सच्चाई पढ़ें । सकारात्मक रहें । संभावनाएं तलाशें ।
खबरों में बीकानेर 🎤 🌐
✍️
जाम्भाणी राष्ट्रीय संगोष्ठी : 2रे दिन बताया... संतों के उपदेश आम व्यक्ति तक पहुंचाने का दायित्व हम सब का..., पहले दिन शोध सारांशिका और उदो जी अडिग की वाणी का विमोचन हुआ
जाम्भाणी विषयक दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी सम्पन्न
बीकानेर 11 नवम्बर। जाम्भाणी साहित्य अकादमी, राजकीय डूंगर महाविद्यालय बीकानेर तथा साहित्य अकादमी उदयपुर के संयुक्त तत्वावधान में दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का समापन सोमवार को हुआ। सह संयोजक संगोष्ठी डाॅ. अनिला पुरोहित ने बताया कि समापन सत्र के मुख्य अतिथि राजस्थान पशु चिकित्सा एवं पशु विज्ञाान विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति डाॅ. ऐ. के. गहलोत, विशिष्ट अतिथि काॅलेज शिक्षा के सहायक निदेशक डाॅ. राकेश हर्ष एवं अध्यक्षता राजस्थान राज्य अभिलेखागार के निदेशक डाॅ. महेन्द्र खड़गावत ने की।
इस अवसर पर अपने उद्बोधन में डाॅ. गहलोत ने युवाओं से जाम्भोजी के सिद्धान्तों को अपनाने की अपील की। उन्होनें कहा कि सन्तों के उपदेश आम नागरिकों के लिये ही दिये जाते हैं लेकिन आज के युग में युवाओं की मानविकी से दूरी बढ़ते जाने के कारण ये सिद्धान्त आम व्यक्ति तक नहीं पहुचं पाते हैं। डाॅ. गहलोत ने कहा कि पशुपालन भी मानसिक तनाव को कम करता है यही कारण है कि दूसरे राज्यों की तुलना में राजस्थान में किसानों की आत्महत्या बहुत कम है इसकी मुख्य वजह पशुपालन ही है। उन्होनें कहा कि विश्नोई समाज की पहचान पर्यावरण प्रेमियों के रूप में बनी है जिसे बनाये रखना समाज की ही जिम्मेवारी है।
विशिष्ट अतिथि डाॅ. राकेश हर्ष ने कहा कि यदि जाम्भोजी के 29 नियमों में से केवल कुछ ही नियम भी जीवन में अपना लिये जावें तो इस प्रकार की संगोष्ठी सही अर्थों में सार्थक होगी। जाम्भाणी साहित्य का जिक्र करते हुए डाॅ. हर्ष ने कहा कि साहित्य और संगीत के बिना जीवन अधूरा ही रहता है।
अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में डाॅ. महेन्द्र खड़गावत ने जाम्भोजी के साथ ही बाबा रामदेवजी और तेजाजी का भी जिक्र किया। उन्होनें कहा कि जहां लिखित इतिहास बंद हो जाता है वहीं सन्तों की वाणी इतिहास में कड़ी जोड़ने का काम करती है। डाॅ. खड़गावत ने कहा कि किसी भी समाज द्वारा लिखित पुस्तकों तथ्यों की तुलना में भावनाओं पर अधिक आधारित होती है। इसलिये आवश्यक है कि समाज के युवा शोधार्थी अभिलेखागार में विश्नोई एवं समाज पर आधारित अभिलेखों का अध्ययन करें एवं तथ्यात्मक शोध पत्र प्रकाशित करें। डाॅ. खड़गावत ने गजेटियर आॅफ दी बीकानेर, दी पंजीब सेशन्स रिपोर्ट, दी राजपूताना गजेटियर, गजेटियार आॅफ हिसार डिस्ट्रिक्ट आदि अभिलेखों का अध्ययन करने की नसीहत दी।
जाम्भाणी अकादमी के सचिव डाॅ. सुरेन्द्र खीचड़ ने कहा कि डाॅ. खड़गावत के निर्देशानुसान युवाओं को अभिलेखागार का अध्ययन करने हेतु प्रेरित किया जावेगा तथा अकादमी के लिये केन्द्रीय अभिलेखागार तथा राज्य अभिलेखागार से भी आर्थिक संसाधन जुटाने के हर सम्भव प्रयास किये जावेगें। समापन सत्र में श्री बनवारी लाल साहू ने सभी अतिथियों एवं आगन्तुओं का धन्यवाद ज्ञापित किया।
आयोजन सचिव डाॅ. इन्द्रा विष्नोई ने बताया कि समापन समारोह से पूर्व प्रातः दो सत्रों का आयोजन हुआ। प्रथम सत्र की अध्यक्षता प्रो. भंवर भादानी एवं मुख्य अतिथि डाॅ. सतीश कौशिक रहे। इस सत्र मंें डाॅ. राजेन्द्र पुरोहित ने जाम्भोदी की दृष्टि खेजड़ी के विशेष संदर्भ में, डाॅ. श्याम सुन्दर ज्याणी ने पारिवारिक वानिकी एंव डाॅ. नरेन्द्र भोजक ने लघु फिल्म के माध्यम से प्लास्टिक के दुष्प्रभाव पर अपना व्याख्यान दिया। सत्र संचालन डाॅत्र बृजरतन जोशी ने किया। द्वितीय सत्र की अध्यक्षता डाॅ. कृष्णलाल विश्नोई तथा मुख्य अतिथि प्रो. मदन केवलिया रहे। इस सत्र में श्री कमल रंगा, डाॅ. सुचित्रा कश्यप, डाॅ. बंशीलाल ढ़ाका तथा गौरीशंकर प्रजापत ने अपने पत्र वाचन किये। सत्र संचालन डाॅ. अम्बिका ढाका ने किया। संगोष्ठी में 100 से भी अधिक शोधपत्रों का वाचन किया गया।
जाम्भाणी विषयक दो दिवसीय संगोष्ठी का शुभारम्भ
बीकानेर 10 नवम्बर। जाम्भाणी साहित्य अकादमी, डूंगर महाविद्यालय बीकानेर एवं साहित्य अकादमी उदयपुर के संयुक्त तत्वावधान में रविवार को अकादमी भवन में जाम्भोजी विषयक दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का शुभारम्भ हुआ। आयोजन सचिव डाॅ. इन्द्रा विश्नोई ने बताया कि कार्यक्रम के मुख्य अतिथि ऊर्जा मंत्री डाॅ. बी.डी.कल्ला, विशिष्ट अतिथि कुलपति प्रो. भगीरथ सिंह, नोखा विधायक श्री बिहारीलाल विश्नोई एवं डाॅ. सरस्वती विश्नोई रहे।
अकादमी के सचिव डाॅ. सुरेन्द्र खीचड़ ने बताया कि कार्यक्रम के प्रारम्भ में अतिथियों ने वृक्षारोपण किये। उसके पश्चात मां सरस्वती की प्रतिमा के समक्ष दीप प्रज्जवलन कर कार्यक्रम का विधिवत उद्घाटन किया गया। अपने उद्बोधन में जाम्भाणी अकादमी की संरक्षक डाॅ. सरस्वती विश्नोई ने अकादमी द्वारा किये गये विभिन्न कार्यो को विस्तृत रूप से बताया। उन्होनें विश्नोई शब्द को जीवन शैली से जोड़े जाने की महता पर बल दिया। डूंगर काॅलेज के प्राचार्य डाॅ. सतीश कौशिक ने विषय प्रवर्तन करते हुए संगोष्ठी की उपादेयता पर प्रकाश डाला। बीज वक्ता डाॅ. जगदीश गिरी ने विभिन्न विश्वविद्यालयों में चल रही साहित्यिक गतिविधियों विशेषकर जाम्भोजी की वाणी का जिक्र किया। उन्होनें भक्ति आंदोलन में विभिन्न सन्तों की भूमिका का उल्लेख करते हुए कहा कि इन सभी में जाम्भोजी प्रमुख थे।
मुख्य अतिथि ऊर्जा मंत्री माननीय डाॅ. बी.डी.कल्ला ने कहा कि जब जब धर्म की हानि हुई तब तब भगवान अवतार लेते हैं उन्होने जाम्भोजी को भी एक देवदूत की संज्ञा देते हुए बताया कि वे मानवता के सच्चे उपासक थे। डाॅ. कल्ला ने राजस्थानी में बेहद आकर्षक अन्दाज में अपने उद्बोधन में कहा कि मातृ भाषा के माध्यम से ही सम्प्रेषण हो सकता है। उन्होनें राजस्थानी भाषा को मान्यता दिये जाने की भी वकालत की। डाॅ. कल्ला ने साहित्यकारों एवं शोधार्थियों से जीव जन्तुओं एवं पेड़ पौघों की रक्षा करने की अपील की ।
गंगा सिंह विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. भगीरथ सिंह ने कहा कि इस प्रकार की संगोष्ठी का कुछ समाजपयोगी निष्कर्ष निकलना चाहिये तभी इसकी सार्थकता सिद्ध हो सकेगी। उन्होनें कहा कि विश्नोई का अर्थ पर्यावरणवादी होता है हमें इसी संकल्प के साथ आगे बढ़ना होगा। प्रो. सिंह ने कहा कि आने वाले समय में गंगा सिंह विश्वविद्यालय गायों के संरक्षण के पुनीत कार्य को आगे बढ़ाने में हर सम्भव सहयोग करेगा।
नोखा विधायक श्री बिहारी लाल विश्नोई ने कहा कि जाम्भोजी के सिद्धान्तों को देश के कोने कोने तक फैलाने में इस प्रकार की संगोष्ठी बेहद कारगर सिद्ध होगी।
इस अवसर पर शोध सारांशिका के विमोचन के साथ ही स्वामी कृष्णानन्द आचार्य कृत पुस्तक उदो जी अडिग की वाणी का विमोचन भी किया गया। डूंगर महाविद्यालय के समाजशास्त्र के सह आचार्य डाॅ. श्याम सुन्दर ज्याणी का पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य करने पर सम्मान किया गया।
अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में अकादमी के अध्यक्ष श्री कृष्णानन्द आचार्य ने जांभोजी की जीवनी पर प्रकाश डाला तथा सभी आगन्तुकों से आगामी गतिविधियों में भाग लेने की अपील की। संगोष्ठी समन्वयक डाॅ. शालिनी मूलचन्दानी ने सभी अतिथियों एवं आगन्तुकों का आभार प्रकट किया।सह समन्वयक डाॅ. अनिला पुरोहित ने बताया कि उद्घाटन सत्र के पश्चात दो तकनीकी सत्र आयोजित हुए। प्रथम सत्र की अध्यक्षता चण्डीगढ़ के डाॅ. अमरसिंह वधान एवं मुख्य अतिथि पूर्व प्राचार्य डाॅ.उमाकान्त गुप्त रहे। इस सत्र में डाॅ. अन्नाराम शर्मा, डाॅ. राजनारायण व्यास तथा डाॅ. हरिराम विश्नोई ने अपने शोध पत्रों का वाचन किया। सत्र का संचालन डाॅ. ओम प्रकाश विश्नोई ने किया। इसी प्रकार द्वितीय तकनीकी सत्र की अध्यक्षता नई दिल्ली से पधारे श्री वी.के.सिंघल ने की तथा मुख्य अतिथि डाॅ. शालिनी मूलचन्दान रहीं। इस सत्र में डाॅ. नन्दिता सिंघवी, डाॅ. मनमोहन लटियाल तथा डाॅ. रामस्वरूप विश्नोई ने अपने शोध पत्र प्रस्तुत किये। संत्र का संचालन डाॅ. अनिल धारणिया ने किया।
📒 📰 📑 पढ़ना और पढ़ाना जीवन सफल बनाना 📚 📖 📓








यहां व्यक्त कीजिए - खबर आपकी नजर में...