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कुछ तुम सोचो, कुछ मैं सोचूं- फिर करें मन्थन- शायद अच्छे दिन आयें
चित्र सोशल मीडिया से साभार
चलो हमने होली भी मना ली। अब आपके सामने देश के सबसे बड़े लोकतंत्र का सवाल है। चुनाव जो सामने हैं। आपका एक एक वोट लोकतंत्र को मज़बूत करेगा अगर उसका इस्तेमाल सही तरीक़े से न किया तो कोई शक नहीं कि लोकतंत्र खोखला हो जाये।
वैसे लिखने या कहने की ज़रूरत नहीं क्योंकि आप७० सालों से अपने वोट का इस्तेमाल करते आ रहे हैं। इन सत्तर सालों में आपको क्या मिला - रुसवाई या बेरुसवाही ?
राज चलाने वाले और अधिक अमीर होते गये और ग़रीब अधिक ग़रीब होते गये। अतः आपको अब सोचने की-मंथन करने की आवश्यकता है। हालाँकि आपने कभी सोचा ही नहीं था कि कश्मीर के आप नागरिक बन जाओगे। अयोध्या का राम मन्दिर पुनः अपने स्वरूप में लौट आएगा। मुस्लिम बहनों ने कभी सोचा भी न था कि उनको तीन तलाक़ अभिशाप से मुक्ति मिलेगी।
हमने कभी यह भी नहीं सोचा था कि भ्रष्ट अधिकारियों - और उच्च पदों पर बैठे राजनीतिकों के ख़िलाप कभी कोई कारवाई होगी ? मुख्य मन्त्री व अन्य मन्त्री भ्रष्टाचार के आरोप में जेल के सींखचों में बन्द होंगे।
यह भी हमारी कल्पना से बाहर रहा कि कभी अमरीका का वीज़ा न देने वाला अमरीकी राष्ट्रपति हमारे देश के प्रधानमन्त्री की अगुवाई में उन्हें लेने एरोड्रम पहुँचेगा। रोज़गार के लिए परीक्षापत्रों में नक़ल करवाने वाले पकड़े जाएँगे। आरपीएस के चयनकर्ता जो आज तक अपने परिजनों को अधिकारी बनाते आये हैं वे जेल में रहेंगे ।
कुछ समय में नक़ली मुखौटा ओढ़े भ्रष्ट अधिकारियों और भ्रष्ट राजनीतिकज्ञों का जो चेहरा सामने आया है। उससे तो राजनीति से घिन् होती हैं। अब तो एक भी शायद ऐसा नेता नहीं नज़र आता जिससे ईमानदारी की ख़ुशबू आती हो।
अटल बिहारी वाजपेयी- गुलजारी लाल नंदा- लाल बहादुर शास्त्री की ईमानदारी इतिहास में सीमिट कर रह गई है। और अब तो राजनीति एक बड़ा उद्योग बन गई हैं। आप किसी भी एमएलए का नाम बता दीजिए जिसका पेट्रोल पम्प न हो- गैस एजेंसी न हो। हज़ारों बीघा ज़मीन- प्लाट- आलीशान मकान न हो।
दिल्ली के मुख्यमंत्री ने दिल्ली में कई करोड़ों का बंगला बनवाया है। कहाँ से आया पैसा? कोई ट्रांसफ़र में- कोई डिज़ायर लिखने में कमा रहा हैं तो कोई सदन में सवाल पूछने में अपनी जेब भर रहा है। राजनीति में आने वाला कमाने के रास्ते ढूँढता है जनता की सेवा करने के लिए नहीं।
अब देखिये पार्टियों ने बड़ी बड़ी दवाई कंपनियों से चुनाव के लिए करोड़ों का चन्दा लिया । दवा की कम्पनियों ने दवाईयों के रेट बढ़ा दिए। सारा भार जनता पर ही पदा। माना कि नेहरू जी- गांधी जी -टाटा- बिरला की गाड़ी का बराबर उपयोग करते थे तो क्या बिरला- टाटा ने उनसे कोई फाइदा नहीं उठाया।क्या यह संभव है ?
ऐसा ही अब हो रहा हैं। इस हाथ दे उस हाथ ले। अब तो यह देखना है कि किस पार्टी का मक़सद देश के विकास से जुड़ा है उसका सोच जनहित का है। या अपना घर भरने का। इस पर मन्थन कर, विश्लेषण कर स्वच्छ, साफ़, और ईमानदार सरकार आपको लानी है।
वक्त ने करवट ली हैं अब ख़रगोश पर भरोसा करना, क्योंकि कछुए सिर्फ़ अब किताबों में ही जीतते हैं। आशा न खोयें- कल वो दिन हो सकता है, जिसका आपको इन्तज़ार है।
— मनोहर चावला




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