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क्रोध मानव का सबसे बड़ा शत्रु - साध्वीश्री अक्षय निधिजी
बीकानेर, 5 अगस्त। रांगड़ी चौक के सुगनजी महाराज के उपासरे में गुरुवार को उतराध्ययन सूत्र का वाचन विवेचन करते हुए साध्वीश्री अक्षय निधिजी ने कहा कि क्रोध जलता हुआ अंगारा है, गिरता हुआ मकान है जहां गिरता है वहां विनाश करता है। क्रोध मानव का सबसे बड़ा शत्रु है इस पर नियंत्रण करने का प्रयास करें। क्रोध के दुष्परिणामों को समझे व जाने तथा परमात्मा से प्रार्थना करें कि सद्बुद्धि से हमारा भाव जगत निर्मल, पवित्र बने, सहनशील और क्षमा के भाव रहे जिससे , सबके प्रति आत्मीयता का व्यवहार कर सकें।
उन्होंने कहा कि क्रोध से शारीरिक, मानसिक, कायिक, वाचिक व आत्मिक नुकशान होता है। क्रोध, को जाने, पहचाने व माने तथा इससे बचें। ईर्ष्या, अहंकार, मान, माया, लोभ और प्रशंसा की भूख, अपनी बात को सच तथा दूसरे की बात को गलत मानने की प्रवृति आदि कारणों से क्रोध आता है। जैन दर्शन का प्रमुख सिद्धान्त है, ’’कम खाओं, गम खाओं व नम जाओं’’ व ’’नमते जीव गमे’’ जो गम व नम्रता के भाव रखता है, अपनी गलती को स्वीकार कर क्षमा याचना करता है तथा सहनशीलता रखता है वह क्रोध के अनंतानुबंध से बचता है।
साध्वीजी ने कहा कि कुछ क्षण के लिए आने वाला क्रोध हैवान से भी बढ़कर खतरनाक होता है। क्रोध का नशा भंयकर तुफान ला देता है, इससे क्रोधी व दूसरे का कितना अनर्थ होता है,इसका आंकलन मुश्किल होता है। विवेक व सहनशीतला से क्षणिक क्रोध को पर अंकुश करने वाला, क्रोध के समय अपने आपको संभालने वाला चतुर सुजान कहलाता है। वहीं क्रोध करने वाला स्वयं अशांत होता है तथा दूसरों की भी शांति को भंग करता है। क्रोध अपनो से अपनेपन का रिश्ता नहीं रहता, वहीं शांतिप्रिय व सहनशील व्यक्ति स्वयं रिश्तों को प्रगाढ़ बनाता है ।
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