औरों से हटकर सबसे मिलकर
bahubhashi.blogspot.com
15 दिसंबर 2025 सोमवार
खबरों में बीकानेर
✒️@Mohan Thanvi
जगह-जगह धुंआते राजनीतिक चूल्हे
युगपक्ष और कंचन केसरी का धन्यवाद
Rajnitik chulhe
kahawaton ke iene 4
जगह-जगह धुंआते राजनीतिक चूल्हे
अपनी खिचड़ी अलग पकाना
कहावतों के आइने 4
- मोहन थानवी
खिचड़ी एक ऐसा पौष्टिक आहार है जो सदैव ऊर्जा ही प्रदान करता है। संभवतः इसीलिए हम लोग हर क्षेत्र में अपनी-अपनी खिचड़ी पकाने के लिए जतन करते नहीं थकते। विशेष रूप से राजनीतिक जगत में तो जगह-जगह चूल्हे धुंआते हुए दिखते हैं। जिन पर लगता है लोग अपनी-अपनी खिचड़ी बना रहे हैं। ऐसा मानने में कोई गुरेज नहीं करना चाहिए कि जगह-जगह धुंआ फैलाते ऐसे चूल्हों पर सत्ता पक्ष और विपक्ष के लोग अपनी-अपनी खिचड़ी पकाने में जी-जान से लगे हुए हैं। किसी किसी चूल्हे पर वोट चोरी के रूप में खिचड़ी में मसाला मिलाया जाता दिखता है तो कहीं मातृभूमि वंदन के लिए शक्ति प्रदाता उद्घोष वंदे मातरम श्रवण से बचने के लिए पलायन की रैसिपी प्रयुक्त की जाती है। लोकतंत्र के प्रमुख विशाल सदन से चर्चा के चलते पलायन करने के प्रकरणों को लोग भुला तो न सकेंगे। इससे इतर स्वयं कुर्सी पाने और किसी को कुर्सी से वंचित रखने के लिए भी बहुत सी तरह से खिचड़ी पकाई जाती है। कुर्सी की आंच से पकती ऐसी खिचड़ी के एकाधिक दृष्टान्त तो लगभग हर शहर के लोगों ने कभी न कभी देखे ही होंगे। जैसे की किसी समारोह में किसी एक जन प्रतिनिधि के पहुंचने से पहले ही आयोजन का समापन कर देना या किसी जन प्रतिनिधि के लिए बैठने तक की उचित व्यवस्था समय रहते नहीं करवाना। बार-बार सामने आती ऐसी नजीरों के पीछे आम आदमी तो किसी तरह की खिचड़ी पकते हुए ही महसूस करता है। उधर, प्रदेश भर में शहर दर शहर महीनों तक सड़कों की दयनीय हालत बनी रहने पर भी फुसफुसाहट है की चुनावी खिचड़ी पकाने की मंशा से प्रक्रिया की आंच को गर्माया नहीं जा रहा था। चुनाव की बात चली है तो भूलना मना है कि राजनीतिक जगत में लोकतंत्र के महान पर्व के संदर्भ में दीप (दीपक) महज चुनाव चिह्न के रूप में देखा जाता होगा मगर हमारी महान संस्कृति में दीप की अनुपम महत्ता है। दीप यानी अंधकार को दूर करने के लिए प्रज्वलित किया जाने वाला दीप । दीप का आध्यात्मिक अर्थ ज्ञान का दीप प्रज्वलित करना भी है । लेकिन कतिपय लोग दीप की ऊर्जा से अपनी-अपनी खिचड़ी बनाने की कलाकृति राजनीतिक चूल्हे में पकाने लगें तो...! ऐसा ही कुछ इन दिनों पहाड़ी पर दीप प्रज्वलित करने की हजारों वर्ष से निर्वहन की जा रही परंपरा को लेकर किया जाता प्रतीत होता है। अनेकार्थी दीप हमारी परंपराओं का सिरमौर है। दीप की महिमा न केवल गीतों में गाई गई है वरन पुराणों में भी ज्ञान के दीप संबंधित सीख आने वाली पीढियों के लिए संरक्षित की गई है । बावजूद इसके कुछ लोग अपनी-अपनी खिचड़ी पकाने की मंशा से हमारी परंपराओं पर किसी सोची समझी साजिश के तहत कुठाराघात करने पर आमादा दिखते हैं। ऐसे लोग पंच परमेश्वर पर भी महा अभियोग के लिए उद्यत होने से नहीं हिचकते। अपनी-अपनी खिचड़ी पकाने को तत्पर ये लोग भारतीय हिंदी कथा साहित्य में 'कथा सम्राट' से अलंकृत किए जाने वाले मुंशी प्रेमचंद की न्याय पर प्रसिद्ध और प्रासंगिक नजीर कहानी "पंच परमेश्वर" को भूल गए लगते हैं। यूं लगता तो ऐसा है कि अपनी खिचड़ी पकाने के चक्कर में ऐसे कुछ लोग अपनी मातृभूमि को भी बिसराकर पड़ोसी देश के शहरों में जा बसते हैं। ऐसे में देशभक्तों को चिंता इसलिए होती है कि जो लोग अपनी अपनी खिचड़ी पकाने के लिए अपनी मातृ भूमि तक को छोड़कर इधर घुसपैठिए बन आ बसे है वे लोग हमारी मातृभूमि के लिए कैसी भावना रखते होंगे। वे लोग यहां अपनी दूषित खिचड़ी ना पका सकें इसके लिए उन्हें वापस सीमा पार खदेड़ना ही देश हित में होगा।






यहां व्यक्त कीजिए - खबर आपकी नजर में...