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मुंशी प्रेमचंद साहित्यिक कौशल के प्रतीक
श्रीडूंगरगढ़ में हुई संगोष्ठी
श्रीडूंगरगढ़। झमाझम बरसात के दौरान राष्ट्र भाषा हिन्दी प्रचार समिति के सभागार में मुंशी प्रेमचंद की प्रासंगिकता विषय पर संगोष्ठी सम्पन्न हुई। संगोष्ठी में मुख्य वक्ता के रूप में बोलते हुए डाॅ चेतन स्वामी ने कहा कि मुंशी प्रेमचंद एक शताब्दी के बाद भी इसलिए जीवंत और प्रासंगिक हैं, क्योंकि वे मानव के संकटों के रूप में उसके दुखों तथा जीवन की विडम्बनाओं को समुचित समाधान के साथ प्रस्तुत करते हैं। वे किसी एक वाद को ही अनुषंग नहीं बनाते। सारे दार्शनिक भावों का सम्मुचय प्रेमचंदजी के विशद लेखन में नजर आता है। विषय के उपचार की आवश्यकता को समझकर प्रेमचंद जी ने विधा का चयन किया करते। इसलिए वे लेखन में निर्विवाद सफल रहे हैं। उनके 15 उपन्यास और तीन सौ कहानियों के विशाल वितान के हजारों पात्र पाठकों के हृदय पर अंकित होकर रह जाते हैं। ऐसी कुशलता विरल लेखकों के पास होती है। प्रारंभ में कथाकार श्री भगवान सैनी ने विषय प्रवर्तन करते हुए प्रेमचंद जी के साहित्य को जनोपयोगी तथा साहित्य के क्षेत्र में प्रेरणीय बताया। सत्यनारायण योगी ने उनकी कुछ श्रेष्ठ कहानियों का उल्लेख करते हुए कहा कि बाल्यकाल में पढ़ी हुई उनकी कहानियों की अनेक घटनाओं एवं पात्रों से पग पग पर रूबरू होते रहते हैं। समिति के उपाध्यक्ष बजरंग शर्मा ने कहा कि कथा साहित्य पढ़ने का संस्कार हमें प्रेमचंदजी से मिलता है। पत्र वाचक साहित्यकार सत्यदीप ने कहा कि प्रेम जन सरोकारों के लेखक हैं। आज के किसान आंदोलन में अभिव्यक्त दुश्वारियों को प्रेमचंद की कहानियों में कथित संकटों के साथ तुलना करके देखते हैं तो लगता है कि प्रेमचंद कितने दृष्टि सम्पन्न लेखक थे। उन्होंने जिन संवेदनाओं को प्रकट किया, कमोवेश आज भी वे अपनी विकरालता के साथ उपस्थित हैं।
समिति के अध्यक्ष श्याम महर्षि ने अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में कहा कि मुंशी प्रेमचंद भले ही पुनर्जागरण काल उपरांत साहित्य में आए, पर उन्होंने हिन्दी कथा साहित्य को अय्यारी और तिलस्मी साहित्य की कारा से बाहर निकालकर यथार्थ की ठोस भूमि प्रदान की। अनेक युगों तक साहित्य जगत उनका आभारी रहेगा। कार्यक्रम का सफल संचालन साहित्यकार रवि पुरोहित ने किया। रवि ने संस्था द्वारा आगामी दिनों में मनाए जाने वाले हीरक जयंती महोत्सव की रूपरेखा प्रस्तुत की।संगोष्ठी में नगर के साहित्य प्रेमी रामचन्द्र राठी,तुलसीराम चौरड़िया, ओमप्रकाश गुरावा, गोपीलाल नाई, विजय महर्षि, भंवर भोजक, बालकृष्ण महर्षि, हीरालाल सांखला आदि उपस्थित थे।
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