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सात दशक मतलब तीन पीढ़ियों के सपनों का समय। यूं बहुत से भाग्यवानों को चौथी पीढ़ी के होनहारों को भी गोद में झुलाने के सुअवसर मिलते हैं। हमारा राष्ट्र भारत भाग्यवानों में से एक है। भाग्यवान जनता को लगभग 70 वर्ष के दुगने समय का अनुभव रखने वाला राजनीतिक दल और तकरीबन 70 - 80 वर्षों के अपने इतिहास वाला दल, दोनों के नेता ऐसे स्वप्न दिखा रहे हैं जो जनता के लिए सुनने में सुखद है और यथार्थ में अति सुखद होने की संभावनाओं से लबरेज भी हैं । इसलिए कि दिखाए जा रहे उन सपनों को हकीकत में बदलने का जज्बा दोनों राजनीतिक दलों के नेताओं और मुखियाओं में दिखाई भी देता है। बस, किसी राक्षस की तरह दुस्वप्न आकर इस बात से डरा रहा है कि आम चुनाव में हमने भरोसा कर जिस किसी भी राजनीतिक दल को कुर्सी सौंपी और बाद में वह दल जज्बाविहीन निकला तो...। ध्यान रहे, बात यहां खत्म नहीं हुई बल्कि बात यहां से ही शुरू होती है...।
-✍️ मोहन थानवी
स्वतंत्र पत्रकार, साहित्यकार
सपना है तो हकीकत में बदलने का जज्बा भी है
आज 9 अप्रैल 2019 को सत्ता संग्राम ( दैनिक युगपक्ष ) में प्रमुखता से प्रकाशित । पूरी टिप्पणी 👇सबसे नीचे 👇👇👇
( "दोनों प्रमुख दलों के चुनावी घोषणा पत्रों में वादों और सपनों की कमी नहीं । ऐसे में एक आशंकित आम आदमी को दुस्वप्न भी सिहराता है... कि आम चुनाव में
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सपना है तो हकीकत में बदलने का जज्बा भी है
( "दोनों प्रमुख दलों के चुनावी घोषणा पत्रों में वादों और सपनों की कमी नहीं । ऐसे में एक आशंकित आम आदमी को दुस्वप्न भी सिहराता है... कि आम चुनाव में हमने भरोसा कर जिस किसी भी राजनीतिक दल को कुर्सी सौंपी और बाद में वह दल जज्बाविहीन निकला तो...। ध्यान रहे, बात यहां खत्म नहीं हुई बल्कि बात यहां से शुरू नहीं होती है...।" )
चुनाव हो रहे हैं तो घर-घर में गाहेबगाहे चर्चा राजनीतिक दलों, प्रत्याशियों और उनके समर्थकों होने ही लगती है। ठीक उन दिनों की तरह जिन दिनों सरकार बजट पेश कर रही होती है। और इन दिनों बातें सपनों के खेतीहरों की हो रही हैं। घरों में, मोहल्लों मे, दुकानों पर, चाय-पान की थड़ियों पर, दफ्तरों में सर्वाधिक किसी एक विषय पर गुफ्तगू हो रही है तो वह विषय है - सपनों का। और सपने भी वे, जो राजनीतिक दल और उनके नेता दिखाते थक नहीं रहे। बात न व्यंग्य की है न तंज की और न ही किसी नौटंकी की । बात धरातल की करें तो यह महसूस करेंगे कि हम भारत राष्ट्रवासियों के पास इतनी शक्ति तो है कि हम असंभव को संभव कर दिखा चुके है। यह संभव तभी हुआ जब हम एकजुट हुए। क्योंकि चीटियां भी समूह में मेहनत कर रोटी के बड़े टुकड़े को अपने नगरे तक खींच ले जाती है। भारत राष्ट्र के हम वासी ऐसे ही चीटियों की मानिंद एकता का प्रदर्शन कर राष्ट्र को विकास की बुलंदियों की ओर ले जाने में सक्षम है। यह बीते सात दशक की यात्रा ने दुनिया को अनुभव करवा दिया है। प्राकृतिक आपदा, अतिवृष्टि आदि से जूझते हुए भी हमने प्रतिकूल हो चुकी परिस्थितियों को अपने अनुकूल बनाना सीख लिया है। हमने अपने पड़ोसी देशों में भी अपनी सौहार्द और अपनत्व की छाप छोड़ी है। हमारी सरहद पर टेढ़ी नजर से देखने वालों को भी सबक सिखाए हैं । और वैर भाव रखने वाले सीमाओं के पार के कुछ लोगों को धरती के दो टुकड़ों पर रहना भी सिखा दिया है । हमारी सांस्कृतिक विरासत को और सामाजिक समरसता को आगे बढ़ाने का काम बीते वर्षों में बखूबी हुआ है । विश्व में भारत एक शक्ति के रूप में उभर रहा है। विज्ञान की दृष्टि से भी हमारे राष्ट्र ने 21वीं सदी का सिरमौर बनने की अपनी क्षमताओं का प्रदर्शन किया है । आम चुनावों के समय यदि पक्ष और विपक्ष के राजनीतिक दल कुछ ऐसी घोषणाएं और वादे करते हैं जो सुनने में कौतूहल जगाते हों तो भी सकारात्मक नजरिया यह मानने के लिए तर्क देता है कि भारत में क्षमता और राजनेताओं में सपनो को हकीकत में बदलने का जज्बा है।
बहुत लोग तो दिखाए जाने वाले सपनों में इतना खो गए हैं कि असंभव शब्द को अपनी-अपनी डिक्शनरी से बाहर रख केवल और केवल संभव पर केंद्रित होकर सकारात्मक होने की जीती जागती नजीर पेश करने लगे हैं। ये इन दिनों की बात है। अनचाहे कहीं से राजनीति आकर हमारे सामाजिक जीवन को प्रभावित कर रही है। यह सात दशक का सफर तय कर चुके लोगों के लिए कौतूहल हो सकता है लेकिन सत्तर पार के दादा-परदादा की गोद से उतर कर चलने और फिर दौड़ने का जज्बा रखने वालों के लिए कौतुक की नहीं, सपनों को हकीकत में बदलने के जज्बे की बात है । वो जज्बा जो उनमें उछालें मार रहा है।सात दशक मतलब तीन पीढ़ियों के सपनों का समय। यूं बहुत से भाग्यवानों को चौथी पीढ़ी के होनहारों को भी गोद में झुलाने के सुअवसर मिलते हैं। हमारा राष्ट्र भारत भाग्यवानों में से एक है। भाग्यवान जनता को लगभग 70 वर्ष के दुगने समय का अनुभव रखने वाला राजनीतिक दल और तकरीबन 70 - 80 वर्षों के अपने इतिहास वाला दल, दोनों के नेता ऐसे स्वप्न दिखा रहे हैं जो जनता के लिए सुनने में सुखद है और यथार्थ में अति सुखद होने की संभावनाओं से लबरेज भी हैं । इसलिए कि दिखाए जा रहे उन सपनों को हकीकत में बदलने का जज्बा दोनों राजनीतिक दलों के नेताओं और मुखियाओं में दिखाई भी देता है। बस, किसी राक्षस की तरह दुस्वप्न आकर इस बात से डरा रहा है कि आम चुनाव में हमने भरोसा कर जिस किसी भी राजनीतिक दल को कुर्सी सौंपी और बाद में वह दल जज्बाविहीन निकला तो...। ध्यान रहे, बात यहां खत्म नहीं हुई बल्कि बात यहां से ही शुरू होती है...।
-✍️ मोहन थानवी
स्वतंत्र पत्रकार, साहित्यकार











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