Monday, August 27, 2012

राजस्थानी कवितावां

वाणी प्रकाशन: 'मैं एक हरफ़नमौला'

वाणी प्रकाशन: 'मैं एक हरफ़नमौला': 'मैं एक  हरफ़नमौला - ए .के. हंगल  'सब कुछ वैसे ही हुआ जैसी कि उम्मीद थी  । मैंने अधिकारियों को सन्देश भिजवा दिया कि मैं अब हिन्...

Sunday, August 26, 2012

साझा मंच: वीर शिरोमणी महाराजा दाहिर

साझा मंच: वीर शिरोमणी महाराजा दाहिर: महाराजा दाहिर की जयंती पर 25 अगस्त को विशेष पुण्य सलिला सिंध भूमि वैदिक काल से ही वीरों की भूमि रही है। वेदों की ऋचाओं की रचना इस पवित्...

Tuesday, August 21, 2012

गर्जना होती मचता द्वन्द्व


चारों ओर रेत ही रेत

कभी छाते बादल

बरसते और...
थमती रेत

बिजली चमकती
मसले बनते

गर्जना होती
द्वन्द्व मचता

बिखरे स्वप्न इकट्ठा होते

गांठ बंधती

कारीगर रोंधते जमीन

खोदते विगत

नींव हिलती

इमारत ढहती

चलती आंधी

रह जाती

चारों ओर रेत ही रेत


Monday, August 20, 2012

‘‘गुलामी की जंज़ीर’’ से निकले….


‘‘गुलामी की जंज़ीर’’ से निकले….
‘‘गुलामी की जंज़ीर’’ से निकले.... ( अजमेर से सिंधी में प्रकाशित हिंदू दैनिक के 15 अगस्त 2011 के संस्करण में ---- ) ‘‘गुलामी की जंज़ीर’’ से निकले, ‘‘आजादी की बेड़ी’’ मंे पहुंचे गुलाम बेगम बादशाह
‘‘गुलामी की जंज़ीर’’ से निकले.... ( अजमेर से सिंधी में प्रकाशित हिंदू दैनिक के 15 अगस्त 2011 के संस्करण में ---- ) ‘‘गुलामी की जंज़ीर’’ से निकले, ‘‘आजादी की बेड़ी’’ मंे पहुंचे गुलाम बेगम बादशाह
( अजमेर से सिंधी में प्रकाशित हिंदू दैनिक के 15 अगस्त 2011 के संस्करण में  —- )
‘‘गुलामी की जंज़ीर’’ से निकले, ‘‘आजादी की बेड़ी’’ मंे पहुंचे गुलाम बेगम बादशाह
आधी रात को जब दुनिया सोई हुई थी। खामोश दीवारों पर टंगे 1947 के कैलंेडर के अगस्त माह के पृष्ठ पर आधे बीते दिनों की तारीख परिवर्तित हो रही थी। तब आजादी ने गुलामी को जलावतन कर राष्ट्र को जाग्रत किया। गुलामी की जंज़ीरें काट कर हम आजादी की बेड़ी ( नाव ) में पहुंच गए। जंज़ीर अपराधियों को कैद में रखने के लिए और जानवरों को काबू में करने के काम में लाई जाती है। बेड़ी  नदी, तालाब पार करने के लिए इस्तेमाल की जाती है। लेकिन, बेड़ी का एक अर्थ जंज़ीर भी है।
आजादी की बेड़ी के स्वागत – अभिनंदन में खूब हल्ला हुआ। नाजुक दौर में कितने ही लोगांे ने अपनी जान दे दी। ( कितने ही लोगों की जानें ले ली गई ) । उन आजादी के दीवानों का स्वप्निल का भारत आज संक्रमण काल के उन पलों को जी रहा दृष्टिगोचर हो रहा है जो पल भविष्य निर्धारित करते हैं।
राष्ट्र में फिर आधी रात को वैसा ही अंधेरा छाया नजर आ रहा है जिस अंधेरे के बाद सुबह का सूरज निश्चित रूप से उजाला फैलाता है। क्या यह हालात पर नियंत्रण करने के लिए उठ खड़े होने का संकेत है !
आरक्षण की आग चारों ओर लगी हुई है। आमजन आजाद होते हुए भी खुद को आरक्षण की कैद में महसूस कर रहा है। मूल्य वृद्धि और महंगाई के इस दौर में आम जनता त्राहिमाम त्राहिमाम कर रही है और … वतन के मालिक कहलाए जाने वाले या कि ‘‘राष्ट्र के रहनुमा’’ संबोधन पसंद करने वाले एक दूसरे की टांगें खींच कर येन केन प्रकारेण तख्तोताज  ( कुर्सी ) हासिल करने के प्रयासों को अमलीजामा पहनाने में जुटे हैं।
खौफ पैदा करने वाले ऐसे मंजर को देख -समझ कर मेरे जैसा आम आदमी खुद को आजादी की बेड़ी में जकड़ा हुआ मससूस कर रहा है।
दूसरी ओर संक्रमण काल के ये पल कह रहे हैं, भेद-भाव, जाति-पांति, साम्प्रदायिकवाद, आतंकवाद का खात्मा करना हम सभी का फर्ज है, दायित्व, कर्तव्य है। साथ ही साथ वक्त यह भी कह रहा है, शिक्ष एवं रोजगार के अधिकार सहित रोटी कपड़ा और मकान की बुनियादी आवश्यकताओं को पूरा करना राज और समाज का काम है।
आजादी के मूल्यों सहित हमें और राज एवं समाज को इन मुद्दों पर विचार-मंथन करना ही चाहिए।
इस फानी दुनिया में  ‘‘वन्स अपॉन ए टाइम’ (’किसी समय ) बेगम – बादशाह भी गुलाम रह चुके हैं। और राज बेगम – बादशाह का रहा हो या राजा – रानी का, प्रजा ( रिआया, जनता ) तो गुलाम ही समझी जाती रही है। रिआया को गुलाम समझने वाले बेगम बादशाह भी अपने राज के मालिक और गुलाम ! जी हां श्रीमानजी, ऐसे किस्से आपने भी पढ़े होंगे। सुने होंगे। सिनेमाघरों में भी ऐसी फिल्में बहुतायत में प्रदर्शित हुई जिनकी कहानी राजा – रानी के ईर्दगिर्द घूमती रही। वजीर ( मंत्री, महामंत्री ) सेनापति या अन्य राज्य के सेनापति साजिश कर राजा – रानी को कैद में कर लेते थे। कमोबेश ऐसे ही हालात विदेशी हमलावरों ने भी पैदा किए। छल कपट और साजिश कर सिंधु और भारत के अन्य प्रांतों में अपने कदम जमाते रहे। गुलामी की जंज़ीर कसकर जकड़ते रहे और जनता को दास बनाकर सताया। बीते हजारों वर्ष का इतिहास इस बात की ओर संकेत कर रहा है। गुलाम बेगम बादशाह की प्रजा बि गुलामी की मानसिकता में रही। लेकिन जिस तरीके से गुलाम बेगम बादशाह के राजकुमार, राजकुमारी या राज परिवार के किसी सदस्य ने गुलामी की जंजीरों को काटकर अपने राज्य को आजाद कराया उससे भी बेहतर तरीके से स्वतंत्रता सेनानियों ने हमारे भारत को आजादी की सुबह का सूरज दिखाया।
ये भी सच है कि समस्त भारत समेत सिंधु और सिंधुवासियों के लिए वह समय नाजुक था। उस नाजुक समय ने आखिरकार हमारे हिस्से की जमीन छीन ली। आधी रात को दरबदर होकर हमारे बुजुर्ग गुलामी की जंज़ीरों को कटवाकर आजादी की बेड़ी में आ बैठे। अब यह हमें तय करना है कि हम आजादी की बेड़ी में बैठ कर विकास की नदी, तालाब और सागर पार करें या … इस बेड़ी को अपने चहुंओर बांधा हुआ अनुभव करते रहें। उठो जागो तो अपनी इस सिंधु ( भारत ) का नवनिर्माण करें। – मोहन थानवी

ईद है मेरी रहमत है तेरी खुश है जमाना आज ईद है मेरी


ईद है मेरी
रहमत है तेरी
खुश है जमाना 

आज ईद है मेरी


दिल है दीवाना आज ईद है मेरी
रामनगर में जलसा आज ईद है मेरी
रघुनाथ के घर दावत आज ईद है मेरी

रहमत है तेरी खुश है जमाना आज ईद है मेरी

की हैं दुआएं ईदगाह में सबका भलाकर मालिक
गरीब को अमीरी दे अमीर को रख सदा पाक
सुल्तान और राजा की दोस्ती रख कयामत तक
सुन सबकी परवरदिगार खुश रख सबको मालिक

रहमत है तेरी खुश है जमाना आज ईद है मेरी

बच्चों की ईदी भरी झोली में है तालीम का माल
रखेगा रहमान भी हुजूर अब्बा का ख्याल
सलमान न हटायेगा कभी अल्लाह तेरा ख्याल
मुसलमान का फर्ज करेंगे अदा न रहेगा मलाल

रहमत है तेरी खुश है जमाना आज ईद है मेरी
दिल है दीवाना आज ईद है मेरी
रामनगर में जलसा आज ईद है मेरी
रघुनाथ के घर दावत आज ईद है मेरी
रहमत है तेरी खुश है जमाना आज ईद है मेरी

Thursday, August 16, 2012

बादळ सागै उड़'र बिजली सागै नाचणो / बादल संग उड़कर दामिनी संग नृत्य करना

होंठ माथै पड़ी बिरखा री बूंद भीतर उतार लेवां / बादळ सागै उड़'र बिजली सागै नाचणो / पंछियाँ स्यूं पंख उधारी ले'र हवावाँ रौ कर्जो चुकाणो / कागद री नांव नै रोही में बैवती नद्यां री लहरां भरोसे तिराणो / धोरां बिचालै ** रेशम - सी लाल डोकरी ** जोवा अ'र हथेलियाँ मायं साम्भ'र स्कूल रै साथीडा माथै *रौब* मारणो / कितरौ चोखो  लागै / बाळपणे नै फेरूँ  जी लेवणो ! ___
--- HINDI ___होंठों पर टपकी* बरसात की बूंदों को अपने में समेट लेना / बादल संग उड़कर दामिनी संग नृत्य करना / पंछियों के पंख उधर मांग कर हवाओं का ऋण चुकाना / कागज़ की नाव को सड़क किनारे  उफनती सरिता की लहरों पर छोड़ना / धोरों के बीच *रेशम - सी लाल डोकरी* खोजना और हथेली में सहेज कर स्कूल में *धाक* जमाना.../ कितना अच्छा लगता है / फिर से बचपन पा जाना... 

Sunday, August 12, 2012

खामोशी गाती : कविता खामोशी गाती हर रोज रूप बदल कर आता कोलाहल कहता कुछ नहीँ खुद किसी से पर हर किसी से बस अपने बारे मेँ कहलाता ... ध्वनि से श्रव्य और दृश्य से अनुभूत काव्य श्रृँगार का प्रादुर्भाव निश्चय ही किसी काल मेँ 21 मार्च को ही हुआ होगा यह दिवस प्रकृति का प्रिय जो है हरी चुनरी से सजी इठलाती धरा पर नवपल्लव, अधखिली कलियाँ, कुलाँचे भरते मृग-शावक, मँडराते भँवरे, पहाड़ोँ पर बर्फ का पिघलना और धूप की बजाय छाँव मेँ सुस्ताते वन्यजीवोँ के गुँजन से जो अनुभूति हुई उसे आदि कवि खामोशी का गीत = "कविता" की सँज्ञा न देता तो "अहसास" प्राण विहीन हो पाषाण युग से आगे का यात्री नहीँ बन पाता सँवेदनाएँ पाषाण रह जाती प्रकृति कविता न गाती तो मानवता कैसे मुस्काती !


कुछ बहुत कुछ ... बहुत कुछ न कुछ !

कुछ बहुत कुछ कहते हैं... बहुत कुछ कुछ नहीं कहते...!!!...कुछ लोग कुछ विशेष कार्य न करके भी कुछ न कुछ खासियत जोड़ कर कुछ न कुछ अपने ही बारे में बहुत लोगो को  कुछ बताते रहते हैं !!!.. जबकि ... बहुत लोग बहुत कुछ उल्लेखनीय कार्य करने के बाद भी कुछ लोगो को भी कुछ नहीं बताते...!!! कुछ बहुत कुछ में से निकालने के लिए कुछ बहुत कुछ कुछ कार्य करते हैं...कुछ बहुत कुछ कार्य होते हुवे भी कुछ नहीं करते...

Friday, August 10, 2012

बेड़ियां टूटी या प्रतीक बनाए कृष्ण तेरी लीला में रहस्य समाए

बेड़ियां टूटी या प्रतीक बनाए
कृष्ण तेरी लीला में रहस्य समाए

इतिहास है या दंतकथा
हे कृष्ण तू ही बता
बेड़ियां टूटी या प्रतीक बनाए
कृष्ण तेरी लीला में रहस्य समाए
द्रोपदी के चीर को दिया विस्तार तूने
भ्रांति है या द्वन्द्व पैदा किया कवि ने
युद्ध और कर्म क्षेत्र को गीतों में ढालने वाले
ज्ञानामृत के सागर मीरां के लिए प्रेम के प्याले
पुराणों से मरीचिका बनती बिगड़ती
कथाओं से दुनिया इतिहास की बातें सुनती
कालिहदेह यमुना के तल में था कभी सुना है
तुमने सागर में कहीं उसका स्थान तय किया है
क्या वही है बरमूडा का रहस्य जो लील जाता है जहाज
अरे चैन से बंसरी बजाने वाले आ तेरी जरूरत है फिर आज
कितने ही कंस इतिहास से निकल आए हैं
आतंकवाद का संहार करने इतिहास ने तेरे ही गुण गाए हैं
इतिहास है या दंतकथा
हे कृष्ण तू ही बता


मधुरिमा
जीवन मधुरिम
मृत्यु मधुरिम
मधुरिम संसार
प्रेम मधुरिम
ममता मधुरिम
मधुरिम संसार
तू मधुरिम
मैं मधुरिम
मधुरिम संसार
अपनत्व मधुरिम
घनत्व मधुरिम
मधुरिम संसार
संगठन मधुरिम
एकता मधुरिम
मधुरिम संसार
विद्या मधुरिम
ज्ञान मधुरिम
मधुरिम संसार
लय मधुरिम
विलय मधुरिम
मधुरिम संसार

Wednesday, August 8, 2012

खामोशी गाती... कविता

फिर से बचपन पा जाना...

होंठों पर टपकी बरसात की बूंदों को अपने में समेट  लेना /
बादल संग उड़कर
दामिनी संग नृत्य करना /
पंछियों के पंख उधर मांग कर हवाओं का ऋण चुकाना /
कागज़ की नाव को सड़क किनारे/
उफनती सरिता की लहरों पर छोड़ना /
धोरों के बीच
रेशम - सी लाल डोकरी खोजना
और
हथेली में सहेज कर
स्कूल में *धाक* जमाना.../
कितना अच्छा लगता है /
फिर से बचपन पा जाना...

क्रिकेट डे --- मैच रोमांचक क्षणों में था...

ये भी खूब रही ---

क्रिकेट डे --- मैच रोमांचक क्षणों में पहुँच चुका था ! जीत के लिए २ रन की

दरकार और आखिरी बॉल ... ! बॉलर दौड़ रहा था.... टीवी के आगे जुटे परिवार में
चुप्पी छाई थी ! यहाँ तक की चार साल की बेबी ने भी दूध के लिए रोना बंद कर टीवी
स्क्रीन पर नज़रें गड़ा रक्खी थी ! बॉलर ने बॉल फेंकी ... उत्तेजना बढ़ गई ...
बेटमैन ने बल्ला घुमाया... शोर उठा... फिर शोर उठा .... टीवी स्क्रीन पर जूम कर
सीन में साफ़ दिखाया गया .......बॉल बेट के बीच में लगी... और .... लाइट चली
गई....

Tuesday, August 7, 2012

राग दरबारी गूंजता रहा है... गूंजता रहेगा


राग दरबारी गूंजता रहा है... गूंजता रहेगा

 इस गूंज में सुनाई देते स्वरों को श्रोताओं पाठकों तक पहुंचाने का जिम्मा संजय का है। 

( काला सूरज उपन्यास से )

जिसे कपिल अपने विरुद्ध राजनीति समझ रहा था, वह तो अखबार के काम में उसके प्रति संपादकजी का विश्वास निकला। कपिल ने सोचा - संपादकजी ने प्रयोग भी करना चाहा तो मुझ पर। प्रश्न भी पूछ लिया तो क्लू साथ दे दिया। अब वह मुस्कुरा रहा था। संपादकजी ने उसकी मुस्कुराहट के उत्तर में अपने होंठों को फैलाया।
बेआवाज हंसी ने उन दोनों को प्रफुल्लित कर दिया। कपिल के अपनी कुर्सी से उठने की क्रिया को नजरअंदाज करते उन्होंने कहा - बच्चू तुम्हें पढ़ा हुआ याद होगा कि  संविधान सभा में भाषण देते हुए डॉ आम्बेडकर ने कहा था कि राजनीति के क्षेत्र में समानता को अपनाने के बावजूद अगर सामाजिक-आर्थिक संरचना में भी समानता को सुनिश्चित नहीं किया जा सका तो हम विरोधाभासी जीवन जीने की बाध्यता में फंसे रहेंगे। राजनीतिक जनतंत्र तब तक टिकाऊ नहीं हो सकता जब तक उसकी आधारशिला के रूप में सामाजिक जनतंत्र न हो। आम्बेडकर सामाजिक जनतंत्र को
स्वाधीनता, समानता और भ्रातष्त्व को जीवन-सिद्धांत के रूप में मान्यता देने वाला मानते थे।
संपादकजी आज मूड में थे और कपिल को अपनी प्रसन्नता में शामिल करने के लिए उसे अपने विचारों से अवगत करा रहे थे। बोले - चाहे हम किसी भी क्षेत्र में काम करने वाले हों, कुछ सिद्धांत अपने होते हैं तो कुछ सिद्धांत उस संस्थान के भी होते हैं जिनमें हम काम करते हैं। देश के प्रति भी हमारा कर्तव्य होता है। समाज के प्रति हमारी जिम्मेवारियां होती हैं। तुम और मैं पत्रकार हैं। हमारे लिए समय की महत्ता सर्वाेपरि है। आज और अभी के समाचार के फर्क को हम बेहतर समझते हैं। हमें ही नहीं सभी को मालूम है कि समाज को कृष्ण की जरूरत सदा रही है।
कपिल की प्रसन्नता काफूर हो गई। अच्छी-भली बातचीत में ये कृष्ण महाराज फिर कहां से आ गए भाई। लेकिन वह संपादकजी को क्या कह सकता था।
वे अपनी धुन में ही बोले जा रहे थे - सिद्धांतों को अपनाते हुए समय की चाल पर भी थिरकना पड़ता है। गीता का मर्म जानने वाले यह भी जानते हैं कि हर युग को श्रीकृष्ण की जरूरत रही है। आंखों देखा हाल बताने वाले संजय की महत्ता कभी खत्म नहीं होगी। टीवी चैनल हो या रेडियो-ट्रांजिस्टर या समाचार पत्र। इनमें यथार्थ देखने वाले पाठक भले ही श्रीकृष्ण की कंठ-ध्वनि नहीं सुन पाते हों लेकिन आकाशवाणी और अक्षरवाणी जरूर सुनते, देखते और पढ़ते हैं। संजय पत्रकारों और दूसरे लोगों के लिए भले ही महत्त्व नहीं रखता हो लेकिन श्रीकृष्ण को संजय उतना ही प्रिय रहेगा जितना कि किसी को भी अपना हाथ-पैर और आंख या दिल-दिमाग। क्योंकि श्रीकृष्ण को मालूम है कि संजय ही ने किसी एक के माध्यम से सम्पूर्ण जगत को महाभारत का आंखों देखा हाल बताकर जनता-जनार्दन को युगों-युगों के लिए ‘कौरवों’ की चालों से वाकिफ कराया। कर्मयोग की महत्ता तभी तो होगी जब कोई उसे समझेगा। जानेगा। जीवन में उतारेगा। गीता के ज्ञान को अर्जुन तक सीमित नहीं रहने दिया जाएगा तभी तो समाज में अनेक अर्जुन सामने आएंगे। बच्चू,  भूतकाल कैसा भी बीता हो भविष्य को सुनहरा बनाने की चिंता सभी को होनी लाजिमी है।
वर्तमान में काम करते हुए फल की इच्छा त्यागने का संदेश देने वाले श्रीकृष्ण के विचारोें से लोगों को अवगत कराने के लिए भी किसी की जरूरत सदैव रहेगी। वह चाहे संजय हो, साहित्यकार, प्रवचनकर्ता, महंत, शिक्षाविद् या कि किसी मीडिया ग्रुप से जुड़ा पत्रकार हो। जनता को बताने वाला भी चाहिए कि वर्तमान को कृष्ण चाहिए। अर्जुन सदैव कृष्ण के साथ रहा है। वर्तमान में भी है। महाभारत भले ही दुबारा नहीं हो लेकिन कौरव और पांडव अपने-अपने राज्य की यानी कि सत्ता की प्राप्ति के लिए प्रयत्नशील रहे हैं तथा रहेंगे। इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता। परिप्रेक्ष्य बदलते हैं। दृश्य बदलते हैं। पात्र बदलते हैं। कहानी वही रहती है। राजा-रानी की जगह राष्ट्रपति-प्रधानमंत्री हो गए। रियाया वही है। मंत्री-संतरी वैसे ही हैं। राज की योजनाएं वैसी ही जनउपयोगी हैं। उनकी क्रियान्विती वैसी ही है। जैसी राजा-महाराजाओं ने सीमित संसाधनों से कराई। तब भी बिचौलिए थे। अब भी भ्रष्टाचारी हैं। बीरबल भी हैं और अकबर भी हैं। बीरबल से जलने वाले दरबारी भी हैं।
राग दरबारी सदैव गूंजता रहा है। गूंजता रहेगा। इस गूंज में सुनाई देते स्वरों को श्रोताओं, पाठकों तक पहुंचाने का जिम्मा संजय का है। मीडिया का है। महाभारत का संजय स्वयं प्रसिद्धि पा सका या नहीं, इसका उदाहरण है उसका नाम। सही हाल बताने पर उसे ऐसी प्रसिद्धि मिली की वह आज भी श्रीकृष्ण की लीला के साथ स्मरण में रहता है। संजय ने यह परवाह नहीं कि महाभारत कैसे रुक सकता है या महाभारत होगा या नहीं, होगा तो परिणाम क्या रहेगा, कौन जीतेगा-कौन हारेगा। उसने जो देखा, महसूस किया, उसे बता दिया। छुपाया नहीं। उसने अपना काम किया। बस।

Friday, August 3, 2012

करतार सिंह / सिन्ध ही नहीं पूरे हिन्दुस्तान के बाल-गोपालों के बचपन के दिन अभी खत्म भी नहीं हुए थे कि उन पर जिन्दगी की जिम्मेवारियों का पहाड़ लाद दिया गया

करतार सिंह / सिंधी से अनूदित उपन्यास का अंश
करतार सिंह : हां यह सच है यार। मेरे जन्म से भी 10-12 साल पहले जन्मा षहीद हेमू कालाणी सन् 1942 में आजादी के लिए हंसते-हंसते फांसी के फंदे पर झूल गया था। उन्हीं की देषभक्ति की बातें सुन-सुन कर ही तो मेरे और तुम्हारे मन में अंगरेजों के विरुद्ध विचारधारा पुख्ता हुई थी।
रोहित: अच्छा दोस्त, अपन बीस साल पहले भी दिल्ली में मिले थे लेकिन तूने यह नहीं बताया था कि तुम्हारा नाम कैसे बदल गया। यार यह तो बता ही डालो मुझे। मेरे मन में यह बात जानने की बहुत उत्कंठा है।
करतार सिंह: छोड़ो यार इस बात को...
रोहित: नहीं यार ऐसे मत कर, बताओ तो सही, देखो जब तक यह बात तुम्हारे मन में दबी रहेगी तब तक तुम भी मन में दुखी होते रहोगे।
करतार सिंह: हां सच कहते हो यार तुम। सुनो, मैं अपना नाम किस तरह गुमा बैठा। कैसे मेरी जिन्दगी को बचाने के लिए एक मुसलमान ने मुझे सलाह दी कि मैं गुरुद्वारे में जाउं और वहां लाहौर के अच्छे माहौल में हिन्दुस्तान-पाकिस्तान के तूफानी दौर में भी सुरक्षित रहूं।
रोहित: यार तुम तो ऐसी बात कर रहे हो जिसमें हिन्दू-मुस्लिम, दोनों का प्रेम जाहिर होता है। भले ही इसके एक पहलू को देखने पर खूनखराबा भी नजर आता है लेकिन असल में तो आपसी प्रेम, भाईचारा अैर सौहार्द अधिक दिखाई देने लगा है मुझे। यार यह बात तो विस्तार से ही बता दे।
करतार सिंह: हां, दोनों तरफ के लोगों की प्रेमगाथा कह सकते हो मेरे नए नामकरण को।
करतार सिंह रोहित को अपनी जिन्दगी के वह पन्ने बताने लगा जिनमें उसका नाम बदल गया था। उसने रोहित को बताया कि वह लारकाणे की जेल से निकल कर सक्खर पहुंचा तो वहां के हालात देख उसका मन कांप गया। वह घबरा गया।
करतार सिंह मानो रोहित को अपने नाम बदलने की बात बताते-बताते लाहौर जा पहुंचा।
विचारों की आंधी चल रही थी। करतार ंिसंह सोच रहा था कि उसके हरिप्रसाद नाम वाले करतार सिंह का समय अब पूरा होने को है। बुढ़ापा आ चुका है। ष्यामला भी पांच साल पहले मुझे इस बेदर्दी दुनिया में छोड़ गई। ष्यामला और दोस्तों के साथ रोहिड़ी-सक्खर व लारकाणे में बिताए वे दिन अब लौट सकते हैं क्या? उस समय सिन्ध ही नहीं पूरे हिन्दुस्तान के बाल-गोपालों के बचपन के दिन अभी खत्म भी नहीं हुए थे कि उन पर जिन्दगी की जिम्मेवारियों का पहाड़ लाद दिया गया। आजादी की जंग में किषोरवय 14 साल के हरिप्रसाद यानी करतार सिंह को अंगरेजों ने जेल में डाल दिया। करांची की जेल में उसे देष के आजाद होने तक रहना पड़ा। इसके बाद समूचे भारत में रोजगार की तलाष में मारे-मारे घूमते नौजवान ही नहीं लगभग हर उम्र के लोगों के झुण्ड अपने भविश्य के प्रति आषंकित हो उठे थे। जात-पांत की दीवारें खड़ी हो रही थी। हिन्दू-मुसलमान के नाम पर आदमी-आदमी को मार रहा था, जला रहा था। सारे देष में हड़ताल, लाठीचार्च, जेल... बंगाल के जादू की हवा चल रही थी। मन में एक-दूसरे के प्रति नफरत का मुलम्मा चढ़ा दिया गया था। ऐसे माहौल में करांची की जेल से बाहर आकर वह लारकाणे पहुंचा तो सबसे पहले ष्यामला के घर गया। वहां पता चला कि ष्यामला का परिवार भारत चला गया है। हरिप्रसाद वहां से रोहिड़ी-सक्खर आया तो उसके पड़ोसी मुसलमानों की सूरत और सीरत बदली हुई थी। उसके बड़े भाई, माता-पिता, छोटे भाई और बहिन का कोई अता-पता नहीं था। जान-पहचान वाले लोग भी हरिप्रसाद से मिले लेकिन वे भी उसे उसके परिवार के सदस्यों की कोई जानकारी नहीं दे सके।

नींद में जागा-जागा- सा...

चांद मुस्कराता रहा...
आधी रात को 
जैसे ही रंगों से घिरे
मुस्कराते चांद को देखा,
कलर रिंग से घिरे चांद को...
देखने के मुबारक मौके पर
इस नजारे से पुलकित 
बार बार
कुछ सवाल भी मन में उठते रहे।
चांद मुस्कराता रहा...
क्या चांद के गिर्द
घिरा यह रंगीन घेरा
खुषहाली का संदेष देता है!
क्या यह पर्यावरण प्रदूषण से कुपित
आकाष की चेतावनी भरा संदेष है!
क्या पृथ्वी और चांद पर
किसी और रंगीन दुनिया की नजर है!
ऐसे कितने ही सवालों के जवाब
ढूंढ़ते हुए रात बीत गई
और
मुस्कराता रहा
कलररिंग में घिरा
खूबसूरत चांद।
ज्योतिष के नजरिये से
क्या यह किसी संकट के
टल जाने का संकेत था
जो अंतरिक्ष के राजा
चांद की दुनिया के माध्यम से
पृथ्वीवासियों को बता रहे थे!
सितारों की दुनिया
यानी
ज्योतिष के जानकार
इस बारे में क्या सोचते हैं!
ग्रह-नक्षत्र इस बारे में क्या संकेत देते हैं!
षुक्रवार का दिन
मार्गषीर्षषुक्ल पक्ष की दषमी,
वि सं 2006,षाके 1931,
तदनुसार 27 नवंबर 2009
मगर
अंग्रेजी तारीख के
बदलने के समय के अनुसार
रात 12 बजे बाद
28 नवंबर हो गया।
एकादषी तिथि प्रारंभ हो चुकी थी सायंकाल 7.01 से।
अंत रात्रि तक था उत्तरा भाद्रपद धु्रव
व ऊर्ध्वमुख संज्ञक नक्षत्र,
तनन्तर रेवती मृदु नक्षत्र रहा।
सायं 7.01 तक गर, तदन्तर
वणिज नामकरण तथा
चंद्रमा सम्पूर्ण दिवारात्रि
मीन राषि में रहा।
इसके अलावा
सूर्योदय से अंत रात्रि 4.50 तक
रवियोग नामक कुयोगों की
अषुभताओं का नाषकषक्तिषालीषुभ योग

इसके बाद अमृत-सर्वार्थसिद्धि
नामक षुभ योग रहा।
इन सब के बीच
आषंकाएं भी पनपती हैं कि
मानसून के दिनों में
चांद के ईर्दगिर्द वलय बनने से
होती है
भारी बारिष!
तो क्या मार्गषीर्ष की एकादषी की
प्रारंभिक रात्रि में
चंद्रदेव के चारों ओर बने
रंगीन घेरे से
यह संकेत भी मिलता है कि
बेमौसम बारिष हो सकती है!
क्या सुदूर उत्तरी इलाकों में
बर्फबारी होगी!
क्या मानसून की बेरुखी से
प्यासी रही सम्पूर्ण भारत की भूमि
सर्दियों की बारिष से तर होगी!
इन सब सवालों के जवाब
चांद के चारों ओर बने
रंगीन घरे में हैं।
कौन खगोलषास्त्री इसे पढ़ पाएगा!
कौन ज्योतिषी इसे बांच पाएगा!
चांद मुस्कराता रहा!