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खबरों में बीकानेर 🎤 🌐
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महाबलीपुरम से चीन का है 17 सौ साल पुराना नाता
महाबलीपुरम बंगाल की खाड़ी के किनारे बसा एक शहर है जो
प्राचीन समय में व्यापार का बड़ा हब था और पूर्वी देशों के साथ यहां से
सीधे तौर पर व्यापार होता था. करीब 1700 साल पहले जब इस क्षेत्र
में पल्लव वंशका राज था और पल्लव वंश के राजा नरसिंह द्वितीय ने तब
चीन के साथ व्यापारिक संबंधों को बढ़ावा देने के लिए अपने दूतों को
चीन भी भेजा था. इसी के पास बसे कांचिपुरम का भी चीन के साथ
पुराना संबंध है.
यों ये मुलाकात अहम है?
ये मुलाकात इसलिए भी अहम है कि जम्मू-कश्मीर में धारा-370
हटाए जाने के बाद पहली बार दोनों नेता एक दूसरे के साथ होंगे. खासकर
तब जब ताजा-ताजा पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान चीन जाकर
जिनपिंग के आगे अपना दुखड़ा रो आए हैं. खास बात ये है कि कश्मीर
पर 8 अ टूबर को चीन के विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता ने कहा कि
कश्मीर पर चीन के रुख में बदलाव नहीं है. भारत-पाकिस्तान द्विपक्षीय
मुद्दे मिलकर सुलझाएं, लेकिन एक दिन बाद यानी 9 अक्टूबर को चीनी
राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने इमरान खान से बातचीत में कह दिया कि कश्मीर
को यूएन प्रस्तावों के मुताबिक सुलझाया जाए. जाहिर है कि प्रधानमंत्री
मोदी और शी जिनपिंग जब महाबलीपुरम के रमणीक वातावरण में मिलेंगे
तो चीन की ये चाल पीएम मोदी के जेहन में जरूर रहेगी. वैसे तो विदेश
मंत्रालय ने इस पर तुरंत ही जवाब दे दिया था कि भारत के आंतरिक
मामलों से चीन दूर ही रहे तो बेहतर है.
आर्थिक मुद्दों पर साथ खड़े हो सकते हैं
राजनयिक अशोक सज्जनहार ने कहा कि पाकिस्तान से ऐसी
यारी निभाने वाले चीन को महाबलीपुरम बुलाकर प्रधानमंत्री मोदी ने
पाकिस्तानी नहले पर दहला मारा है. इससे दुनिया में ये संदेश जाएगा कि
भले ही पाकिस्तान पर चीन की सरपरस्ती हो, लेकिन भारत को नाराज
करने की जुर्रत वो नहीं कर सकता. हां, ये जरूर हो सकता है कि
कारोबार से लेकर सीमा विवाद पर चलते-चलते कोई बात हो जाए.
दरअसल, चीन से भारत का संबंध प्यार का कम, नफरत का ज्यादा रहा
है. बॉर्डर विवाद शाश्वत प्रश्न की तरह खड़ा है, लेकिन आर्थिक मुद्दों पर
दोनों देश एक साथ खड़े हो सकते हैं.
चीन को अमेरिका दे चुका है चेतावनी चीन इन दिनों अमेरिका से ट्रेड वार में अपना हाथ झुलसा चुका है.
अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ये खुल्लमखुल्ला कह चुके हैं कि चीन को झुकना ही
होगा. ऐसे में चीन भारत से व्यापारिक संबंधों को ना सिर्फ मजबूत करने
का प्रयास करेगा बल्कि वो चाहेगा कि अमेरिका से व्यापार में आ रही
गिरावट की भरपाई वो भारत से कर ले. पीएम मोदी चीन की इस
कारोबारी मजबूरी को समझते हैं.
( युगपक्ष )
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