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सिंधी कोयल भगवंती नावाणी, विमल रॉय की फिल्म सहित कई फिल्मों में महेंद्र कपूर संग डुएट गाने वाली सिंधी कोयल को नमन...!
जन्म दिन (1 फरवरी) पर विशेष
साभार सनमुखानी नंद कुमार की फेसबुक वाल से
भारत के विभाजन से कुछ ही वर्ष पूर्व 1 फरवरी, 1940 के दिन कराची, सिंध के नावाणी परिवार में भगवंती नामक जिस बालिका का जन्म हुआ, आगे चलकर वह -सिंधियों की कोयल “ के नाम से जानी जाएगी और भारत भर में बिखरे सिंधियों की सांस्कृतिक दूत के रूप में उभरकर सम्पूर्ण जाति के को एक सूत्र में पिरोने का महत्वपूर्ण कार्य अंजाम देगी, यह शायद कोई नहीं जानता था ।
ज़िन्दगी के हर रंग को अपनी आवाज़ के ज़रिये उभारने वाली इस कोयल की संगीत से पहली पहचान अपने ही घर में हुई । जब वह छोटी ही थी तब उसकी दादी भजन और लोकगीत गाया करती थी । संगीत की आकर्ष्रण शक्ति ने बालिका भगवंती को भी अपनी ओर आकर्षित किया और वह भी अपनी दादी के साथ मिलकर गाने लगी ।
भगवंती ने संगीत की विधिवत शिक्षा पहले देवधर म्यूज़िक स्कूल और निखिल घोष के अरूण संगीत विद्यालय में प्राप्त की | उसके बाद व्यवहारिक शिक्षा इंडियन पीपुल्स थियेटर एसोसिएशन में कनु घोष और कनु राव के मार्गदर्शन में प्राप्त की ।
बंगाली संगीतकारो के अधिक संसर्ग में रहने के कारण भगवंती का ध्यान रवीन्द्र संगीत की तरफ भी गया ।
फलस्वरूप उसने चित्रा बरूआ और हेमंत कुमार के मार्गदर्शन में रवीन्द्र संगीत की शिक्षा भी प्राप्त की ।
उसने सिंधी नाटकों में अदाकारी भी की । प्रसिद्ध सिंधी नाटककार तथा निर्देशक गोबिन्द माल्ही के निर्देशन में “गुस्ताख़ी माफ ", “मेहमान “, “तुहिंजो सो मुहिंजो “, “देश जी ललकार “, और “इन में को शकु अथव “ आदि नाटकों में तो काम किया ही, इसी निर्देशक की मशहूर सिंधी फिल्म “सिंधूअ जे किनारे” में नायिका की भूमिका भी बखूबी निभाई ।
विभाजन के समय सिंध छूटने के बाद सिंधी हिन्दू भारत के कोने कोने में फैल गये। नये परिवेश से सामंजस्य स्थापित करने के लिये उन्होंने नि:संकोच स्थानीय भाषाओं को अपना लिया ।
इस दौरान उनका ध्यान अपनी मातृभाषा सिंधी से हट गया। अधिकांश सिंधी भाषियों को अपने बच्चों को स्थानीय भाषा अथवा अंग्रेजी के माध्यम से शिक्षा दिलवाने के लिये बाध्य होना पड़ा | इस तरह नई पीढ़ी के सिंधी भाषा, संस्कृति व साहित्य से दिनों दिन दूर होते जाने का ख़तरा पैदा हो गया । भगवंती व उसके संगीत दल के साथियों ने प्रसिद्ध साहित्यकार श्री गोबिन्द माल्ही के साथ मिलकर इस सांस्कृतिक संकट से निपटने के लिये अथक प्रयत्न किये तथा अपने गीत संगीत के माध्यम से न केवल भारत के कोने कोने में बिखरे सिंधी भाषियों में अपनी भाषा व संस्कृति के प्रति एक नई चेतना का संचार करने में सफल रहे बल्कि दुनिया के अन्य मुल्कों में जा बसे सिंधियों के बीच पहुंचकर भी वही काम अंजाम दिया | इस प्रकार भगवंती नावाणी व साथियों ने सम्पूर्ण सिंधी जाति की ऐसी सेवा की जो अब तक शायद ही कोई अन्य सिंधी भाषी कर पाया होगा । भगवंती ने सिंधी समाज के छोटे से छोटे आदमी से लेकर बडे से बड़े आदमी के साथ अपनी आवाज़ के माध्यम से जो निकटता हासिल की, वह अभूतपूर्व है ।
भारत के विभिन्न स्थानों तथा विश्व के कई मुल्कों की अपने कार्यक्रमों के सिलसिले में लगातार यात्राएं करते रहने के कारण धीरे धीरे उनका स्वास्थ्य बिगड़ने लगा।
22 अक्टूबर, 1986 के दिन अल्प बीमारी के बाद कुमारी भगवंती नावाणी का अपने गृहनगर मुम्बई के एक अस्पताल में अल्प बीमारी के बाद निधन हो गया |
लगभग सभी सिंधी फिल्मों में मुख्य गायिका रही इस कलाकारा ने बिमल राय की हिन्दी फिल्म “बिराज बहू" में तुलसी की चौपाईयों को अपनी आवाज़ दी | इस कलाकारा की आवाज़ ग्रामोफोन कम्पनी आफ इंडिया तथा हिज़ मास्टर्स वाइस के रिकार्डस पर होने के अलावा कई आडियो कैसेटस पर भी मौजूद है जिनमें उसने अपने कलाकार मंडल के साथी सतराम रोहिड़ा (जिसने आगे चलकर हिन्दी फिल्म “जय संतोषी मां " का निर्माण किया ) तथा प्रसिद्ध फिल्मी गायक महेन्द्र कपूर के साथ गीत गाये हैं । वैसे तो इनकी आवाज़ में भरे गये लगभग सभी रिकार्डस और कैसेटस सिंधी जगत में लोकप्रिय हैं, लेकिन विशेषकर भगवन्ती की आवाज़ में जारी गुरूवाणी की कैसेट “सुखमनी” अधिकांश सिंधियों के घरों में रोज़ सबह सुनी जाती है । उल्लेखनीय है कि आज के इंटरनेट के ज़माने में भगवन्ती की रिकार्डिंग्स यू टयूब जैसी वेब साईटों पर भी उपलब्ध हैं, जहां से उन्हें चलाकर भगवन्ती की रसीली आवाज़ का आनन्द लिया जा सकता है |
सनमुखानी नंद कुमार मोबा. 9300699574
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