*खबरों में बीकानेर*
चुनाव : पर्दे के पीछे - छुपी महंगाई चाय नाश्ते के खर्च में बाहर आ गई
- मोहन थानवी
विधानसभा चुनाव के चलते महंगाई की चर्चा भले ही ना हो लेकिन महंगाई ने अपनी छाप चाय नाश्ते में छोड़ दी है। और आम मतदाता कह रहा है - ऐसा पर्दे के पीछे नहीं, पर्दे के सामने हुआ। छुपी महंगाई चाय नाश्ते के खर्च में बाहर आ गई।
दरअसल प्रत्याशियों के खर्च को देखते हुए इसकी सीमा 39% तक बढ़ाकर 28 से 40 लाख रुपए कर दी गई है। इस पर भी प्रत्याशियों को राहत कहां !! वे तो इस राशि को भी बौना समझ रहे हैं। यदि ऐसा नहीं है तो फिर बताइए प्रचार कहाँ दिखाई दे रहा है। नहीं के बराबर ही प्रचार हो रहा है ना। क्योंकि प्रचार कार्य भी महंगा हुआ है यानी अब नेताओं को पता चल रहा है कि महंगाई बढ़ गई है। तभी तो दीवारें रंगी जा रही है ना अखबारों के हर पेज पर प्रत्याशी मुस्कुराते दिखाई दे रहे हैं। और न ही सोशल मीडिया पर प्रचार की तूती बोल रही है।
आज निर्वाचन आयोग का अंकुश ना हो तो कतिपय प्रत्याशी एक-दो दिन में ही 40 लाख से अधिक खर्च करके दिखा सकते हैं। ऐसा हम नहीं कहते बल्कि वह मतदाता कह रहे हैं जिनकी पर्दे के पीछे नहीं बल्कि ठीक सामने है।
सीधी सी बात है - ऐसा निर्वाचन आयोग के जनहित में उठाए सख्त कदमों की वजह से है।
खर्च की सीमा पर नजर रखने के लिए अपनाई गई प्रक्रिया निश्चित रूप से कारगर दिख रही है। पेड न्यूज सहित चुनावी प्रचार पर हो रहे व्यय को अंकुश में रखना संभव दिखाई देने लगा है।
बीते चुनाव की याद करें तो तब 28 लख रुपए व्यय सीमा थी।इसके बावजूद आज की तुलना में तब खूब प्रचार होता दिखाई देता था। ऐसा कैसे संभव था? निश्चय ही तब पर्दे के पीछे तय सीमा से अधिक खर्च हो रहा था।
बढ़ती महंगाई और राजनीतिक पार्टियों की मांग के बाद चुनाव आयोग ने राजस्थान में होने वाले विधानसभा चुनाव में उम्मीदवार को चुनाव-प्रचार और चाय-नाश्ते पर पहले से अधिक खर्चा करने का मार्ग तो दे दिया साथ ही नया बैंक खाता खोलकर इस खाते से ही चुनावी खर्च और लेनदेन करने की बाध्यता भी सामने रख दी। और आम मतदाता कह रहा है - ऐसा पर्दे के पीछे नहीं, पर्दे के सामने हुआ। छुपी महंगाई चाय नाश्ते के खर्च में बाहर आ गई।




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