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visangatiyon ko jee rahe humlog
विसंगतियों को जी रहे हम लोग
- मोहन थानवी
#social #community #politics
आजकल हम लोग विसंगतियों को जी रहे हैं। आजकल ही क्यों हम लोग तो विसंगतियों को जीते जीते ही सदियां गुजार चुके हैं। कभी विसंगतियों को किसी ने उजागर न किया हो ऐसा भी नहीं है। जमाना बीत गया। नया जमाना आ गया। ऐसा कितनी ही बार हो गया। जागरूक लोगों ने विसंगतियां बताई। बुद्धिमान कुशाग्र लोगों ने उन विसंगतियों में से कुछ को दूर किया। लेकिन कुछ विसंगतियां ऐसी है जो परंपरा के तौर पर चली आ रही है। और हम लोग उन्हें जीते आ रहे हैं। इतिहास में ना जाएं। विगत को एकबारगी किनारे रख दें। वर्तमान में देखें तो आसपास ढेरों विसंगतियों के उदाहरण मिल जाएंगे।
अभी कोरोना काल चल रहा है। कोरोनावायरस संबंधित विसंगती देखिए - पहले तो इस बीमारी की जड़ ही पता नहीं चली। फिर वैज्ञानिकों ने शोध किए इसके उपचार के प्रयास किए और लाखों-करोड़ों जिंदगियां बचाने का क्रम अभी भी जारी है। कोरोनावायरस अभी भी लहर पर लहर पैदा कर रहा है और हम लोग इसके उपचार की पद्धति पर बहस पर बहस किए जा रहे हैं। और बहस करने वाले कौन हैं ? हमारे समाज के, चिकित्सा क्षेत्र के, राजनीतिक क्षेत्र के कुशाग्र लोग। यह विसंगति है कि हमें उनकी बहस को सुनना भी पड़ता है। और उनमें से कुछ के अनुयायियों की बातों को भी सोशल मीडिया पर हमें देखना पड़ता है। यह विसंगति नहीं तो और क्या है कि भारतीय वैज्ञानिकों ने कड़े परिश्रम से वैक्सीन तैयार कर ली मगर अब उस पर जमकर राजनीति हो रही है। केंद्र सरकार कह रही है वैक्सीन लगवाओ। पहले तो वैक्सीन लगाने को लोग आगे नहीं आए। या लोगों को आगे लाया नहीं गया। अब विसंगति देखिए - अच्छे भले लोग मांग और पूर्ति के सिद्धांत को ही भूल बैठे। और हम पर राज करने वाले विभिन्न राज्यों के राज्य अधिकारी अपनी कहनी को ऊपर रखने के ईगो में हम लोगों की परेशानी भूल बैठे। जनसंख्या मुताबिक ऑर्डर को एक साथ पाने के लिए जिद करने लगे। एक राज्य के राज्य अधिकारी ने कहा हमें इतनी करोड़ वैक्सीन चाहिए। फिर हवा चलाई - वैक्सीन है ही नहीं। और बाजार में यानी हम लोगों में यह भ्रम फैल गया की वैक्सीन तो है ही नहीं। लंबी लंबी कतारें लगनी शुरू हो गई। वैक्सीन सेंटर पर लोग जाकर निराश लौटने लगे। मांग और पूर्ति का सिद्धांत 8वीं 10वीं 12वीं के बच्चों को वाणिज्य पढ़ाते समय पहले पाठ में से एक है। जितनी मांग होगी उत्पादन उतना करने के प्रयास होंगे तो संतुलन बना रहेगा। उत्पादन लाखों में और डिमांड करोड़ों में पहुंच गई। जहां एक करोड़ दो करोड़ वैक्सीन उत्पादन हो रहा है तो चार छह करोड़ वैक्सीन किसी एक को कैसे दी जा सकती है? यह विसंगति समझना हम लोगों का काम है राजनेताओं का नहीं उन्हें तो बस अपनी राजनीति चमकानी है। खैर यह वर्तमान बौद्धिक विसंगति कही जाएगी। इसमें वैक्सीन से संबंधित व प्रकरण भी जोड़ सकते हैं जिनमें वर्ग विशेष के लोगों को वैक्सीन हानिकारक बताई गई और इस भ्रम के कारण एक खबर तो यह भी आई केक पूरा गांव भाग खड़ा हुआ और कुछ लोग नदी में भी कूद गए।
और अब आते हैं पत्रकार वर्ग की ओर। पत्रकारों की पीड़ा को कौन समझता है? पत्रकारों को अपने यहां काम पर रखने वाले मीडिया हाउस के मालिक तो कतई नहीं समझते। समाज के जागरूक लोग समझते हुए भी ना समझने का अभिनय करने पर शायद विवश हों। विसंगति यह है कि सरकार, मंत्री, नेता, सरकारी विभागों के अधिकारी, व्यापारी सहित लगभग प्रत्येक वर्ग अपनी बात को सरकार तक या अन्य लोगों तक, समाज तक पहुंचाने के लिए पत्रकार को माध्यम बनाता है। और पत्रकार इन सभी की बातों को अपनी कलम के माध्यम से प्रचारित प्रसारित भी करता है। लेकिन विसंगति में जीता है। पत्रकार की मांग क्या है। पत्रकार की पीड़ा क्या है। पत्रकार को क्या चाहिए किसी को परवाह नहीं। यकीन ना हो तो ऐसे पत्रकारों से आप मीडिया हाउस के बाहर मिलिए जिन्हें तनख्वाह के रूप में महज इतने रुपए मिलते हैं कि वह अपने दो या तीन सदस्यों के परिवार को दाल रोटी खिला सके। उसके मालिकों के लिए न्यूनतम अधिकतम वेतन मानदेय नियम कायदे कोई मायने नहीं रखते। कोरोना काल में तो सरकार ने भी पत्रकारों की खूब अनदेखी की। चलिए पत्रकारों की विसंगतियों को एक और रख दीजिए।
अब आ जाइए डॉक्टर वर्ग की विसंगतियों की ओर। हमारे डॉक्टर भी तो विसंगतियों में ही जी रहे हैं। ऐसे डॉक्टर को मैं जानता हूं जिन्हें तबादले पर तबादले करके लगभग परेशान कर दिया गया। खैर हो सकता है यह एक प्रक्रिया हो। लेकिन जो विसंगति की बात है वो यह कि डॉक्टर को 24 घंटे सजग रहना पड़ता है। उसके अपने सामाजिक जीवन की गतिविधियां अपने पेशे की वजह से कई मर्तबा ठप कर देनी पड़ती है। बावजूद इसके डॉक्टर को पैसा कमाने वाली मशीन समझ लिया जाता है। उपचार में कोताही के आरोप लगाते हुए बहुत सी बार मरीज के परिजन डॉक्टर को घेर लेते हैं।
एक और सबसे बड़ी विसंगति है योग्यता धारी के बेरोजगार रहने और उससे कम योग्य को भरपूर रोजगार मिलने की। एक विसंगति का उदाहरण देखिए - निजी क्षेत्र में एक कंपनी में काम करने वाले सेवानिवृत्ति के बाद सरकारी पद पर नियुक्त हो जाते हैं। राजनीति के बदौलत। और जब तक वह सेवा में थे जितना कमाते थे उससे कहीं अधिक कमा रहे हैं। और इसमें भी विसंगति की बात देखिए - वह पहले भी और अब भी देश में बेरोजगारी के मुद्दे पर सत्ताधारी नेताओं और तंत्र की खिंचाई करने से चूकते नहीं ।
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