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राम के वनगमन प्रसंग से किया भाव विभोर, वचन निभाने की मिली सीख
राम के वनगमन प्रसंग से किया भाव विभोर, वचन निभाने की मिली सीख
बीकानेर। मानस प्रचार समिति लखोटिया चौक के बैनर तले स्थानीय नृसिंह सत्संग उद्यान में चल रहे श्री नवाह्न परायण पाठ के चौथे दिन जब राम का वनगमन,केवट संवाद सहित अनेक प्रसंगों का व्याख्यान संगीतमय किया गया। इस दौरान कथा वाचक जोधपुर के पं गिरधर गोपाल और सुशील आसोपा ने जैसे ही राम अपने अनुज लक्ष्मण व अर्धागंनी सीता संग वन को गएं तो इस प्रसंग को सुन श्रद्वालुओं के अश्रुधारा बसने लगी। सभी भक्तगण भाव विभोर हो गये। कथा वाचक आसोपा ने अयोध्या के राजा दशरथ द्वारा राम के राजतिलक की तैयारी की जा रही थी। तभी रानी कैकेयी के कोप भवन जान की बात पता लगने पर दशरथ उसे मनाने पहुंचे। किन्तु वे भरत को राजसिंहासन सौंपने पर अड़ी रही और प्रभु राम को वनवास भेजने को कहा। इस पर प्रभु राम सीता व लक्ष्मण के साथ वन के लिये रवाना हुए। इस भावुक और मर्मस्पर्शी से उपस्थित श्रद्वालु भाव विभोर हो गये। जब प्रभु श्रीराम माता-पिता की आज्ञा का पालन कर राजसी वस्त्र त्यागकर वन के लिए प्रस्थान करते हैं, तो अयोध्या की पूरी प्रजा, माता कौशल्या और उनके भाई लक्ष्मण की आँखों में अश्रुधारा बह निकलती है। महाराज श्री ने कहा कि इस प्रसंग में प्रभु का माता-पिता के वचनों के प्रति प्रेम,कौशल्या माता की विलाप और प्रजा का दुख अनेक प्रकार की सीख देता है। वहीे जब प्रभु राम गंगा पार जाने के लिए नाव मांगते हैं, तो केवट नाव लाने से मना कर देता है और कहता है कि मैंने आपके चरणों की महिमा सुनी है और चरण धोकर ही नाव पर चढ़ाने की जिद्द करता है। यह भाव भी भक्ति में लालच के भावों को प्रकट करता है।






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