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शुद्ध भाव से क्षमायाचना से आंतरिक खुशी-साध्वीश्री शशि प्रभाजी म.सा. मणिप्रभ
बीकानेर, 4 सितम्बर। जैन श्वेताम्बर खरतरगच्छ संघ के गच्छाधिपति आचार्यश्री जिन मणि प्रभ सूरिश्वरजी म.सा. की आज्ञानुवर्ती प्रवर्तिनी वरिष्ठ साध्वीश्री शशि प्रभा म.सा.व उनकी सहवृति साध्वियों से बुधवार को अनेक तप साधकों और श्रावक-श्राविकाओं ने खमतखामणा करते हुए आशीर्वाद लिया।
आशीर्वाद लेने वालों में पर्युषण पर्व के दौरान नौरंगी (एक से नौ दिन की तपस्या), उपवास, बेला, तेला, एक से ग्यारह दिन की तपस्या करने वाले शामिल थे। शिखा पारख ने 11 दिन की तपस्या का पारणा कर आशीर्वाद लिया वहीं। सुनीता गोलछा-नवीन गोलछा (पति-पत्नी) व पुत्री प्राची गोलछा ने एक साथ तपस्या कर साध्वीश्री के सान्निध्य में बीकानेर में नया रिकार्ड बनाया है। नवीन गोलछा छह दिन तक व उनकी पत्नी व पुत्री ने आठ दिन की) तपस्या की। तपस्या के दौरान इस परिवार के सदस्यों ने आहार के नाम पर केवल गुनगुना जल ही ग्रहण किया।
ढढ्ढा चौक के ’’इन्द्रलोक’ में साध्वीश्री से क्षमायाचना ’’खमतखामणा’’ करने वालों को आशीर्वाद दिया तथा मंगल पाठ सुनाया। साध्वीश्री ने इन्द्रलोक में प्रवचन में कहा कि क्षमायाचना में दिखावा, आडम्बर व केवल शिष्टाचार नहीं होना चाहिए। शुद्धभाव व मन और अंतःकरण से क्षमायाचना करने से आत्मा व मन हल्का होता तथा आंतरिक खुशी मिलती है। उन्होंने कहा कि जैन श्रमण धर्म व संस्कृति में पर्युषण व संवत्सरि... 👇👇👇
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.... दोनों महानपर्व है । पर्व हमें कषायों व कर्म बंधनों पर नियत्रण करते हुए आत्मशोधन, आत्म चिंतन व आत्म कल्याण का संदेश देता है। क्षमायाचना ’’मिच्छामी दुक्कडम्’’ बीते समय में मन,वचन व कर्म से परोक्ष-अपरोक्ष रूप् से किसी को मानसिक आघात पहुंचा हो या कोई ठेस लगी हो तो विनयपूर्वक सभी आत्मीय पारिवारिकजनों, जिनसे रोजमर्रा में कार्य पड़ता है अपने नौकर-चाकर व अन्य कार्मिकों व मिलने वालों से भी नम्र भाव से क्षमायाचना (खमतखामणा) करनी चाहिए। क्षमायाचना के बाद फिर किसी तरह का वैर वैमन्स्य, राग-द्वेष, ईर्ष्या-घृणा आदि रखने से अधिक भारी पापों का बंधन होता है। यह बंधन घोर नारकीय जीवन तक ले जाने वाला होता है।
देह मुक्त व देव युक्त बनें- ढढ्ढा कोटड़ी में साध्वीश्री शशि प्रभा म.सा. की शिष्या सावी संवेज्ञ प्रज्ञा ने बुधवार को प्रवचन में कहा कि दुलर्भ मानव जीवन का सदुपयोग करें। गुरु व परमात्मा की वाणी व आज्ञा को शिरोधार्य करते हुए अपने भीतर के भावों का अवलोकन करतें है,,जीवन को देह मुक्त व देव युक्त बनावें।




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