दुःख-दर्द वही रहा। ..... तब हरि ने आश्रम के पार्क में उसे बताया था कि वह अब करतार है। आश्रम में ही दोनों एक हुए। घर-गृहस्थी की बगिया कब फली-फूली, दोनों को आश्रम सम्हालने में पता ही नहीं चला। दोनों ने काफी कोशिश की अपने अपने परिवार को खोजने की। इस बीच अपना आश्रम खोलने का मौका भी उन्हें मिला जिसका बखूबी उपयोग उन्होंने किया। एक बार नेहरूजी भी आश्रम में आए, करतार ने उन्हें प़त्र लिखा था, गांधीजी का हवाला दिया था और अपने साथ बम्बई में बिताए क्षणों की याद दिलाई थ...

नाचे मन मोरा मगन...

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नाचे मन मोरा मगन...