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Showing posts from March, 2013

किताब के खुले पन्ने...

किताब के खुले पन्ने...

किताब के खुले पन्ने
फड़फड़ाते पन्ने
कितनी कथाएं
कितने काव्य
कितने नाटक
अपने में सहेजे हुए हैं
इन्हीं पन्नों में कहीं
तुम्हारे संग
मेरा भी अक्स
उभर आता है
कभी कभी
जब
हवा थम जाती है
और
किताबों के पन्ने
गहरी खामोशी अख्तियार कर लेते हैं
तब
मेरे तुम्हारे अक्सों में
बहुतेरे और अक्स
गडमड हो जाते हैं
हवा को थामने वाला
फिर हवा चला नहीं पाता
चला पाता तो
कुछ कर पाता तो...
जरूर करता
पेड़ों को भंभोड़ता
पत्तों को अपनी सांसों से गति देता
ताकि
हवा चले
किताबों के पन्ने फड़फड़ाएं
अक्स
मुस्कराएं



बर्फ पिघल गई...

बर्फ   पिघल  गई... धूप ने  दीवार  को  सहलाया  ...
उसे  मिली  राहत  ...
गौरैया  के  घोंसले  पे
जमी  बर्फ  भी  पिघल  गई  ...
मतवाली  हुई  हवा ...
आशा  के  गीत  गूंज  उठे
... दूर  हुआ  निराशा  का  साया ...!
असबाब में असबाब, एक चंग एक रबाब
आपके सान्निध्य में मन की बातें खुद ब खुद कलम से कागज पर उतरने लगती है। बड़ों ने अपने अनुभवों के इशारों में सच ही कहा है, पुस्तक सदृश्य और कोई मित्र नहीं। इसी तर्ज पर पाठक भी उसी श्रेणी के मित्र हैं जिस श्रेणी में पुस्तक को मित्र माना गया है। मित्रों में दिल की बात तो जुबां पर आती ही है। यहां माध्यम कलम है। बात कागज पर उतरती है। कलाकार, कलमकार की पूंजी और होती ही क्या है ! असबाब में असबाब, एक चंग एक रबाब। बस। हमारा यही संसार है। यही दौलत। कलम। कागज। दवात। यूं चंग डफ सदृश्य मंजीरा लगा हुआ वाद्य होता है। रबाब ऐसा वाद्य होता है जो सारंगी जैसा लगता है। इस साजोसामान से कलाकार, साहित्यकार आपसे, पाठकों से मित्रता का दम भरता है। पाठक भी बखूबी मित्र धर्म निर्वहन करते हैं। संबल प्रदान करते हैं। दिल की बात कागज के माध्यम से पाठक मित्रों तक पहुंचाने की बेमिसाल बानगी हमारे सामने ही है। सूचना और जनसंपर्क विभाग से सेवानिवृत्त अधिकारी एवं संपादक श्री मनोहर चावला जी ने भी दिल की बातें यहां साझा की है। चार फरवरी 2013 के अंक में भी। उन्होंने पत्रकारिता और सेवा अवधि सहित …

पेड़ फिर शाखाहीन होने लगा है....

पेड़ फिर शाखाहीन होने लगा है....
देखते हैं चुपचाप हालात
.... पेड़ फिर शाखाहीन होने लगा है....

जिसे ठूंठ समझते हैं ...
बहते हैं उस कोटर के आंसू ...
देखते हैं चुपचाप हालात
.... पेड़ फिर शाखाहीन होने लगा है....
...
पत्ते तेज हवाओ से झड़ गए हैं ....
नभचरों ने बुन लिया है....
फिर दूर कही एक नीड़...
किसी हरे भरे बरगद क़ी...घनी
कौंपलों के बीच ....
चील कौंवो से बचने के लिए ...
वे भी साक्षी हैं ...
जानते हैं ....

देखते हैं चुपचाप हालात
.... पेड़ फिर शाखाहीन होने लगा है....

...
ठूंठ बनते जा रहे पेड़ के पास ...
तने से निकलते आंसुवो के सिवाय ...
कुछ नहीं बचा ...
आंसू भी निर्दयी लकड़हारा...
गोंद समझकर ले जा रहा है...
..देखते हैं चुपचाप हालात
.... पेड़ फिर शाखाहीन होने लगा है....