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युगपक्ष : वायु जैसे तूफानों से बचना है तो... करें ये कार्य
दैनिक युगपक्ष में प्रमुखता से प्रकाशित समाचार 16 जून 2019 👇 नीचे पढ़ें पूरा टैक्स्ट 👇
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युगपक्ष : वायु जैसे तूफानों से बचना है तो... करें ये कार्य
वायु जैसे तूफानों से बचना है तो प्रकृति को पूजो - महाराजश्री ललितकिशोर व्यास
सरल और आनंदित जीवन जीने के लिए इंसान को जरूरी तौर पर पांच विकारों का त्याग करना होता है। जो मनुष्य संस्कारों से समृद्ध हो काम, क्रोध, लोभ मोह व अहंकार को त्याग कर धर्म की राह पर चलता है वही मनुष्य इसी जीवन में स्वर्गिक आनंदानुभूति और मुक्ति प्राप्त करने में सफल होता है। ऐसा कहना है महाराजश्री ललितकिशोर जी व्यास वृंदावन वाले का। युगपक्ष के पाठकों के लिए विशेष भेंटवार्ता मे एक सवाल के जवाब में महाराज का कहना था - संस्कारों के बिना मनुष्य जीवन अपूर्ण है। महाराज ने कहा कि संस्कार ही मनुष्य को पूर्ण बनाते हैं। जिस व्यक्ति में संस्कार नहीं होते वह समाज का अंग भी नहीं हो सकता। समाज के लोगों को कर्म के साथ अनिवार्य रूप से भगवत् स्मरण करते रहने के संस्कार ग्रहण करने और आदर्शवादी जीवन अपनाने का संदेश देते हुए उन्होंने कहा कि धरती माता भी अधिक विकृति सहन नहीं करती।
प्रकृति से प्रेम, बड़ों का सम्मान और पर्यावरण के संरक्षण-संवर्धन का संदेश देते हुए महाराज ने कहा कि मन की शुद्धि के बिना जीव की तथा पेड़-पौधों, नदी-तालाबों, पर्वतों के बगैर वातावरण की शुद्धि की कल्पना भी निरर्थक है। वायु जैसे तूफानों और प्राकृतिक आपदाओं के आने का कारण बताते महाराज ने कहा कि मनुष्य द्वारा प्रकृति से छेड़छाड़ से प्रकृति का संतुलन बिगड़ने पर धराजीवन पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ता है। भगवती सेवा मण्डल द्वारा वैष्णो धाम में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन के लिए वृंदावन से पधारे महाराजश्री ललितकिशोर जी व्यास ने श्रीमद्भागवत कथा की महत्ता प्रतिपादित करते कहा कि बड़ों के द्वारा छोटों को संस्कारित करने वाले इस दिव्य और पूज्य ग्रंथ में दिवंगत आत्माओं को शांति व मुक्ति देने की शक्ति निहित है। इस ग्रंथ के कथा प्रसंगों को श्रवण करना गृहस्थ जीवन के लिए भी सुख और समृद्धि कारक है।
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वायु जैसे तूफानों से बचना है तो प्रकृति को पूजो - महाराजश्री ललितकिशोर व्यास
सरल और आनंदित जीवन जीने के लिए इंसान को जरूरी तौर पर पांच विकारों का त्याग करना होता है। जो मनुष्य संस्कारों से समृद्ध हो काम, क्रोध, लोभ मोह व अहंकार को त्याग कर धर्म की राह पर चलता है वही मनुष्य इसी जीवन में स्वर्गिक आनंदानुभूति और मुक्ति प्राप्त करने में सफल होता है। ऐसा कहना है महाराजश्री ललितकिशोर जी व्यास वृंदावन वाले का। युगपक्ष के पाठकों के लिए विशेष भेंटवार्ता मे एक सवाल के जवाब में महाराज का कहना था - संस्कारों के बिना मनुष्य जीवन अपूर्ण है। महाराज ने कहा कि संस्कार ही मनुष्य को पूर्ण बनाते हैं। जिस व्यक्ति में संस्कार नहीं होते वह समाज का अंग भी नहीं हो सकता। समाज के लोगों को कर्म के साथ अनिवार्य रूप से भगवत् स्मरण करते रहने के संस्कार ग्रहण करने और आदर्शवादी जीवन अपनाने का संदेश देते हुए उन्होंने कहा कि धरती माता भी अधिक विकृति सहन नहीं करती।
प्रकृति से प्रेम, बड़ों का सम्मान और पर्यावरण के संरक्षण-संवर्धन का संदेश देते हुए महाराज ने कहा कि मन की शुद्धि के बिना जीव की तथा पेड़-पौधों, नदी-तालाबों, पर्वतों के बगैर वातावरण की शुद्धि की कल्पना भी निरर्थक है। वायु जैसे तूफानों और प्राकृतिक आपदाओं के आने का कारण बताते महाराज ने कहा कि मनुष्य द्वारा प्रकृति से छेड़छाड़ से प्रकृति का संतुलन बिगड़ने पर धराजीवन पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ता है। भगवती सेवा मण्डल द्वारा वैष्णो धाम में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन के लिए वृंदावन से पधारे महाराजश्री ललितकिशोर जी व्यास ने श्रीमद्भागवत कथा की महत्ता प्रतिपादित करते कहा कि बड़ों के द्वारा छोटों को संस्कारित करने वाले इस दिव्य और पूज्य ग्रंथ में दिवंगत आत्माओं को शांति व मुक्ति देने की शक्ति निहित है। इस ग्रंथ के कथा प्रसंगों को श्रवण करना गृहस्थ जीवन के लिए भी सुख और समृद्धि कारक है।
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