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प्रेमचंद के साहित्य का प्रभाव समस्त भारतीय
भाषाओं पर है - श्याम महर्षि
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✍️ प्रेमचंद के साहित्य का प्रभाव समस्त भारतीय
भाषाओं पर है - श्याम महर्षि
भाषाओं पर है - श्याम महर्षि
प्रेमचंद के साहित्य का प्रभाव समस्त भारतीय
भाषाओं पर है - श्याम महर्षि
बीकानेर । सार्वजनिक पुस्तकालय, बीकानेर
मुख्य अतिथि डॉ. मदन केवलिया ने
प्रेमचंद के मानवतावादी दृष्टिकोण
को, सभी तरह की रचनाओं तथा उनकी
राष्ट्रभक्ति से ओतप्रोत रचनाओं पर प्रकाश
डाला। डॉ. मदन सैनी ने गबन गोदान,
निर्मला, पंच परमेश्वर, कर्मभुमि के बारे में
प्रेमचंद को यथार्थ वादी लेखक बताया
और कहा कि वर्तमान में उनका लेखन
प्रासांगिक है। पुस्तकालयाध्यक्ष विमल
कुमार शर्मा ने प्रेमचंद के जीवन के बारे में
जानकारी दी। पुस्तकालय के पाठकगण
सदस्य रजत, मानसी तथा मंजीत सिह ने
विचार व्यक्त किए।
श्रीडूंगरगढ़
यहां की राष्ट्रभाषा हिन्दी प्रचार समिति में बुधवार
को मुंशी प्रेमचन्द की जयन्ती मनाई गई।
इस अवसर पर कस्बे के कई साहित्यकारों
ने उनके जीवन परिचय से उपस्थित लोगों
को अवगत करवाया। राजस्थानी भाषा,
साहित्य एवं संस्कृति अकादमी के पूर्व
अध्यक्ष श्याम महर्षि ने कहा कि प्रेमचन्द
उनके साहित्य का प्रभाव समस्त भारतीय
भाषाओं पर है। प्रेमचन्द के साहित्य की
रचनाएं समाज को नई दिशाएं देती रहेगी
और उनकी प्रासंगिकता बनी रहेगी। उन्होंने
बताया कि समय के दर्द की अभिव्यक्ति
को व्यक्त करने वाला ही कालजयी
रचनाकार होता है। अध्यक्षता करते हुए
डॉ. चेतन स्वामी ने कहा कि भारतीय
साहित्य में मुंशी प्रेमचन्द दैदीप्यमान नक्षत्र
है। उनका लेखन धारदार था। उनके जीवन
में लेखन एकांगी व्रत धारण किया।
भारतीय समाज की प्रत्येक जाति व वर्ग के
कलेजे में उतर कर उन्होंने लेखन कार्य
किया। मुंशी प्रेमचन्द की कहानियों में
आदर्श व यथार्थ दोनों को समावेश है।
जनोन्मुख रचनाकार ही कालजयी होता है।
साहित्यकार सत्यदीप ने कहा कि मुंशी
प्रेमचन्द की रचनाएं आम आदमी के दर्द
की अनुभूति पाठक को करवाने में सफल
होती है। साहित्यिक यात्रा में प्रेमचन्द का
रचनाकर्म आम आदमी की तात्कालिक,
सामाजिक व्यवस्था का सफल चित्रण
करती है। तुलसीराम चौरडिय़ा ने बताया
कि प्रेमचन्द गद्य लेखन में देश के सबसे
बड़े लेखक माने जाते है। यदि भारतीय
समाज को समझना है तो प्रेमचन्द के
साहित्य को पढऩा जरूरी है। इस अवसर
पर बजरंग शर्मा, रामचन्द्र राठी, श्रीकृष्ण
खण्डेलवाल, गोपीराम नाई, शुभकरण
पारीक, बालकृष्ण महर्षि, महावीर सारस्वत
ने भी अपने विचार रखे।
शब्दरंग साहित्य एवं कला संस्थान
शिव निवास बर्तन बाज़ार में 'मुंशी
प्रेमचन्द के साहित्य की प्रासंगिकताÓ
विषय पर आयोजित संगोष्ठी में मु य
अतिथि राजेन्द्र जोशी ने कहा कि मुंशी
प्रेमचन्द का साहित्य आज भी प्रासंगिक है।
विशिष्ठ अतिथि वरिष्ठ रंगकर्मी
बी.एल.नवीन ने कहा कि मुंशी प्रेमचंद के
साहित्य में भाव घटना या पात्र से दृश्य
विशिष्ठ अतिथि व्यंग्यकार-
लेखक, स पादक डॉ. अजय जोशी ने
कहा कि मुंशी प्रेमचन्द को हिन्दी और उर्दू
दोनों भाषाएं प्रिय थी मगर हिंदी में उनकी
रचनाएँ कालजयी है। उन्होंने कहा कि
मुंशीजी के साहित्य में अलंकारिता पूर्ण
शैली, उपमाओं, रूपक, के कारण उनका
लेखन सरल था। कवि कथाकार राजाराम
स्वर्णकार ने कहा कि विश्व के विशाल
जन समूह को मुंशी प्रेमचंद के साहित्य पर
गर्व है जो साम्राज्यवाद, पूंजीवाद और
सामंतवाद के खिलाफ संघर्ष का प्रतीक
है। लेखक अशफ़ाक कादरी ने कहा कि
मुंशीजी का रचनाकर्म मानवीय संवेदनाओ
से ओतप्रोत है। कार्यक्रम में कवि
बाबूलाल छंगाणी ऋषि कुमार अग्रवाल,
कवयित्री मीनाक्षी स्वर्णकार, हनुमान
कच्छावा ने भी विचार रखे।
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