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31 दिसंबर 2025 बुधवार
खबरों में बीकानेर
✒️@Mohan Thanvi
कृष्ण की शिक्षाओं को भूलना ही वर्तमान युग में तनाव का मुख्य का कारण
*कृष्ण की शिक्षाओं को भूलना ही वर्तमान युग में तनाव का मुख्य का कारण*
आर्ष न्यास अजमेर, वैदिक शोध संस्थान, पर्यावरण पोषण यज्ञ समिति,आरएसवी ग्रुप ऑफ स्कूल्स बीकानेर द्वारा आयोजित कृष्ण कथा एवं प्रवचन के छठे एवं अंतिम दिवस के अवसर पर होटल पाणिग्रहण में उपस्थित बड़ी संख्या में दर्शकों के समक्ष अपने संबोधन में आचार्य रवि शंकर ने कृष्ण जी के श्लोक
"कर्मण्येवाधिकारस्ते मां फलेषु कदाचना" का उदाहरण देते हुए कहा कि मनुष्य के हाथ में मात्रा कर्म करना है, कर्म व्यक्ति के शरीर, मन एवं इच्छा के द्वारा ही संभव है। दो ही प्रकार के कर्म संभव है अच्छा और बुरा।
गीता के 17वें अध्याय में श्री कृष्ण कहते हैं अर्जुन तुमने क्षत्रिय धर्म स्वीकार किया है अतः तुम्हें इसी धर्म का पालन करना है। व्यक्ति सभी से लड़ सकता है अपने स्वभाव से नहीं लड़ सकता। प्रकृति अर्थात स्वभाव हम अपने स्वभाव से नहीं बच सकते। हमें अपने स्वभाव पर केंद्रित होना चाहिए। यदि हम अपने स्वभाव के विपरीत कर्म करते हैं तो वह हमारे लिए हितकारी नहीं है। अच्छे कार्य की प्रशंसा तथा बुरे कार्य की निंदा करने पर पुण्य प्राप्त होता है इसके विपरीत अच्छे कार्य की निंदा तथा बूरे कार्य की प्रशंसा करने पर पाप के भागी बनते हैं।
आचार्य हरी प्रसाद ने अपने प्रवचनों में बताया आपका स्वभाव आपको सदैव कार्य करने के लिए प्रेरित करेगा। किया गया कार्य कभी भी निष्फल नहीं होता। कर्म का फल कब एवं किस रूप में मिलेगा यह भविष्य की गर्त में छुपा है। अतः अपने स्वभाव को समझिए उसी के अनुरूप कर्म करिए निश्चित रूप से उसका अच्छा फल मिलेगा।
मन व आत्मा के अंतर को कैसे पहचाने। कौन सा प्रश्न मन से आया कौन सा आत्मा से इसके जवाब में आचार्य जी ने बताया कि मन जड़ है आत्मा के विचार मन द्वारा रिफ्लेक्ट होते हैं। जिस प्रकार चांद सूर्य को प्रकाश को रिफ्लेक्ट कर रहा है। जैसे सूरज और चांद का रिश्ता है उसी प्रकार आत्मा एवं मन का रिश्ता है। शरीर में होने वाली प्रत्येक क्रिया का संचालन आत्मा से ही होता है मन आत्मा का साधन है।
आचार्य कुलदीप ने श्री कृष्ण कथा में बताया कि गर्भवती महिलाओं को मोबाइल से दूरी बनाकर रखनी चाहिए क्योंकि गर्भ में पल रहे शिशु पर निश्चित रूप से इसका प्रभाव पड़ता है जिस प्रकार अभिमन्यु ने अपनी माता के गर्भ में ही चक्रव्यूह में प्रवेश करना सिखा। भोजन करते समय किसी भी कारण से मोबाइल को हाथ में ना रखें ना ही बालकों के हाथ में दें। घर में भाषण नहीं आचरण चलता है बालक-बालिकाएं अपने परिवारजनों के आचरण से ही सीखते हैं। शिष्य को सीखने से पहले गुरू को स्वयं सिखाना आवश्यक होता है। आज प्रार्थनाओं का स्वरूप भी व्यक्ति की आवश्यकताओं के अनुसार बदल गया है जबकि पहले निस्वार्थ प्रार्थना की जाती थी जिसमें किसी प्रकार का छल नहीं हुआ करता था। भक्ति एवं प्रार्थना वही सफल है जो निष्काम भाव से की जाए। कार्यक्रम में पधारे गणमान्य व्यक्तियों एवं दर्शकों ने कार्यक्रम सराहना करते हुए इसे अत्यंत उपयोगी बताया।




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