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मानव शरीर श्मशान की सम्पति - साध्वीश्री अक्षय निधिजी
बीकानेर, 3 अगस्त। रांगड़ी चौक के सुगनजी महाराज के उपासरे में मंगलवार को उतराध्ययन सूत्र का वाचन विवेचन करते हुए साध्वीश्री अक्षय निधिजी ने कहा कि आत्मा अजन्मा, अजर, अमर, अविनाशी चेतन, चिदानंद स्वरूप् तथा शरीर विनाशी है। आत्मा-परमात्मा के सही स्वरूप् को समझे तथा संसारिक आसक्ति, पापकर्म, अशुभ को छोड़े तथा शुभ से जुड़ें। संसार से जाने से पहले जीना सीखें। अपने आप को संभाले तथा दुर्लभ मानव जीवन का सदुपयोग करें।
उन्होंने कहा कि पुद्गल पिंड के कलेवर का पंचभूत का पिंड मानव शरीर श्मशान की सम्पति है। सबसे ज्यादा धोखेबाज यह शरीर ही है, जिसको कितना संवारते, सजाते है एक दिन उसमें से हंसा उड़ने के बाद अपने ही उसको पंचभूतों में मिला देते है। मृृत शरीर के प्रति स्वार्थ के अनुसार परिजन विलाप भी करते, आंसु भी बहाते है, फिर उसको भूलकर अकरणीय-करणीय, भले-बुरे सभी कर्म करते है। वे भूल जाते है कि मृृत्यु शाश्वत सत्य है, एक दिन सभी को आनी निश्चित है। व्यक्ति को अपने स्वरूप् व मृृत्यु को कभी नहीं भूलना चाहिए। जीव को समझना चाहिए कि मैं कौन हूं,मेरा लक्ष्य क्या है ।
उन्होंने कहा कि सब में देखो ’श्रीभगवान‘’। प्राणी मात्र के प्रति अच्छे भाव रखे तथा उनमें परमात्मा देखे। किसी जीव को अपने कार्य, व्यवहार से कष्ट व क्षति नहीं पहुंचाएं, एकेन्द्रीय हिंसा और पाप कर्म से बचे तथा पुण्य कर्मों का संचय करें। अपने भीतर में जागृृति लाएं तथा अपने आपको नियंत्रित करें। किसी में आसक्ति नहीं रखे, जहां आसक्ति वहीं उत्पति। जीव जिसमें आसक्ति रखता है, उसमें ही उत्पन्न होता है। अपनी इच्छा से नहीं परमात्मा की आज्ञा के अनुसार जीएं। पाप पदार्थों में व्यस्त, पुण्य अस्त में निमग्न प्राणी को त्रियंच गति मिलती है, वहीं आत्म-परमात्मा में रमण करने वाला जीव मोक्षमार्ग की ओर अग्रसर होता है।
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