उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन ने सिंधी-देवनागरी और फारसी लिपियों में भारत के संविधान का नया संस्करण जारी किया केंद्रीय मंत्री अर्जुन राम मेघवाल, विधानसभा के अध्यक्ष वासुदेव देवनानी, इंदौर सांसद शंकर लालवानी सहित राजस्थान से सिंधी समाज के कई गणमान्य साक्षी बने
औरों से हटकर सबसे मिलकर
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गतिविधियां, वक्तव्य, विश्लेषण
खबरों में बीकानेर
✒️@Mohan Thanvi
उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन ने सिंधी-देवनागरी और फारसी लिपियों में भारत के संविधान का नया संस्करण जारी किया
केंद्रीय मंत्री अर्जुन राम मेघवाल, विधानसभा के अध्यक्ष वासुदेव देवनानी, इंदौर सांसद शंकर लालवानी सहित राजस्थान से सिंधी समाज के कई गणमान्य साक्षी बने
उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन ने सिंधी-देवनागरी और फारसी लिपियों में भारत के संविधान का नया संस्करण जारी किया
केंद्रीय मंत्री अर्जुन राम मेघवाल, विधानसभा के अध्यक्ष वासुदेव देवनानी, इंदौर सांसद शंकर लालवानी सहित राजस्थान से सिंधी समाज के कई गणमान्य साक्षी बने
सिंधी भाषा और संविधान
10 अप्रैल 2026 को भारत के उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन ने नई दिल्ली में सिंधी भाषा में भारत के संविधान का नया संस्करण जारी किया, जो मुख्य रूप से देवनागरी लिपि में प्रकाशित है। यह पहल नागरिकों को उनकी मातृभाषा में संवैधानिक अधिकारों से जोड़ने के लिए की गई है, क्योंकि सिंधी को 1967 में 21वें संशोधन के माध्यम से 8वीं अनुसूची में शामिल किया गया था।
इस अवसर पर केंद्रीय विधि एवं न्याय राज्य मंत्री अर्जुन राम मेघवाल, राजस्थान विधानसभा के अध्यक्ष वासुदेव देवनानी, लोकसभा सांसद शंकर लालवानी और विधायी विभाग के सचिव डॉ. राजीव मणि इंदौर से ईश्वर झामनानी, विशाल गिडवाणी, जयपुर से गोरधन आसनानी, मुकेश लखयानी, तुलसी संगतानी, गोविन्द गुरबानी, श्याम सतवानी, भरत आसनानी उपस्थित रहे सहित अन्य गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे।
ऐतिहासिक मान्यता: 1967 में 21वें संवैधानिक संशोधन अधिनियम के तहत सिंधी भाषा को संविधान की 8वीं अनुसूची में आधिकारिक भाषा के रूप में मान्यता दी गई थी।
उपराष्ट्रपति ने कहा, “मातृभाषा में संविधान नागरिकों को सशक्त बनाता है”
सिंधी समुदाय की ऐतिहासिक यात्रा का वर्णन करते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि विभाजन के बाद के कठिन समय में यह भाषा दृढ़ता और एकता का प्रतीक रही।
उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि ऐसी पहल नागरिकों को सशक्त बनाने और वर्ष 2047 तक विकसित भारत के दृष्टिकोण को मजबूत करने में योगदान देगी।
उपराष्ट्रपति ने सिंधी भाषा दिवस के अवसर पर सिंधी भाषी समुदाय को हार्दिक शुभकामनाएं दीं। उन्होंने कहा कि सिंधी सबसे प्राचीन भाषाओं में से एक है और इसकी साहित्यिक परंपरा वेदांतिक दर्शन और सूफी विचारों के अनूठे संगम को दर्शाती है, जो एकता, प्रेम और भाईचारे के सार्वभौमिक मूल्यों को बढ़ावा देती है।
नया संस्करण: उपराष्ट्रपति द्वारा जारी संस्करण का उद्देश्य सिंधी भाषी समुदाय को सशक्त बनाना और उनकी भाषा का संरक्षण करना है।
लिपि: नवीनतम संस्करण देवनागरी लिपि में है, जो इसे व्यापक पाठकों के लिए सुलभ बनाता है।
महत्व: सिंधी भाषा को 8वीं अनुसूची में शामिल करना समुदाय की सांस्कृतिक पहचान और भाषाई गौरव को सम्मान देने वाला एक महत्वपूर्ण कदम था।
10 अप्रैल का महत्व: यह दिन सिंधी समुदाय की समृद्ध विरासत और संवैधानिक मान्यता के प्रतीक के रूप में महत्वपूर्ण है।
यह पहल सरकार की भाषाई विविधता को बढ़ावा देने और संविधान को हर नागरिक की पहुंच में लाने की प्रतिबद्धता को दर्शाती है।
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उपराष्ट्रपति ने संविधान को बोडो, डोगरी, संथाली, तमिल, गुजराती और नेपाली आदि भाषाओं में उपलब्ध कराने के प्रयासों का उल्लेख करते हुए कहा कि ये प्रयास भारत की भाषाई विविधता का सम्मान करते हैं और लोकतांत्रिक मूल्यों को सुदृढ़ बनाते हैं।
सिंधी समुदाय की ऐतिहासिक यात्रा का वर्णन करते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि विभाजन के बाद के कठिन समय में यह भाषा दृढ़ता और एकता का प्रतीक रही। उन्होंने कहा कि सिंधी भाषा को 1967 में 21वें संवैधानिक संशोधन के माध्यम से संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया गया था, जिससे इसके सांस्कृतिक महत्व को मान्यता मिली और आने वाली पीढ़ियों के लिए इसका संरक्षण सुनिश्चित हुआ।
उपराष्ट्रपति ने कहा कि मातृभाषा के साथ-साथ सभी भाषाओं को समान महत्व और सम्मान मिलना चाहिए। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि भारत की शक्ति उसकी विविधता में निहित है और भाषाएं संस्कृति, परंपरा और पहचान की महत्वपूर्ण वाहक हैं।
उपराष्ट्रपति ने संविधान को क्षेत्रीय भाषाओं में सुलभ बनाने के लिए विधि एवं न्याय मंत्रालय, विशेषकर क्षेत्रीय भाषा अधिकारियों के प्रयासों की सराहना की। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि ऐसी पहल नागरिकों को सशक्त बनाने और वर्ष 2047 तक विकसित भारत के दृष्टिकोण को मजबूत करने में योगदान देगी।
उपराष्ट्रपति ने विविधता में एकता की भावना और "राष्ट्र प्रथम" के मार्गदर्शक सिद्धांत को दोहराते हुए नागरिकों से अपनी मातृभाषाओं के साथ-साथ राष्ट्र की सामूहिक भाषाई विरासत का सम्मान करने का आग्रह किया।
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कार्यक्रम में इंदौर से ईश्वर झामनानी, विशाल गिडवाणी, जयपुर से गोरधन आसनानी, मुकेश लखयानी, तुलसी संगतानी, गोविन्द गुरबानी, श्याम सतवानी, भरत आसनानी उपस्थित रहे अन्य गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे।
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10 अप्रैल 2026 को भारत के उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन ने नई दिल्ली में सिंधी भाषा में भारत के संविधान का नया संस्करण जारी किया, जो मुख्य रूप से देवनागरी लिपि में प्रकाशित है। यह पहल नागरिकों को उनकी मातृभाषा में संवैधानिक अधिकारों से जोड़ने के लिए की गई है, क्योंकि सिंधी को 1967 में 21वें संशोधन के माध्यम से 8वीं अनुसूची में शामिल किया गया था।
उपराष्ट्रपति ने सिंधी भाषा दिवस के अवसर पर सिंधी भाषी समुदाय को हार्दिक शुभकामनाएं दीं। उन्होंने कहा कि सिंधी सबसे प्राचीन भाषाओं में से एक है और इसकी साहित्यिक परंपरा वेदांतिक दर्शन और सूफी विचारों के अनूठे संगम को दर्शाती है, जो एकता, प्रेम और भाईचारे के सार्वभौमिक मूल्यों को बढ़ावा देती है।
उपराष्ट्रपति ने कहा कि स्वतंत्रता के बाद पहली बार सिंधी भाषा में विशेष रूप से देवनागरी लिपि में संविधान का प्रकाशन, भाषाई समावेशिता को बढ़ावा देने में एक महत्वपूर्ण कदम है। उन्होंने कहा कि संविधान केवल एक कानूनी दस्तावेज नहीं है, बल्कि राष्ट्र की जीवंत आत्मा है, जो इसकी आकांक्षाओं को समाहित करती है, अधिकारों की रक्षा करती है और लोकतांत्रिक शासन का मार्गदर्शन करती है
उपराष्ट्रपति ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में सरकार द्वारा संविधान को अनेक भारतीय भाषाओं में सुलभ बनाने के प्रयासों की सराहना की। उन्होंने कहा कि इस प्रकार की पहल नागरिकों और शासन के बीच के अंतर को कम करने में सहायक होती है, क्योंक इससे लोग संविधान को अपनी मातृभाषा में समझ पाते हैं, जिससे लोकतांत्रिक भागीदारी और विश्वास मजबूत होता है।
उपराष्ट्रपति ने संविधान को बोडो, डोगरी, संथाली, तमिल, गुजराती और नेपाली आदि भाषाओं में उपलब्ध कराने के प्रयासों का उल्लेख करते हुए कहा कि ये प्रयास भारत की भाषाई विविधता का सम्मान करते हैं और लोकतांत्रिक मूल्यों को सुदृढ़ बनाते हैं।
सिंधी समुदाय की ऐतिहासिक यात्रा का वर्णन करते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि विभाजन के बाद के कठिन समय में यह भाषा दृढ़ता और एकता का प्रतीक रही। उन्होंने कहा कि सिंधी भाषा को 1967 में 21वें संवैधानिक संशोधन के माध्यम से संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया गया था, जिससे इसके सांस्कृतिक महत्व को मान्यता मिली और आने वाली पीढ़ियों के लिए इसका संरक्षण सुनिश्चित हुआ।
उपराष्ट्रपति ने कहा कि मातृभाषा के साथ-साथ सभी भाषाओं को समान महत्व और सम्मान मिलना चाहिए। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि भारत की शक्ति उसकी विविधता में निहित है और भाषाएं संस्कृति, परंपरा और पहचान की महत्वपूर्ण वाहक हैं।
उपराष्ट्रपति ने संविधान को क्षेत्रीय भाषाओं में सुलभ बनाने के लिए विधि एवं न्याय मंत्रालय, विशेषकर क्षेत्रीय भाषा अधिकारियों के प्रयासों की सराहना की। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि ऐसी पहल नागरिकों को सशक्त बनाने और वर्ष 2047 तक विकसित भारत के दृष्टिकोण को मजबूत करने में योगदान देगी।
उपराष्ट्रपति ने विविधता में एकता की भावना और "राष्ट्र प्रथम" के मार्गदर्शक सिद्धांत को दोहराते हुए नागरिकों से अपनी मातृभाषाओं के साथ-साथ राष्ट्र की सामूहिक भाषाई विरासत का सम्मान करने का आग्रह किया।






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