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ड्रग केस : मिल गई जमानत, ये तो एक्सरे दिखने लगा, जमानत में इंटरेस्ट तो एक बहाना है,
मकसद तो युवाजगत को जगाना है... आभासी दुनिया का आभार मानेगी युवा पीढ़ी...!
ये लो जी, जमानत पर तो निर्णय आ गया। मिल गई आर्यन समेत 3 को जमानत। लेकिन आर्डर कापी के मिलने से पहले जेल से बाहर नहीं आ सकते। अब यूथ वर्ल्ड को जागकर दीमक को साफ करना है।
देश दुनिया में इन दिनों ड्रग्स केस की चर्चाएं जोरों पर है। मीडिया के लगभग सभी माध्यमों में इस केस के बारे में लगभग पल-पल की खबर प्रसारित हो रही है। यूं एक बार तो लगता है कि यह किसी एक चेहरे को लेकर खबर है। लेकिन ज्यूं ज्यूं तथाकथित तथ्य और वकीलों की दलीलों से निकलते तथ्य सामने आ रहे हैं त्यूं त्यूं आभास होने लगता है कि ड्रग माफिया के फैले हुए जाल का एक्स-रे सामने आ रहा है। ऐसे ऐसे नाम इंवॉल्व होते दिख रहे हैं कि सोचकर युवा पीढ़ी के भविष्य की चिंता और अधिक गहरा जाती है। दिल से दुआ करते हैं कि मीडिया की यह पल-पल खबर दिखाने की मुहिम रंग लाए। और छिपे चेहरे सामने आएं। ताकि देश का युवा उनके जाल में हंसकर अपने भविष्य को बिगड़ने से बचा सके।
किंगार्यन : आभासी दुनिया के दो चेहरे - सिनेमा और मीडिया
अनैतिक कार्य करने के किसी आरोपी को जमानत मिले ना मिले इसमें आमजन को कितनी रूचि हो सकती है?
सिक्के के दो पहलू
प्रोफेशनल - कमाऊवादी
तथाकथित रूप से प्रोफेशनल मीडिया
सिनेमाई किंग के पुत्र
उनकी तिजोरियां भरती रहें
अपराध तो बहुत से हुए
kingaaryan : aabhaasee duniya ke do chehare - sinema aur meediya
anaitik kaary karane ke kisee aaropee ko jamaanat mile na mile isamen aamajan ko kitanee roochi ho sakatee hai?
Kingaryan: The Two Faces of the Virtual World - Cinema and Media
How much interest can the general public be in not getting bail for an accused of committing immoral acts?
अनैतिक कार्य करने के किसी आरोपी को जमानत मिले ना मिले इसमें आमजन को कितनी रूचि हो सकती है यह विचार करने की बात है। कितनी बड़ी संख्या में लोगों को इस विषय में रूचि हो सकती है यह भी सोचने की बात है। क्या पूरा देश इस बात में रुचि रखता है? यह भी एक बार नहीं हर बार, बार बार सोच विचार करने की बात है। लेकिन आभासी दुनिया में रहने वाले कतिपय लोगों को इन सवालों से क्या लेना और क्या देना?
आभासी दुनिया इंटरनेट की दुनिया को कहना शुरू किया गया। लेकिन सिनेमा और कतिपय मामलों में मीडिया के नाम पर बाजार जमाने वाले, जिसे हम विशुद्ध प्रोफेशनल सिनेमा व प्रोफशनल मीडिया की नकाब पहने चेहरे कह सकते हैं, के भी आभासी होने का आभास बीते कुछ वर्षों से होने लगा है। कोरोना काल के चलते इन दिनों सिनेमा के यथार्थवादी कलात्मक स्वरूप और विशुद्ध रूप से व्यापारिक रूप को अभी हम पूरी तरह से नहीं देख पा रहे क्योंकि निर्माण कार्य में अवरोध आ गया।
सिक्के के दो पहलू
इससे पहले कि हम सिक्के के एक पहलू पर बात करें, हम दूसरे पहलू को भी छू लेते हैं जो वास्तव में विराट स्वरूप में है। जो कि बहुत अच्छा कार्य करके अपने पाठकों अपने दर्शकों और अपने श्रोताओं को ना केवल अपने साथ जोड़े रखता है बल्कि समाज के लिए और देश की प्रगति के लिए प्रेरित भी करता है। ऐसे बहुत से कार्यक्रम बहुत से टीवी चैनलों पर बनाए जाते हैं और दिखाए जाते रहे हैं और दिखाएं भी जा रहे हैं। मनोरंजन के कार्यक्रमों में भी संदेश छुपे होते हैं और बखूबी सपरिवार बैठकर देखने लायक और दिखाए जाते रहे हैं और दिखाएं भी जा रहे हैं। लेकिन...इसके मुकाबले आभासी दुनिया में सोशल मीडिया का एक छोटा सा हिस्सा और कुछ टीवी चैनलों को भी हम शामिल करते हुए कह सकते हैं कि वह भी सिनेमाई तरीके से दर्शकों और श्रोताओं के हवाले से यह कहकर ऐसे विषयों की खबरें हैं परोसने लगे हैं जिन पर समाज के बुद्धिजीवी सवाल खड़े करते हैं।
सिनेमाई किंग के पुत्र
बानगी के तौर सिनेमाई किंग के पुत्र यानी किंगार्यन से जुड़ी कवरेज याद करें। हालांकि पूर्व में भी व्यक्तिवादी खबरों पर ऐसे मुद्दे उठ चुके हैं। भ्रष्टाचार और अपराध की दुनिया में जो कुछ होता है वह समाचारों के माध्यम से लगभग दर्शकों श्रोताओं और पाठकों तक पहुंचता है। कह सकते हैं कि अधिकांश मामलों में प्रिंट मीडिया फिर भी चयन करके ही समाचारों को पाठकों तक पहुंचाता है। और संपादन पर भी विशेष बल दिया जाता है। हालांकि संपादन तो टीवी चैनलों में भी होता है और बखूबी होता है। लेकिन हम सभी टीवी चैनलों की बात नहीं कर रहे। हम कतिपय ऐसे चैनलों की बात कर रहे हैं जहां विषय विशेष और व्यक्ति विशेष को लेकर ऐसी खबरें चला दी जाती है कि दर्शक तौबा तौबा करते हैं। कई मर्तबा अपवाद छोड़ दे तो लगभग सभी चैनलों पर एक ही विषय की खबरें दिन भर घुमा फिरा कर दिखाई जाती रहती है। इन दिनों अक्टूबर 2021 के आखिरी सप्ताह में भी हम यह आभास कर रहे हैं कि बड़े सितारे के पुत्र को लेकर दिनभर खबरें चलती रहती है। जबकि मामला अदालत में है। अदालत की कार्रवाई चल रही है। और अदालत की कार्रवाई को पाठकों दर्शकों श्रोताओं तक पहुंचाना समाचार जगत का कार्य हो सकता है या नहीं यह जुदा बात है लेकिन बात वही है कि अपराध विशेष के किसी आरोपी को विशेष बनाकर प्रस्तुत करते रहना क्या उचित है?
अपराध तो बहुत से हुए
अपराध तो बहुत से हुए। बहुत से लोगों ने किए। उनमें से समाचार जगत के कतिपय चयनित चैनलों ने अथवा समाचार पत्रों ने अथवा सोशल मीडिया पर अपनी लेखनी का कमाल दिखाने वालों ने पाठको दर्शकों तक पहुंचाया। लेकिन आभासी दुनिया के इस चेहरे को हम नहीं भूल सकते जो जनता को, दर्शकों को यह पसंद है इसलिए हम ऐसा दिखाते हैं ऐसा कहकर एक व्यक्ति को जो आरोपी है उसके बारे में बहुत सारी हेडलाइंस बनाकर परोसते ही जाना। बात सिनेमा की करें तो कलात्मक सिनेमा और प्रोफेशनल सिनेमा की बातें बहुत हो चुकी। कलात्मक सिनेमा हमें रचनात्मक होने का प्रमाण देती है। सामाजिक मुद्दों पर गहन मंथन के लिए प्रेरित करते हैं। समस्या के साथ समाधान सुझाती है।
उनकी तिजोरियां भरती रहें
वहीं प्रोफेशनल मीडिया और प्रोफेशनल सिनेमा जनता की मांग के अनुसार प्रस्तुति की आड़ में ऐसा कुछ परोसती रहती है जिससे उनकी तिजोरियां भरती रहें। यह आरोप नहीं या आलोचना भी नहीं। यह समालोचना भी नहीं। यह एक विमर्श है। इस विमर्श से किसी को ठेस पहुंचती है तो स्पष्ट कर दूं कि ऐसा मेरा कोई इरादा नहीं कि किसी को ठेस पहुंचाऊं। या किसी को कटघरे में खड़ा करके सवाल-जवाब शुरू करूं। मैं केवल अपने विचार को सामने रख रहा हूं। और इस विचार में जो तथ्य है वह मंथन के लिए खुद मंथन करते हुए अपने पाठकों तक पहुंचाने का प्रयास कर रहा हूं। प्रोफेशनल सिनेमा में ऐसा कुछ दिखाया जाने लगा जिसकी आलोचना समालोचना या कि कतिपय मसलों पर भर्त्सना तक समाज के बुद्धिजीवियों ने और सामान्य दर्शकों ने की। सामाजिक चेतना जागृत करने के प्रयास में लगे लोगों ने भी ऐसी फिल्मों पर अपनी बेबाक टिप्पणी रखी। जिन फिल्मों में भारतीय संस्कृति पर प्रहार है अथवा उसे विकृत करने का प्रयास झलकता है। लेकिन ऐसे सिनेमा बनाने वाले और उसमें काम करने वाले कलाकारों ने जनता की मांग, जनता जो चाहती है हम वही करते हैं - ऐसा कह कर आलोचनाओं को समालोचनाओं को नकार दिया। इसके परिणाम पर हम नहीं जाएंगे। हम केवल यह विचार कर रहे हैं कि क्या आभासी दुनिया के, सिनेमा के दो चेहरे हैं?
प्रोफेशनल - कमाऊवादी
एक यथार्थवादी दूसरा प्रोफेशनल - कमाऊवादी। कमाऊवादी का मतलब येन-केन-प्रकारेण पैसा कैसे कमाया जाए की सोच वाला। हालांकि कलात्मक सिनेमा बनाने वाले भी पैसा कमाने का ध्येय रखते ही है लेकिन येन केन प्रकारेण नहीं। जबकि प्रोफेशनल सिनेमा की हद यहां तक पार हो चुकी है के विवादास्पद विषयों पर ऐसी फिल्मों का निर्माण करने की अपनी प्रवृत्ति को बदल नहीं रहे। अब बात करते हैं इंटरनेट की। यह विशुद्ध रूप से आभासी तो है ही लेकिन इसके भी दो चेहरे हैं। इंटरनेट की दुनिया ने संचार माध्यमों को जहां अप्रतिम तीव्रतम गति दी है, वही ऐसे ऐसे विषय भी पाठकों - दर्शकों तक रखे जाने लगे जो सवाल खड़े करने वाले बन जाते हैं। इस पर भी बहुत कुछ कहा और लिखा जा चुका है।
तथाकथित रूप से प्रोफेशनल मीडिया
तथाकथित रूप से प्रोफेशनल मीडिया के कतिपय लोग ऐसे विषयों पर चलकर अपनी तिजोरियों को भरते हैं जिससे आमजन की भावनाएं आहत होती है। अथवा विषयांतर होकर चर्चाओं का दौर ऐसी दिशा में चल पड़ता है जो समाज और देश के लिए उचित नहीं माना जा सकता। हाल ही की बात करें तो तथाकथित रूप से मीडिया के कुछ लोग भी अब यही कहने लगे हैं कि जो हमारे दर्शक और श्रोता सुनना चाहते हैं देखना चाहते हैं वही समाचार हम प्रमुखता से संकलित करके दिखाते हैं। उनका कहना होता है कि हमारे रिपोर्टर भी उन्हीं विषयों के समाचार लाने के लिए प्रतिस्पर्धा में रहते हैं जो हमारे दर्शक और श्रोता देखना और सुनना चाहते हैं। अधिकांश ऐसे आभासी दुनिया के चैनल और सोशल मीडिया के ग्रुप अथवा अपनी लेखनी को पहुंचाने के माध्यम है जिन्हें सोशल मीडिया पर विभिन्न नामों से ख्याति भी मिली हुई है।
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C P MEDIA
खबरों में बीकानेर





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