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पर्व के मर्म को समझें-साध्वीश्री शशि प्रभा
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संवत्सरि पर सामूहिक प्रतिक्रमण, क्षमापना और देव मंदिर दर्शन
पर्व के मर्म को समझें-साध्वीश्री शशि प्रभाजी म.सा. मणिप्रभ
बीकानेर, 2 सितम्बर। जैन श्वेताम्बर खरतरगच्छ संघ के गच्छाधिपति आचार्यश्री जिन मणि प्रभ सूरिश्वरजी म.सा. की आज्ञानुवर्ती प्रवर्तिनी वरिष्ठ साध्वीश्री शशि प्रभा म.सा.ने सोमवार को रांगड़ी चैक के सुगनजी महाराज के उपासरे ढढ्ढा कोटड़ी में कल्पसूत्र के मूल प्राकृृत भाषा के पाठ का वांचन किया तथा श्रावक-श्राविकाओं के साथ चैत्य परिपाटी के तहत जैन मंदिर में दर्शन किए । उन्होंने तथा उनकी सहवृृति साध्वियों ने भी अलग-अलग स्थानों पर कल्पसूत्र के मूल पाठ का वांचन किया।
साध्वीश्री शशि प्रभा म.सा. ने प्रवचन में कहा कि पर्युषण व संवत्सरि जैन धर्म के महान पर्व है। पर्व को केवल कुछ दिन तक ही सीमित नहीं रखें, पर्व की साधना, आराधना व भक्ति को नियमित दिनचर्या का अभिन्न अंग बनाते हुए नित्य आत्म व परमात्म की साधना समर्पित रहे। उन्होंने कहा कि काम,क्रोध,लोभ, मान व माया से कर्मबंधन होते है। हमें आचार, विचार, भाव रखें। संवत्सरि प्रतिक्रमण से पहले से पहले अंतःकरण से एक दूसरे से क्षमायाचना करें।
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डाॅ.बुलाकी दास कल्ला ने नाहटा चैक के आदिनाथ भगवान के मंदिर में जैन श्रावक-श्राविकाओं के साथ चैत्य परिपाटी के तहत दर्शन किए तथा पर्युषण और संवत्सरि पर्व को जैनधर्म का अनुकरणीय पर्व है। इस पर्व से सभी जाति, वर्ग व समुदाय को प्रेरणा लेकर आपसी कटुता, वैमन्स्य को त्यागकर सद््भाव व स्नेह तथा आत्मीय भाव से रहना चाहिए। जैन धर्म के 24 तीर्थंकर भगवान महावीर ने सत्य, अहिंसा, अचैर्य, अपरिग्रह व ब्रह्मचर्य आदि सिद्धान्त युगों-युगों तक सर्व समाज के लिए प्रेरणादायक रहेंगे। भगवान महावीर के सिद्धान्त धार्मिक-आध्यात्मिक के साथ वैज्ञानिक और चराचर प्राणियों की रक्षा, मन, वचन व काया की शुद्धि के लिए अनुकरणीय है। उन्होंने साध्वीवृृंद से महामांगलिक पाठ सुनकर आशीर्वाद लिया।
तपस्या की अनुमोदना-साध्वीश्री शशि प्रभा म.सा ने शिखा पारख की 10दिन की तपस्या की अनुमोदना की तथा वासक्षेप देकर आशीर्वाद दिया। श्रावक-श्राविकाओं ने भी शिखा के साथ पर्युषण व संवत्सरि पर्व के दौरान एक से नौ दिन तक उपवास, आयम्बिल, बेला, तेला, अट्ठाई व नौरंगी तपस्या करने वाले साधकों की अनुमोदना जयकारों से की।



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