चुनावी प्रबंधन में जुटे भाजपा-कांग्रेस के नेता
सिर्फ जातियां और स्थानीय समीकरण ही चुनाव का करेंगे भविष्य तय
राजस्थान विधानसभा चुनाव के लिए मतदान की तिथि जैसे-जैसे नजदीक आती जा रही है, ठीक वैसे ही सिंहासन प्राप्त करने की दौड़ में शामिल भाजपा-कांग्रेस के नेता दिवाली के बाद चुनावी प्रबंध में जुट गए हैं। अब बागी और उनके समर्थकों का भी हो-हल्ला शुरू हो गया है। इस बार भी 199 सीटों के लिए ही चुनाव होंगे। श्री करणपुर से कांग्रेस प्रत्याशी और वर्तमान विधायक गुरुमीत सिंह कुमर के निधन के कारण अब इस सीट पर चुनाव नहीं हो पाएगा। इस बार के चुनाव कुछ अलग अंदाज में है, भाजपा हो या कांग्रेस दोनों ही दलों में इस बार पार्टी के समर्पित कार्यकर्ता शांत हैं। लगता है कार्यकर्ता का अभी तक यही मन है, कि राज्य में किसी की भी सरकार बने उसे तो लोकसभा चुनाव की हार-जीत से मतलब है। कार्यकर्ता के इस उबाऊपन ने दोनों ही मुख्य दलों के नेताओं के सिर पर पसीने ला दिए, खैर अभी भी समय है जो पार्टी अपने कार्यकर्ताओं को बूथ स्तर तक सक्रिय कर लेगी राज्य में सरकार भी उसी की बनेगी।
राजस्थान में चुनाव की स्थिति अब साफ होने लगी है। इससे यह भी स्पष्ट हो गया है कि आगामी 25 नवंबर को होने वाले चुनाव आरपार के चुनाव नहीं हैं, यह बहुत फंसा हुआ चुनाव है और ऊंट किसी भी करवट बैठ सकता है।
भाजपा का पूर्ण बहुमत का दावा जमीन पर प्रभावी नहीं दिख रहा है, जितना दावा 6 माह पहले किया जा रहा था वहीं कांग्रेस की वापसी भी उतनी आसान नहीं लग रही है, जितनी कुछ लाभदायक योजनाओं का फायदा उठा चुके मतदाता अंदाज लगा रहे हैं। सत्ता वापसी के लिए जितनी मेहनत अशोक गहलोत सहित सचिन पायलट कर रहे हैं।
उतनी भाजपा में नजर नहीं आ रही। राजस्थान में बीते वर्षों में हुए चुनाव किसी ना किसी मुद्दे पर केन्द्रित रहे हैं, लेकिन यह चुनाव ऐसा अनोखा चुनाव है, जिसमें कोई भी मुद्दा जनमानस के बीच में नहीं है। यानी इस बार मुद्दा विहीन चुनाव है। ना अशोक गहलोत की मुफ्त योजनाएं मतदाताओं को लुभा रही हैं, ना ही भाजपा का सामूहिक नेतृत्व मतदाताओं को समझ आ रहा है।
तो कुल मिलाकर यह चुनाव मुद्दों और पार्टियों की बजाय अच्छे और सच्चे उम्मीदवारों के चयन का चुनाव है। कोई भी उम्मीदवार सिर्फ पार्टी का समर्थन मिलने मात्र से विजय के निकट पहुंच गया है, यह कहना अब आसान नहीं है।
भारतीय जनता पार्टी ने एक प्रयोग के तहत अपने सात सांसदों योगी बालकनाथ, दीयाकुमारी, राज्यवर्धन राठौड़, नरेन्द्र खींचड़, डॉ. किरोड़ीलाल मीणा, देवजी पटेल और भागीरथ चौधरी को विधानसभा चुनाव में उतारा, लेकिन स्थिति यह है कि एकमात्र दीया कुमारी और नरेन्द्र खींचड़ को छोड़कर बाकी सांसदों को भयंकर विरोध का सामना करना पड़ रहा है और अभी भी स्थिति सहज नहीं हुई है।
इससे स्पष्ट होता है कि भाजपा में टिकट वितरण कार्यकर्ताओं की राय से नहीं बल्कि ऊपरी जुगाड़ से दिए गए हैं।
पहली बार देखने में आया है कि नामांकन से पहले उम्मीदवारों के समर्थन में हजारों लोगों का रैला उनके समर्थन में उमड़ा। ऐसा लगने लगा कि उस विधानसभा क्षेत्र में चुनाव सिर्फ औपचारिकता है, जनता ने अपना विधायक पहले से ही चुन रखा है, लेकिन प्रतिद्वंदी उम्मीदवार ने भी उतना ही जनसमर्थन दिखाकर मुकाबले का रोचक बना दिया है।
इन चुनावों में कोई विकास, हिन्दुत्व या राष्ट्रीय मुद्दों की बात नहीं कर रहा, सिर्फ जातियां और स्थानीय समीकरण ही चुनाव का भविष्य तय करने वाले हैं। वहीं प्रत्याशियों के नामांकन में उमड़ रही भीड़ इन चुनावों को रोमांचक कर रही है। जनसमूहों को देखकर यह कहना कठिन है कि जिस उम्मीदवार के पक्ष में लोग जुट रहे हैं वो उसके मतदाता ही हैं। यदि इस भीड़ को उम्मीदवार की जीत का पैमाना मानें तो ऐसा संदेह आ रहा है कि भाजपा और कांग्रेस दोनों ही राजनीतिक दल 101 का जादुई अंक नहीं छू पाएंगे और सरकार बनाने की चाबी निर्दलियों और छोटी पार्टियों के पास रहेगी।
हालांकि चुनाव से पहले गहलोत यह कहते रहते थे कि जनता में उनके प्रति नाराजगी नहीं है, बल्कि उनके विधायकों के प्रति है। लेकिन वे भी अपने ज्यादातर विधायकों को टिकिट देने के लिए बाध्य हुए। यही हाल भाजपा का रहा, ना जाने कितने ही सर्वे भाजपा ने अलग-अलग स्तर पर कराए, लेकिन जिनको उम्मीदवार बनाया उनके बारे में चर्चा तक नहीं थी, सर्वे में नाम आने की बात तो बहुत दूर रह जाती है।
उमेन्द्र दाचीच
@ बिजनेस रेमेडीज






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