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26 दिसंबर 2025 गुरुवार
खबरों में बीकानेर
✒️@Mohan Thanvi
ऐसे बड़बोले स्वयंभू नेता क्या जानें तलवार का घाव भर जाता है, पर जुबान का नहीं
ऐसे बड़बोले स्वयंभू नेता क्या जानें तलवार का घाव भर जाता है, पर जुबान का नहीं
बड़ी पंचायत के अंगने में ऐसे माननीयों का क्या काम...
छोटा मुँह बड़ी बात
कहावतों के आइने - 5
- मोहन थानवी
देश की सबसे बड़ी पंचायत ( संसद ) का सत्र एक दिन पूर्व ही हंगामें के साथ अपनी पूर्णता को पा चुका है । इस सत्र में छोटा मुंह बड़ी बात सदृश्य बहुत-सी नजीरें सामने आई । माननीयों की कुछ हरकतों से आमजन को हैरानी के साथ-साथ अपने चुने हुए कतिपय प्रतिनिधियों के प्रति शर्म भी महसूस हुई । जैसे की बड़ी पंचायत परिसर में श्वान को लेकर बड़े बोल बोले गए । ई-सिगरेट से भी सद्भाव भरा वातावरण बड़बोलों के कारण किसी हद तक दूषित हुआ । इससे इतर आम जन जीवन से जुड़े प्रदूषण संबंधित बड़ा मसला चर्चा से वंचित रह गया।
आमजन अब इस बात को अच्छी तरह से समझने लगा है की सत्ता में कोई भी दल क्यों ना हो, उसके सदस्य एक चुप सौ सुख का मंत्र अच्छी तरह से जपते ही होंगे। ऐसी चुप्पी के सबब से ही मीडिया के विभिन्न प्लेटफ़ॉर्म, राजनीतिक जगत और आमजन में संसद में प्रदूषण पर चर्चा न हो पाने का मलाल साफ नजर आता है। अफसोस तो उन लोगों के अनर्गल बोलों पर भी होता है जो संप्रदाय विशेष से जुड़ी किसी बात पर जिन्हें जीभ संभाल के बोलना चाहिए उस पर वे बार-बार मुंह खोल कर अतार्किक ही बोलते हैं। इससे उलट भारतीय होने के नाते जहां उन्हें अनिवार्य रूप से तर्क सहित बोलना ही चाहिए वहां वह चुप्पी साथ लेते हैं, जैसे की बांग्लादेश में भारतीय संप्रदाय विशेष की दुर्दशा पर ऐसे चेहरों ने अपना मुंह कभी नहीं खोला। लेकिन वक्तव्य देते हुए या अपनी टिप्पणी करते हुए अथवा किसी विषय विशेष पर हुई गतिविधियों को लेकर प्रतिक्रिया देते समय, टीवी न्यूज़ चैनलों पर राजनीतिक जगत के ज्वलंत मुद्दों को लेकर बहस के दौरान आम जन के समक्ष बड़े-बड़े दलों के छोटे-छोटे चेहरे ऐसी ऐसी बड़ी-बड़ी बातें बोल देते हैं की टीवी देखने वाले उनकी बुद्धि पर तरस खाते दिखते हैं। हालांकि ऐसे बोल बोलने वाले भलीभांति जानते-समझते हैं कि बात-बात के हाथी पाँव होते हैं। यानी अच्छी बात के बड़े लाभ तो बुरी बात से बड़े नुकसान सामने आते हैं। विडम्बना तो यह है कि यदाकदा ऐसे लोगों के मुंह से ऐसी बड़ी बातें सुनाई दे जाती हैं, जिन पर दर्शक तो लानत भेजते हैं लेकिन बार बार कहे जाने के बावजूद बोलने वाले अपने छोटे से मुंह से क्षमा शब्द का उच्चारण तक नहीं करते । संसद के सत्र के दौरान आम जन तक कुछ ऐसे ही वाकये पहुंचे जिनमें बोलने वालों ने आस्था संस्कृति और परंपराओं को भी दरकिनार करते हुए बड़ी बातें बोल दी । जैसे की करोड़ों की जनसंख्या में से तीन चौथाई से अधिक लोगों को कभी भी पसंद ना आने वाली होलिका दहन और दाह संस्कार से प्रदूषण होने की बात । यह बात सभ्य समाज के किसी भी इंसान को पसंद नहीं आ सकती। कुछ अति नरमपंथी ऐसी बातों को हलके में लेते हुए कह सकते हैं कि जबान ही तो है, हाथ-पैर थोड़ी है। मानो वे जानते ही नहीं कि तलवार का घाव भर जाता है, पर जुबान का नहीं। एक तथाकथित नेता ने तो जन-जन की आस्था के केंद्र राम के समुदाय पर ही सवाल उठा दिया। हम लोग भूले नहीं हैं कि इससे बहुत पहले एक प्रमुख राजनीतिक दल ने तो राम के अस्तित्व पर ही प्रश्न चिन्ह लगा दिया था ।
उधर, मनरेगा की जगह जी राम जी को लाए जाने पर तो छोटा मुंह बड़ी बातें अपनी हद से भी बाहर जाती दिखाई दी। अपने स्वयं के व्यक्तित्व एवं पद की गरिमा को धूमिल करने वाले बोल आम जन को कतई पसंद नहीं आते। लोग जानते हैं कि थोथा चना बाजे घना। इसीलिए छोटा मुंह बड़ी बात कभी भी पसंद नहीं की जाती। व्यापार जगत हो या राजनीतिक क्षेत्र सभी जगह पहले पायदान से कार्य करते हुए अपनी क्षमता से शिखर तक पहुंचने वाली शख्सियतों की कमी नहीं है। छोटे कद से ऊंचा कद हासिल करने वाले अपना शहर हो, राज्य अथवा राष्ट्रीय या विश्व स्तर पर अपनी चमक बनाए हुए हैं। ऐसी शख्सियतें कभी भी अपने कद से ऊंची आवाजें नहीं निकालतीं।
युगपक्ष और कंचन केसरी का धन्यवाद 🙏👇






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