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धर्मसभा में आचार्य श्री नानालाल जी म.सा. का किया पुण्य स्मरण
जो जीवन सजाते हैं वह सर्वोत्कृष्ट मानव - आचार्य विजयराज जी म.सा.
जीवन के दिन चार, इन्हें बेकार ना खोना- विजयराज जी म.सा.
बीकानेर। इस संसार में तीन तरह के मानव होते हैं। पहले प्रकार के वे जो जीवन को चलाते हैं। दूसरे प्रकार के जीवन बनाने वाले होते हैं और तीसरे प्रकार के जीवन को सजाने वाले होते हैं। जो जीवन को चलाते हैं, वह सामान्य मानव होते हैं। उनकी कोई विशेषता नहीं होती, क्योंकि वह केवल जीवन को चलाने में विश्वास रखते हैं, उनका उद्देश्य जीवन को बनाना या सजाना नहीं होता है। विशिष्ट मानव होते हैं, वह जीवन बनाते हैं। जैसे- डॉक्टर, वकील, इंजिनियर, सांइटिस्ट आदि होते हैं, ये अपने जीवन को कुछ बनाते हैं, ऐसे समाज के लिए आदर्श होते हैं लेकिन यह कोई बड़ा लक्ष्य नहीं होता है। लेकिन जो जीवन सजाते हैं वह सर्वोत्कृष्ट मानव होते हैं। बंधुओ, हमें अपना जीवन सजाना है और जीवन सम्यक ज्ञान, सम्यक क्रिया से सजता है। यह भावोद्गार श्री शान्त- क्रान्ति जैन श्रावक संघ के 1008 आचार्य श्री विजयराज जी म.सा. ने बुधवार को सेठ धनराज ढ़ढ्ढा की कोटड़ी में अपने नित्य प्रवचन के दौरान व्यक्त किए। आचार्य श्री विजयराज जी म.सा. ने फरमाया कि श्राविकाऐं अपने शरीर को सुंदर आभूषणों से, वस्त्रों से सजाती है, श्रावक भाई भी अपनेआप को सजाते हैं। लेकिन जो जीवन को सजाता है, वह मानव नहीं महामानव कहलाते हैं। ऐसे महापुरुषों को याद नहीं करना पड़ता। उनका व्यक्तित्व, कृतित्व हमारी स्मृति पटल में हमेशा के लिए अंकित हो जाती है। ऐसे ही महापुरुषों में एक थे आचार्य श्री नानेश जी, जिनको याद नहीं करना पड़ता, उनकी स्मृति सदैव चाहे जो समय हो, काल हो, परिस्थिति हो बनी रहती है। आचार्य श्री ने कहा कि आचार्य श्री नानालाल जी म.सा. अलौकिक महापुरुष थे। जिनका संपूर्ण जीवन दर्शन, ममता, समता और क्षमता से औत-प्रौत था। वे हमारी स्मृति में बने रहते हैं और जब तक शरीर में प्राण है, सदैव बने ही रहेंगे।
आचार्य श्री विजयराज जी म.सा. ने उनके जीवन वृत पर प्रकाश डालते हुए बताया कि आचार्य नानेश पंचम आरे के परांगत थे, उन्हें जितना श्रुतज्ञान चाहिए था, वह पर्याप्त था। उन्होंने अपने जीवन को सम्यक ज्ञान और दर्शन से सजाया, मैं आपसे कहना चाहता हूं कि आप भी अपने जीवन को सजाओ।
आचार्य श्री ने इस संबंध में एक प्रसंग गुजरात का सुनाया। जहां वे स्वयं उनकी सेवा में उपस्थित थे। जहां निमड़ी सम्प्रदाय के संत आए हुए थे और एक ही स्थान पर ठहरे थे। जिन्होंने प्रवचन के बाद आचार्य श्री से साक्षात्कार किया और एक जटिल प्रश्न जो उतराध्ययन सूत्र से था से संबंधित प्रश्न का समाधान चाहा। गुरुदेव ने स्वाध्याय कर जब उसका समाधान दिया तो निमड़ी सम्प्रदाय के संत आश्चर्यचकित हो गए और कहा कि जिस प्रश्न का हल मैं बरसों से नहीं समझ पाया, कई साधु-संत जिसका समाधान नहीं कर पाए आपने उसे इतनी आसानी से समाधान दे दिया। महाराज साहब ने कहा कि मैं यह बताना चाहता हूं कि नानेश जी ने ज्ञान, दर्शन, चरित्र, तप, साधना, अराधना से जीवन को सजाया था। नानालाल जी म.सा. ने इन्द्रियों को वश में किया था, जो इन्द्रियों को वश में रखता है, वह कल्प की इच्छा रखता है। महाराज साहब ने श्रावक-श्राविकाओं से कहा कि मैं यह कहना चाहता हूं कि आप भी जीवन को चलाने वाले नहीे, सजाने वाले बनो। याद रखो, ऐसा कोई जीवन नहीं जिसमें कोई फेर नहीं आया, जीवन में फेर आते रहते हैं, लेकिन इसमें बढ़ते वहीं है जो किसी की परवाह ना करते हुए चलते रहते हैं। महाराज साहब ने भजन ‘जिंदगी के रास्ते में बड़े- बड़े फेर हैं, बढ़ते यहां जो बड़े दिल के दिलेर हैं। है जीवन के दिन चार, इन्हें बेकार ना खोना है, चलने को तैयार हमें, धर्म पथ पर खोना है।’ सुनाकर भजन के भाव व्यक्त किए और साथ ही बताया कि यह भजन हरियाणा के भगवन श्री रामप्रसाद जी म.सा. ने लिखा था और मेरे पसंदीदा भजनों में से एक है, जिन्हें अक्सर सभा में गाया करता हूं। आचार्य श्री ने नानालालजी म.सा. के बाल्यवस्था से लेकर दीक्षा ग्रहण करने और साधु जीवन के अनेक प्रसंग श्रावक-श्राविकाओं को सुनाकर उनका पुण्य स्मरण किया और उन्हें नमन करते हुए उनका पुण्य स्मरण किया और प्रवचन को विराम दिया।
बालिकाओं ने दी प्रस्तुती, श्रावकों ने भाव व्यक्त किए
श्री शान्त क्रान्ति जैन श्रावक संघ के अध्यक्ष विजयकुमार लोढ़ा ने बताया कि मंगलवार को छत्तीसगढ़ से बड़ी संख्या में बीकानेर पहुंचे श्रावक-श्राविकाओं का संघ की ओर से स्वागत किया गया। आचार्य श्री से उन्होंने धर्म-ज्ञान पर चर्चा की, आशीर्वाद लिया और उनके श्रीमुख से मंगलिक सुनी, प्रवचन का लाभ लिया। बच्चों ने विजय गुरुवर भजन की प्रस्तुती दी। उपवास, एकासन, आयम्बिल, तप, अराधना करने वालों ने आचार्य श्री से आशीर्वाद लिया।








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