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- August 29, 2012

गर्जना होती मचता द्वन्द्व

चारों ओर रेत ही रेत कभी छाते बादल बरसते और... थमती रेत बिजली चमकती मसले बनते गर्जना होती द्वन्द्व मचता बिखरे स्वप्न इकट्ठा ...
- August 21, 2012

बादळ सागै उड़'र बिजली सागै नाचणो / बादल संग उड़कर दामिनी संग नृत्य करना

होंठ माथै पड़ी बिरखा री बूंद भीतर उतार लेवां / बादळ सागै उड़'र बिजली सागै नाचणो / पंछियाँ स्यूं पंख उधारी ले'र हवावाँ रौ कर्जो चुका...
- August 16, 2012

खामोशी गाती : कविता खामोशी गाती हर रोज रूप बदल कर आता कोलाहल कहता कुछ नहीँ खुद किसी से पर हर किसी से बस अपने बारे मेँ कहलाता ... ध्वनि से श्रव्य और दृश्य से अनुभूत काव्य श्रृँगार का प्रादुर्भाव निश्चय ही किसी काल मेँ 21 मार्च को ही हुआ होगा यह दिवस प्रकृति का प्रिय जो है हरी चुनरी से सजी इठलाती धरा पर नवपल्लव, अधखिली कलियाँ, कुलाँचे भरते मृग-शावक, मँडराते भँवरे, पहाड़ोँ पर बर्फ का पिघलना और धूप की बजाय छाँव मेँ सुस्ताते वन्यजीवोँ के गुँजन से जो अनुभूति हुई उसे आदि कवि खामोशी का गीत = "कविता" की सँज्ञा न देता तो "अहसास" प्राण विहीन हो पाषाण युग से आगे का यात्री नहीँ बन पाता सँवेदनाएँ पाषाण रह जाती प्रकृति कविता न गाती तो मानवता कैसे मुस्काती !

- August 13, 2012

बेड़ियां टूटी या प्रतीक बनाए कृष्ण तेरी लीला में रहस्य समाए

बेड़ियां टूटी या प्रतीक बनाए कृष्ण तेरी लीला में रहस्य समाए इतिहास है या दंतकथा हे कृष्ण तू ही बता बेड़ियां टूटी या प्रतीक बनाए कृष्ण तेरी ली...
- August 10, 2012

फिर से बचपन पा जाना...

होंठों पर टपकी बरसात की बूंदों को अपने में समेट  लेना / बादल संग उड़कर दामिनी संग नृत्य करना / पंछियों के पंख उधर मांग कर हवाओं का ऋण चुकाना...
- August 08, 2012

करतार सिंह / सिन्ध ही नहीं पूरे हिन्दुस्तान के बाल-गोपालों के बचपन के दिन अभी खत्म भी नहीं हुए थे कि उन पर जिन्दगी की जिम्मेवारियों का पहाड़ लाद दिया गया

करतार सिंह / सिंधी से अनूदित उपन्यास का अंश करतार सिंह : हां यह सच है यार। मेरे जन्म से भी 10-12 साल पहले जन्मा षहीद हेमू कालाणी सन् 1942 ...
- August 04, 2012

नींद में जागा-जागा- सा...

चांद मुस्कराता रहा... आधी रात को  जैसे ही रंगों से घिरे मुस्कराते चांद को देखा, कलर रिंग से घिरे चांद को... देखने के मुबारक मौके पर इ...
- August 03, 2012
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