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कोरोना की कुंजी भारतीय संस्कृति के पास
-✍️ डाॅ. अनिला पुरोहित
वैश्विक आपदा: आत्म मंथन एवं आत्म विश्लेषण का दौर
आज कोरोना वायरस संक्रमण से जूझ रहा सम्पूर्ण विश्व त्राहि-त्राहि कर रहा है। सम्पूर्ण विश्व स्पष्ट देख-समझ रहा है कि इस बहुत बड़ी वैश्विक आपदा की इस विकट घड़ी में वही देश विजित है जिसने प्रकृति, पर्यावरण से प्रेम व संरक्षण कर संयमित जीवन शैली का निर्वाह किया है। जिसने अनुशासन व अपरिग्रह को जीवन का अंग बना लिया है। ऐसे में समस्त विश्व ससम्मान सर्वप्रथम हमारे भारत का नाम लेता है।

भारत सदैव विश्व पटल पर अपने ज्ञान, संस्कृति, आध्यात्मिकता (दया, प्रेम, करूणा) के क्षेत्र मे श्रेष्ठ रहा है। भारतीय संस्कृति में प्रकृति, ईश्वर, पर्यावरण प्रेम हमेशा जीवन शैली का अभिन्न रहा है। यद्यपि पश्चिमी देशों एवं पाश्चात्य जीवन शैली व संस्कृति से प्रभावित लोगों ने भारतीय संस्कृति का मजाक ही बनाया है, वह चाहे आध्यात्मिकता, प्रकृति पूजा, पशु पूजा, स्वच्छता का सख्ती से पालन आदि हो। किन्तु आज इस कोरोना वायरस संक्रमण आपदा ने भारतीय संस्कृति को स्वीकार और आत्मसात करने को बाध्य कर दिया।
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क्वारंटाइन का सिद्धान्त भारतीय संस्कृति में बहुत पहले से ही है। घर के वातावरण को शुद्ध रखना सदैव एक अनिवार्यता रही है। आधुनिक विश्व के लिहाज से भले ही आज भारत विकासशील देशों की श्रेणी में आ रहा है तथा विकास के सोपान चढ़ रहा है। पाश्चात्य संस्कृति की व भोगवादी ग्लैमर से ओत प्रोत संस्कृति की नकल कर उस ओर भाग रहा है।
आज इस वैश्विक आपदा ने प्रत्येक हिन्दुस्तानवासी सहित समस्त विश्व-मानव को आत्ममंथन व आत्म विश्लेषण करने को मजबूर कर दिया है और सभी कर भी रहे हैं। यही कारण है कि सम्पूर्ण विश्व आज भारतीय संस्कृति को मानने व आत्मसात् करने को मजबूर एवं लालायित है।
भारतीयों को भी प्रकृति व संस्कृति से सामंजस्य बैठा एवं उसका संरक्षण कर विकास की लक्ष्मण रेखा को खींचना होगा। यह आत्मविश्लेषण का क्षण है कि हमें ईश्वर द्वारा प्रदत्त संसाधनों, प्रकृति, विश्व मैत्री बंधुत्व का सम्मान करना होगा। हमारी जीवन शैली को अपरिग्रह, करूणा व प्रेम से भारतीय संस्कृति को पुनः जोड़ना होगा।
कोरोना आपदा ने सम्पूर्ण विश्व को चपेट में ले रखा है तो शहर बीकाणा भी इससे अछूता नहीं रहा। नमन इस बीकाणा की धरा को जिसने करूणा, कर्म, ज्ञान, आध्यात्मिकता की श्रेष्ठता को हमेशा अपनाए रखा। यह शहर पाश्चात्य संस्कृति की भोगवाद व परिग्रह की प्रवृति से कोसों दूर है। बीकाणा इस आपदा से ठिठका जरूर है किन्तु अपनी जिन्दादिली, कर्तव्य निष्ठा व साम्प्रदायिकता तथा भाई चारे की सांझा विरासत, संस्कृति को ओढ़े इस संकट पर विजय पाई है। जहां पूरा विश्व, संकीर्णताओं, स्वविकसित की भावना, ईर्ष्या, द्वैष, घृणा से भरा है, जिससे कहीं न कहीं भारत भी अछूता नही। इस परिदृश्य में भी बीकानेर ने भारतीय संस्कृति को जीवंत रखा व मानव मात्र के कल्याण व विकास की चेतना जागृत की।
”बीकानेर की संस्कृति, सबका सांझा सीर
दाऊजी मेरे देवता, नौगजा मेरे पीर“

ऐसा नही कि प्रकृति ने हमें चेताया नहीं, किन्तु हम वैश्विक दौर व दौड़ में इसको समझ नहीं पाए और ना ही समझना चाहा । हम प्रकृति को अपने हक की सम्पत्ति मान उसके दोहन की होड़ में लग गए। इस कोरोना संक्रमण आपदा ने सम्पूर्ण, विश्व, मानव जाति को अपने भीतर को समझने, आत्म विश्लेषण करने और आत्ममंथन करने का अवसर प्रदान किया है। निःसंदेह आज सम्पूर्ण विश्व आत्म मंथन कर रहा है, आशा है इस मंथन से अमृत जरूर निकलेगा। हम पुनः प्रकृति पूजा, विश्व बंधुत्व, प्रेम, भाईचारा की भावना की ओर अग्रसर होगें। हम पुनः जागेंगे, दौड़ेगें एवं जीतेंगे। यह वैश्विक आपदा हमें चेता रही है व आह्वान कर रही है कि हे भारतीयों! भारतीय संस्कृति की ओर लौटो।
जहां हर बात को गैर से भी समझा जाता है
अपनों के संग परायों में भी प्यार बांटा जाता है
कुछ ऐसा शहर मेरा “बीकानेर“
जहां दिन भर के गम को रात “पाटों“
पर छोड़ा जाता है।
-✍️ डाॅ. अनिला पुरोहित
सह आचार्य इतिहास
राजकीय डूंगर महाविद्यालय,
बीकानेर।
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