खबरों में बीकानेर
खुद हमें खबर नहीं... हमारे मन को किसी ने पढ लिया...!

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— Mohan Thanvi / खबरों में बीकानेर 🎤 🌐 (@Mohanthanvi) February 23, 2025
खुद हमें खबर नहीं... हमारे मन को किसी ने पढ लिया...!
- मोहन थानवी
विचार पढ कर आप कुछ लोगों के मन की बात जानने या समझने की दावेदारी अवश्य कर चुके होंगे । कुछ मुखौटे मुस्कराए होंगे तो बहुत से दावे सच भी हुए होंगे। बधाई । साथ ही याद भी रखें, हमारे विचार अन्य लोग भी तो पढ लेते होंगे ! प्रकृति प्रदत्त इस कला-गुण का विकास तमाम अन्य कला-विधाओं की तरह ही अध्ययन मनन और अभ्यास से सँभव है। अनुभव बोलता है। आधुनिक युग साहित्य की कथा कहानियों से इतर गीता आदि ग्रंथ, पौराणिक संदर्भ, लोककथाओं से मिलने वाली बानगी, चीन में प्रचलित ड्रेगन आदि चेहरों से व्यक्ति की मनोवृति जानने -बताने की विधा बताती है, मन को पढा जाता रहा है। मनोविज्ञान जानने समझने वालों का कहना कुछ ऐसा ही है। विचारों को खुशबू की तरह सूँघ कर व्यक्ति के मानस में झाँकना नई बात या करामात नहीं है।
यही वजह है कि आपकी खुशी में शामिल होने वाले बेशुमार लोगों में से एक दो या चंद चेहरों पर ओढाए मुखौटों को आपकी दृष्टि भेद लेती है और आप दावे से अपनी बात कहते हैं - फलाँ फलाँ आदमी मन के काले हैं । उनके मन में मैल है। उसके चेहरे से पता चलता है कि वो क्या सोच रहा है या वो क्या करेगा । यहाँ तक कि खतोकिताबत से, तस्वीर से, बोलने के लहजे, कहने की शैली से, आपकी लेखनी से, यहाँ तक कि फेसबुक पर एक्टिविटीज से भी हम आप अपने अव्यक्त विचार भी व्यक्त कर देते हैं और खुद हमें भी खबर नहीं होती कि हमारे मन को किसी ने पढ लिया है। ठीक वैसे ही जैसे मैंने और आपने किसी के मानस को बखूबी बाँचा है । इसी अनुभूति को आधुनिक विज्ञान की मदद से समाज और राष्ट्र हित में उपयोग करने के लिए शोध किए जा रहे हैं। मस्तिष्क को पढने की विधा तलाशी जा रही है।






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