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‘एक सम्प्रदाय के नहीं पूरे विश्व के है महावीर’
तप के सामने राजसत्ता भी कांप जाती है: खत्री
भगवान महावीर जन्मकल्याणक के अवसर पर ‘‘महावीर मेरी दृष्टि’’ विषय पर प्रबुद्धजन संगोष्ठी आयोजित
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‘एक सम्प्रदाय के नहीं पूरे विश्व के है महावीर’
तप के सामने राजसत्ता भी कांप जाती है: खत्री
भगवान महावीर जन्मकल्याणक के अवसर पर ‘‘महावीर मेरी दृष्टि’’ विषय पर प्रबुद्धजन संगोष्ठी आयोजित
बीकानेर। महापुरुष जातियों के केवल प्रणेता नहीं होते। प्राणी मात्र के प्रणेता होते हैं। मनुष्य जन्म से नहीं कर्म से महान बनता है। भगवान महावीर ने सभी को हमेशा संदेश किया कि प्राणी मात्र के प्रति मैत्रीभाव रखना चाहिए। भगवान महावीर संकल्प के धनी एवं धैर्यशील थे। ये विचार गंगाशहर स्थित आशीर्वाद भवन में भगवान महावीर के 2618 वां जन्म कल्याणक महोत्सव के अवसर पर ’’महावीर मेरी दृष्टि में’’ विषय पर प्रबुद्धजन संगोष्ठी में मुख्य वक्ता अधिशाषी अभियन्ता जसवन्त खत्री ने कही। उन्होंने कहा कि महावीर ने जो संकल्प लिए वो मामुली संकल्प नहीं थे, उन्होंने बड़े धैर्य के साथ अपने संकल्पों का पालन किया जिसमें चन्दनबाला के हाथ से पारणा करने का उदाहरण विशेष रूप से बताया। ज्ञान अगर आचरण में नहीं तो दर्शन करने का कोई औचित्य ही नहीं बचता। भगवान महावीर ने साढे बारह वर्ष तक अखण्ड मौन की साधना की थी। ग्वाले द्वारा पीड़ा पहंुचाई गई लेकिन फिर भी विचलित नहीं हुए ऐसे थे महावीर। उन्होंने संन्यास से केवल ज्ञान तक की यात्रा की थी। भगवान महावीर ने प्रत्येक प्रताड़ना देने वाले को क्षमा किया था। खत्री ने कहा कि तप के सामने राजसत्ता भी कांप जाती है। भगवान इंद्र भी तप के आगे कांप गए थे। परिग्रह के कारण समाज में विकृतियां पैदा होती है। भगवान महावीर जीवन में हर परीक्षा में खरे उतरे थे। उन्होंने कहा कि आतंकवाद की समस्या को वैश्विक समाधान चाहिए। विश्व की दृष्टि में महावीर एक विषय है। भगवान महावीर ने विश्व को अनेकातवाद, स्याद्वाद, सहअस्तित्व की देन दी है। कैवल्य प्राप्ति के बाद भगवान महावीर ने जो दिया उससे युग परिवर्तन हो गया। खत्री ने कहा कि हम परिग्रह करते-करते संयम केा भूलते गये। प्रत्येक कार्य में सीमा रखना जरूरी है फिर चाहे वो शादी का प्रसंग हो या कुछ और, सीमा जरूर होनी चाहिए। हमारा पद, प्रतिष्ठा, मैं, मेरा ये सब एक प्रकार की हिंसा ही है। मैं के साथ परिग्रह बढ़ता है। आज की पीढ़ी सत्संग से दूर होती जा रही है, ये सबसे बड़ा संकट है। बच्चों में संस्कारों की पौद्य उगानी जरूरी है। इच्छाओं का सीमाकरण होना जरूरी है। उन्होंने कहा कि हमें बच्चों को समय देना चाहिए और सत्य, अहिंसा आदि महाव्रतों की जानकारी बच्चों को समय-समय पर देना चाहिए। छोटे-छोटे व्रतों एवं नियमों को भी बताना होगा। इन सबके लिए पहले हमें खुद को ये नियम आचरण में लाना होगा। भगवान महावीर किसी एक सम्प्रदाय के नहीं अपितु सम्पूर्ण विश्व के महावीर थे।
भगवान महावीर के बारे में अपने उद्गार व्यक्त करते हुए विशिष्ट वक्ता हुए डॉ. मनीषा श्रीमाली ने कहा कि तीर्थंकरों में भगवान महावीर का स्थान अन्तिम में है। एक मात्र जैन धर्म ही ऐसा है जिसमें तप का बहुत महत्व है। भगवान महावीर का जब जन्म हुआ तब आकाश से रत्नों की बरसात हुई ऐसी मान्यता है। भगवान महावीर स्वप्न वादी नहीं थे। अगर उनके सिद्धान्तों को ईमानदारी से अपने जीवन में उतारे तो शायद समाज की आधी पीड़ा तो ऐसे ही समाप्त हो जाएगी। उन्होंने कहा कि उनका अहिंसा सिद्धान्त केवल मनुष्यों के लिए ही नहीं अपितु पेड़-पौधों के लिए भी है। उन्होंने अहिंसा परमो धर्म का शंखनाद किया। जीयो और जीने दो का सिद्धान्त भगवान महावीर ने दिया। अहिंसा प्राणी मात्र के लिए संयम है। अगर व्यक्ति अपरिग्रहों को अपनाले तो कषाय क्षीण होते हैं। डॉ. श्रीमाली ने कहा कि जहां पर पीड़ा को देखा जाए वहां महावीर का सिद्धान्त का अवतरण होता है। इसकी शुरूआत खुद से करें। भगवान महावीर ने हमेशा झूठ न बोले, चोरी ना करने के उपदेश दिए। ब्रह्मचर्य का पालन के लिए महावीर ने पांचवां महाव्रत किया। भगवान महावीर ने कहा कि व्यक्ति अगर ऊंचाइयों को छूता है तो इसका कारण व्यक्ति स्वयं ही होता है और पतन का कारण भी व्यक्ति खुद ही होता है। भगवान महावीर हमें आत्मनिर्भरता का पाठ पढ़ाते हैं। उन्होंने कहा कि महावीर ने सामाजिक कुरूतियों को दूर करने का प्रयास किया अगर उनको वैज्ञानिक कहें तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। भगवान महावीर आज भी हमारे भीतर विद्यमान हैं। अनेक रूपों में वो हमें हर पल आलोकित करते रहते हैं।
संगोष्ठी को सम्बोधित करते हुए डॉ. कौशल पारीक ने कहा कि धर्म व्यक्ति के जीवन में किसी न किसी रूप में जुड़ा है। जैन धर्म का उल्लेख बोध ग्रन्थ व अन्य गं्रथों में भी मिलता है। भगवान महावीर का जन्म क्षत्रिय कुल में हुआ। साढ़े बारह साल तक कठोर तपस्या की। महावीर ने साधु-साध्वी, श्रावक-श्राविका चतुर्विद धर्म संघ की स्थापना की। महावीर ने आचार शास्त्र पर बल दिया। भगवान महावीर ने जैन धर्म को आगे बढ़ाया। महावीर ने कर्म को भी विशेष महत्व दिया है तथा अहिंसा का पालन करने की प्रेरण दी व अहिंसा को हमेशा-हमेशा के लिए अपनाने के लिए बल दिया। अहिंसा के साथ-साथ भोजन में भी शाकाहार भोजन के लिए पुरा जोर दिया। उन्होंने कहा कि भगवान महावीर समाज के पथ-प्रदर्शक थे। आज समाज में सबसे अधिक व्यापारी जैन है तथा शिक्षा के क्षेत्र में भी जैन समाज ही आगे है। उन्होंने केवल पुरुषों को ही नहीं स्त्रियों को भी आगे बढ़ाया।
स्वागत भाषण करते हुए जैन महासभा के अध्यक्ष जयचन्दलाल डागा ने कहा कि भगवान महावीर ने आत्मा की स्वतंत्रता का अपहरण करने वाले संस्कारों का ध्यान और तपस्या से दमन किया। उन्होंने कहा कि भगवान महावीर अहिंसा को अपनी माता के समान मानते थे। उन्होंने कहा कि विषमता के आसन पर समता की प्रतिष्ठा होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि समभाव रखो। सबको बराबर समझो। सबका सम्मान और आदर करो।
वक्ताओं का परिचय व विषय प्रवर्तन करते हुए आचार्य तुलसी शान्ति प्रतिष्ठान के अध्यक्ष जैन लूणकरण छाजेड़ ने कहा कि संसार का प्राचीनतम धर्म जैन धर्म है। यह विभिन्न नामों से जाना, पहचाना जाता था जिसका उल्लेख वेदों, महाभारत, रामायण व उपनिषदों में मिलता है। भगवान महावीर के सिद्धानत अहिंसा, अपरिग्रह व अनेकान्त की आज भी पूर्णतया प्रासंगिकता है। उन्होंने कहा कि भगवान महावीर ने कहा न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति हो सकती है परन्तु अपरिमित आकांक्षाओं की नहीं। प्राणी की स्वतत्रंता का हनन उचित नहीं है। छाजेड़ ने कहा कि भगवान महावीर ने आम भाषा का उपयोग किया तभी उन्होंने अपने संदेश को जन-जन तक पहंुचाया। महावीर ने प्राणी मात्र के प्रति समभाव रखने का संदेश दिया। महावीर के प्रति निष्ठा सत्य के प्रति निष्ठा है। उन्होंने कहा कि हम महावीर को मानते है परन्तु महावीर की नहीं मानते, आवश्यकता है कि महावीर के सिद्धान्तों, उपदेशों को आचरण में ढालें। महावीर को हम मानते हैं या जानते हैं। इसके लिए आत्म-मंथन करना होगा।
मेघराज बोथरा ने महावीर जयन्ती के कार्यक्रमों की विस्तारपूर्वक जानकारी देते हुए बताया कि 16 अप्रेल को सायं 8 से 8ः40 बजे तक जैन पब्लिक स्कूल परिसर में सामूहिक महावीर प्रार्थना, 17 अप्रेल सुबह 7ः30 बजे जैन जवाहर विद्यापीठ, भीनासर एवं दिगम्बर नसिया जी बीकानेर से शोभायात्रा प्रारम्भ होगी जो शहर के मुख्य मार्गों से होते हुए गौड़ी पार्श्वनाथ मन्दिर पहंुचेगी। इसी दिन सुबह 9ः30 बजे से गौड़ी पार्श्वनाथ मन्दिर परिसर में मुख्य समारोह का आयोजन किया जाएगा जिसमें डॉ. नन्दकिशोर आचार्य मुख्य वक्ता होंगे। इन सभी कार्यक्रमों में समाजबन्धुओं को सादर आमंत्रित किया गया है।
संगोष्ठी के दौरान अधिशाषी अभियन्ता, पीडब्ल्यूडी जसवन्त खत्री का डॉ. पी.सी. तातेड़, सुरेन्द्र जैन व बसन्त नौलखा ने, पूर्व प्राचार्य, एमएस कॉलेज डॉ. कौशल पारीक का प्रीति डागा, निर्मल दस्साणी व विनोद बाफना ने, शिक्षाविद् डॉ. मनीषा श्रीमाली का नयनतारा छलाणी, मंजु आंचलिया व नारायण गुलगुलिया ने जैन पताका, स्मृति चिन्ह व साहित्य भेंट कर सम्मान किया गया।
कार्यक्रम की विधिवत् शुरूआत दीप प्रज्ज्वल के बाद नमस्कार महामंत्र के सामूहिक उच्चारण के साथ हुई। बीकाणा वीरा केन्द्र द्वारा महावीर प्रार्थना का संगान किया गया। कार्यक्रम के अन्त में महावीर इन्टरनेशनल के अध्यक्ष डॉ. नरेश गोयल ने आभार ज्ञापित किया। कार्यक्रम का संचालन मनोज सेठिया ने किया।
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