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डेयरी सेक्टर में आय की असीम संभावनाएं, जुड़ रहे हैं युवा
विश्व दुग्ध दिवस पर राष्ट्रीय वेबिनार आयोजित।
डेयरी सेक्टर से जुड़ रहे हैं युवा- कुलपति प्रो. आर.पी.सिंह
बीकानेर, 01 जून । स्वामी केशवानंद राजस्थान कृषि विश्वविद्यालय बीकानेर के कृषि विज्ञान केंद्र, पोकरण द्वारा विश्व दुग्ध दिवस के अवसर पर "सतत डेयरी फार्मिंग- तकनीक,अवसर एवं चुनौतियां" विषय पर वर्चुअल कृषक वैज्ञानिक संवाद गोष्ठी का आयोजन किया। जिसमें हरियाणा, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, लेह इत्यादि के प्रगतिशील पशुपालकों ने भाग लिया । इस विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो.रक्षपाल सिंह ने कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए बताया की इस वर्ष विश्व दुग्ध दिवस की थीम 'पर्यावरण, पोषण और सामाजिक-आर्थिक सशक्तिकरण के साथ-साथ डेयरी क्षेत्र में स्थिरता' पर केंद्रित है। इसका आयोजन दूध उद्योग से संबंधित गतिविधियों के प्रचार एवं लोगों में आजीवन दूध एवं दूध उत्पादों के महत्व के बारे में जागरूकता पैदा करने हेतु किया जाता है। सर्वप्रथम पूरे विश्व में हमारे देश ने वर्ष 1999 में दुग्ध उत्पादन में प्रथम स्थान प्राप्त किया था जो आज भी 198 मिलियन टन उत्पादन के साथ बरकरार है। वर्तमान में डेयरी और पशुपालन क्षेत्र राष्ट्रीय सकल घरेलू उत्पाद में लगभग 4.5 प्रतिशत योगदान देता है और लगभग 100 मिलियन ग्रामीण परिवारों खासकर भूमिहीन, छोटे या सीमांत किसानों के लिए आय का एक प्राथमिक स्रोत बनकर उभरा है। सरकार ने हाल ही में डेयरी किसानों के लिए भी किसान क्रेडिट कार्ड योजना का विस्तार किया है जिससे पशुपालकों के पास नकदी उपलब्ध होगी ताकि वह पशुपालन को बेहतर प्रबंधन एवं रखरखाव के साथ कर सके । हमारे यहाँ के जानवरों कि दुग्ध उत्पादन क्षमता 3 से 4 लीटर प्रतिदिन प्रति जानवर है । भारत में पुरे दुग्ध उत्पादन का दूध प्रसंस्करण बहुत कम होता है जिसकी वजह से किसानो को उचित मुनाफा अर्जित नहीं हो पाता है। बदलते समय के साथ साथ किसानो को दुग्ध मूल्यसंवर्धन, पैकेजिंग, दुग्ध पावडर इत्यादि कार्यो को अपनाकर एवं ग्राहकों को सीधे बेचकर पशुपालन एवं डेयरी को एक नई दिशा दी देने का प्रयास करना चाहिए । कोरोना संक्रमण में उत्पन्न महामारी से दुनिया के सामने रोजगार का संकट खड़ा हो गया है। भारत के देसी पशु प्रबंधन प्रणाली और स्थानीय सामाजिक संरचना से इस समस्या का समाधान ढूंढा जा सकता है। जिले में देसी गोवंश और जैविक दुग्ध उत्पादन को हथियार के रूप में उपयोग किया जा सकता है। जैविक दूध के उत्पादन के लिए एक हिस्से में पशुओं को रखने का इंतेजाम होता है। वहीं फार्म के एक बड़े हिस्से में जैविक चारा का उत्पादन किया जाता है एवं पशुओं को रेडीमेड पशु आहार नहीं खिलाया जाता है। बल्कि फार्म में पैदा किया गया पौष्टिक एवं जैविक चारा खिलाया जाता है। इस तरह से जैविक दूध एवं जैविक घी का उत्पादन करके किसान बाजार में अच्छी कीमत प्राप्त करके पशुपालन से अच्छी आय अर्जित कर सकता है !
वर्चुअल राष्ट्रीय गोष्ठी के मुख्य अतिथि प्रो. साकेत कुशवाहा कुलपति, राजीव गाँधी विश्वविद्यालय, ईटानगर, अरुणाचल प्रदेश ने बदलते समय के अनुसार पशुपालकों को दुग्ध प्रसंस्करण पर अधिक जोर देने की आवश्यकता है ताकि पशु आहार पर आने वाली लागत को कम किया जा सके। उन्होंने स्थानीय बाजार में उपलब्ध पशु आहार अवयवों पर आधारित फीड मील स्थापित करने की आवश्यकता पर जोर दिया जिससे किसानों को क्षेत्र अनुसार एवं कम लागत पर पौष्टिक आहार पशु को प्राप्त हो सके। इस अवसर पर निदेशक प्रसार शिक्षा निदेशालय डॉ. एस. के. शर्मा ने दूध के दैनिक जीवन एवं आहार में महत्व के साथ साथ इसकी औषधीय गुणों पर विस्तारपूर्वक चर्चा की। पोकरण केंद्र के पशुपालन वैज्ञानिक डॉ राम निवास ढाका ने छोटे छोटे ग्रामीण क्षेत्रो में रहने वाले पशुपालकों को दूध की ब्रांडिंग एवं मूल्य संवर्धन की आवश्यकता बताई । इसके अलावा कृषि विज्ञान केंद्र लुणकनसर एवं झुंझुनू द्वारा भीीी वर्चुअल कार्यक्रम आयोजित किए गए।
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