चुनाव : पर्दे के पीछे - महिलाओं और गरीबों की राजनीति में बढ़ रही अहमियत...
- मोहन थानवी
आज की राजनीति क्या सचमुच गरीबी और महिलाओं पर केंद्रित होती जा रही है ! लोगों में ऐसी चर्चा है। चर्चा इस वजह से भी है कि बीते काफी दिनों से राजनीति कभी ओबीसी तो कभी हिंदू मुसलमान कभी विकास मुद्दों पर होती देखी गई। किंतु अब जब से सबसे बड़ी जाति गरीबी का वाक्य सामने आया तब से राजनीतिक जगत के जाने-माने चेहरे अपने संवाद को गरीबी और महिलाओं पर केंद्रित रखने की भरसक कोशिश में दिखते हैं।
पर्दे के पीछे तो लोग यह भी कह रहे हैं कि किसी भी मुद्दे पर संवाद शुरू हो प्रखर वक्ता उसे येनकेन प्रकारेण महिलाओं और गरीबी पर ले ही आते हैं। लोगों का ऐसा कहने के पीछे भी कारण है। वह कारण है जयपुर में एक मीडिया हाउस की ओर से भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस के वक्ताओं की एक मंच से खुली चर्चा में ऐसा होते देखा और सुना जाना।
इस चर्चा में दोनों प्रमुख दालों के नामी परिचित नेता शामिल हुए और आरोप प्रत्यारोप के प्रति उत्तर में बात घूमते घुमाते महिलाओं और गरीबी पर आई दृष्टिगोचर हुई। हालांकि ऐसी स्वस्थ संवाद चर्चा में राजनीतिक मुद्दों को बखूबी उठाया गया। इनमें कोरोना काल में घटित बहु चर्चित राजनीतिक घटनाक्रम भी शामिल रहा तो लाखों रुपए की दुर्घटना बीमा और स्वास्थ्य बीमा योजना की भी चर्चा रही।
मगर बात घूम फिर कर गरीबों के कल्याण के कार्यों के श्रेय लेने पर आ टिकती। इसी तरह महिलाओं के लिए केंद्र और राज्य सरकार द्वारा किए गए कार्यों को गिनाया जाने लगता। इस बीच महिलाओं के प्रति बढ़ते अपराध का विषय भी चर्चा में दो-तीन बार आया लेकिन बस छूकर उसे एक तरफ कर दिया गया।
जबकि आज ही भाजपा ने अपने संकल्प पत्र में राजस्थान में महिलाओं के प्रति बढ़ते अपराध पर अंकुश के लिए महिला थाना और थानों में एंटी रोमियो डेस्क की अपनी परिकल्पना को सामने रखा है।
जबकि कांग्रेस ने काफी दिन पहले ही अपनी 7 गारंटी में महिलाओं को वरीयता देते हुए योजनाएं प्रस्तावित की है। ऐसे ही बातें संकेत कर रही है कि अब राजनीति गरीबी और महिलाओं के कारण आमजन पर केंद्रित हो रही है।
तेजी से बदलते राजनीतिक परिदृश्य में इसे अच्छा संकेत भी माना जा रहा है।






यहां व्यक्त कीजिए - खबर आपकी नजर में...