चुनाव : पर्दे के पीछे - कांग्रेस-भाजपा के प्रचार-वीर पसोपेश में...
- मोहन थानवी
जब से कुर्सी मिली तब से सुर्खियां बटोरने में लगे कतिपय जनप्रतिनिधि अब कुर्सी बचाने की जुगत में जतन करने में रत हैं। उलट-पुलट हो रही अपने-अपने क्षेत्र की स्थिति पर चिंतित दिखाई दे रहे हैं। बहुत-सी प्रमुख सीटों पर कमोबेश ऐसी ही स्थिति पर्दे के पीछे बताई जा रही है। इन दोनों राजनीतिक दलों के जनता की अगुवाई करने वाले कुछेक नेताओं के बारे में कहा जा रहा है, काम किए तो अपनों के, तब आमजन की सुध भूल गए अब दीर्घावधि से चली आ रही जन-समस्याओं पर जवाब देते नहीं बन पड़ रहा !
इनके पास बस्ती-मोहल्लों की सफाई, पानी निकासी और सड़कों की हालत के बारे में पूछे जाने पर बगलें झांकने सिवाय रह ही क्या जाता है ? हां, कुछ मामलों में एक दल के नेता दूसरे दल पर काम में अड़ंगे डालने के आरोप जड़ते हुए मानो इतिश्री कर लेते हैं। जैसे कि शहर को दो भागों में विभक्त करने वाली रेल फाटक समस्या। और रिहायशी व औद्योगिक क्षेत्रों के सामने मुंह चिढ़ाती खड़ी पानी निकासी की चिरपरिचित समस्या।
यह तो पर्दे के बिल्कुल सामने है कि बीते 5 वर्षों में ऐसी जन समस्याओं को किनारे रखते हुए किन-किन जनप्रतिनिधियों ने चहेतों की नैया पार लगाने में कितना जोर लगाया। साथ ही सोशल मीडिया और अपने प्रचार तंत्र के माध्यम से कितनी सुर्खियां बटोरने के प्रयास किए। टिकट मिलने तक करते रहे। अब पर्दे के पीछे कानाफूसी यह हो रही है की अनियंत्रित और असीमित प्रचार पर अंकुश के लिए निर्वाचन विभाग की ओर से उठाए गए कदम कारगर साबित होते दिखाई दे रहे हैं। केवल प्रचार के माध्यम से छाए रहने वाले बहुत से चेहरे अब प्रतिद्वंद्वियों के सम्मुख धुमिल पड़ते दिखाई दे रहे हैं।
लोगों का कहना है कि इसी वजह से और तीखे तेवरों वाले बागी प्रत्याशियों के डटे रहने से दोनों प्रमुख पार्टियों को अपनी-अपनी वोट बैंक वाली कुछेक जमी जमाई सीटों पर भी जीत के लिए पूरा जोर लगाना पड़ रहा है। क्योंकि उन्हें अब स्थिति केवल प्रचार से काबू में आने वाली नहीं लगती।






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